विश्व-संगठन, विश्व-मानस और एक विश्व-धर्म

  • 2015-07-22 03:53:57.0
  • राकेश कुमार आर्य

ahinsa-logo-768x350मानव के मानव पर अत्याचार करने की प्रवृत्ति ने विश्व के देशों को देशों पर अत्याचार करने के लिए प्रेरित किया,सम्प्रदाय को सम्प्रदायों पर अत्याचार करने के लिए प्रेरित किया। विश्व में उपनिवेशवादी व्यवस्था का जन्म मनुष्य की इसी भावना से हुआ। अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहने और दूसरों के अधिकारों के प्रति असावधान रहने का यही परिणाम होता है। देशों का देशों पर अत्याचार करना और अपने उपनिवेश स्थापित करना बड़ा ही अमानवीय कार्य था। शोषक देश शोषित देश के लोगों के प्रति ऐसा व्यवहार करता था, मानो उनमें आत्मा ही न हो और उन्हें जीवन जीने तक का भी अधिकार ना हो। सम्प्रदाय के आधारों पर लोगों के मध्य विभेद करने वाले शासकों ने भी विपरीत सम्प्रदाय वालों के प्रति ऐसा ही व्यवहार किया। अत्याचारों का यह क्रम आज भी अपने परिवत्र्तित स्वरूप में स्थापित है। आज भी राष्ट्रों के मध्य ईष्र्या और कटुता का भाव पूर्ववत स्थापित है। जिससे स्थिति में मात्र इतना परिवर्तन आया है कि अब उपनिवेश तो स्थापित नही किये जा रहे, परन्तु एक सबल राष्ट्र निर्बल राष्ट्र पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर उस पर राज करने की भावना से आज ग्रसित है। कहने का अभिप्राय है कि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सम्प्रभुता का हृदय से सम्मान करना नही चाह रहा। द्वितीय विश्वयुद्घ के पश्चात् रूस ने अफ गानिस्तान में अपनी सेनाएँ भेजीं, अमेरिका ने भी ऐसा कई राष्ट्रों के साथ किया है। अमेरिका और ईराक के पूर्व शासक सद्दाम हुसैन की लड़ाई का प्रमुख कारण ईराक को समुद से तेल निकालने में उसके अधिकारों से वंचित करना ही था। इसी प्रकार दूसरें देशों के विषय में हम देखते हैं कि कहीं न कहीं निर्बल को शासित और नियंत्रित रखने के लिए उन पर युद्घ या आतंक थोपा गया है। जिसे हम आजकल आतंकवाद कह रहे हैं यह किसी राज्य का या राष्ट्र का किसी दूसरे राज्य या राष्ट्र के प्रति आतंक नही हैं। यह विशुद्घ साम्प्रदायिक समस्या है। जिससे बीते हुए इतिहास के भूत वर्तमान में जीवित हो होकर कब्रों से उठे चले आ रहे है। इससे राष्ट्र भी आतंकित है और राष्ट्रों के निवासी भी आतंकित है। युद्घ की तपिश बढती जा रही है। तीसरे विश्व युद्घ की सम्भावनाएँ तीव्रतर होती चली जा रही हैं। विश्व राजनीति के समीक्षक और विश्लेषक अनुमान लगा रहे हैं कि विश्व की इस जर्जरित व्यवस्था के कारण परमाणु हथियार और इन जैसे ही व्यापक नरसंहार करने में समर्थ रासायनिक हथियारों पर आतंकवादियों का नियन्त्रण स्थापित होना सम्भव है। यह मानव के भीतर छिपे दानव की वही परम्परागत भूख है जो मानव को युग-युगों से सता रही है। निसन्देह यह भूख मानवता के मांस भक्षण से ही शान्त होगी। मानवाधिकारवादियों को चाहिए कि वह मानव के स्वभाव में छिपे ‘दानव’ को मानव बनाने का प्रयास करें। मानव तो मानव है ही। उसे तो जीने के लिए जो चाहिए उसे वह ले लेगा, लेकिन दानव मानव नही है। उसे जीने के लिए कुछ नही चाहिए अपितु उसे चाहिए दूसरों का जीवन। दूसरों के जीवन को अपने जीवन के लिए समाप्त कर देना यह दानवता का लक्षण है। दानव का स्वभाव है। मानव के भीतर छिपकर दानव नीचे से उपर तक बैठे व्यक्तियों के भीतर ही छिपा बैठा है। इसके विषय में यह सच है कि यह शक्ति सम्पन्न लोगों के भीतर अधिक मात्रा में मिलता है। अब यदि एक राष्ट्र को एक व्यक्ति उसी प्रकार चलाता है जिस प्रकार एक परिवार को एक व्यक्ति चलाता है तो उसके भीतर भी इन दुर्बलताओं का और प्रबलता से मिलना अधिक सम्भव है। क्योंकि वह एक परिवार के मुखिया से कहीं अधिक शक्ति सम्पन्न है। जिसका वह दुरुपयोग करता है। वार्साय की सन्ध् दमनकारी थी-जर्मनी के प्रति। जिन राष्ट्र प्रमुखों ने जर्मनी पर यह दमनकारी संध् थोपी थी उन्हीं के हृदय की दानवता ने हिटलर का निर्माण किया। यदि वार्साय सन्ध् में भाग लेने वाले राष्ट्र प्रमुख अपने हृदय को मानवीय बनाये रखकर जर्मनी के साथ व्यवहार करते तो हिटलर जैसे क्रूर व्यक्ति का निर्माण नही होता। जिन करोड़ों लोगों की मृत्यु या हत्या का कारण हिटलर बना उसके लिए हिटलर कम और हिटलर के देश के प्रति अपमानजनक सन्ध् करने वाले राष्ट्र प्रमुखों के हृदय की ‘दानवता’ अधिक उत्तरदायी थी। विजय के क्षणों में मानवता को धारण करना अत्यन्त आवश्यक होता है। व्यवहार में मनुष्य को इसी सिद्घान्त का पालन करना चाहिए। भारतीय संस्कृति ऐसी अवस्था के लिए ‘समदर्शी’ शब्द का प्रयोग करती है। यदि वार्साय सन्ध् को जन्म देने वाले राष्ट्र प्रमुख समदर्शी होते तो द्वितीय विश्व युद्घ न होता। उनकी असमदर्शिता ने हिटलर जैसे घृणास्पद व्यक्तित्व को जन्म दिया। जिसने अपने राष्ट्र के स्वाभिमान को बनाये रखने के लिए जो कुछ किया वह आज इतिहास का काला अध्याय बन चुका है। एक राष्ट्र के अधिकारों का दमन विश्व युद्घ का कारण बना। जिसने करोड़ों लोगों की बलि ले ली। युद्घ की भयंकर विभीषिका से निकले विश्व समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की। इसकी स्थापना में वही राष्ट्र अपने पापों को छिपाने के लिए अधिक सक्रिय दिखायी पड़े जिन्होंने करोड़ों लोगों की हत्या करने में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना और उद्देश्यों में करोड़ों लोगों के खून का गारा बनाकर लगाया गया है। यही कारण है कि इस विश्व संगठन की छत के नीचे भी लोगों का दम घुट रहा है। सभी राष्ट्रों के सम्मान और सुरक्षा की गारण्टी देकर भी यह विश्व संगठन अपने उद्देश्यों में सफ ल नही रह पाया है। हम बड़ी और छोटी कमजोरी में से छोटी कमजोरी को पकड़ते हैं। विश्व के लिए बड़ी कमजोरी है संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा राष्ट्रों की सम्प्रभुता की सुरक्षा की गारण्टी देकर भी उसका असफ ल हो जाना।

शेष अगले अंक में