हिन्दू समाज में जातीय समन्वय के अद्भुत ऐतिहासिक प्रसंग (1)

  • 2015-09-19 15:21:09.0
  • दिनेश चंद त्यागी

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आधुनिक बुद्घिजीवियों में इस बात की होड़ लगी रहती है कि हिंदू समाज को जीन ग्रंथियों से ग्रस्त बनाने के लिए कौन कितने अधिक तथ्यों की खोज करे। जाति प्रथा, अंधविश्वास व अनेक कुरीतियों के कारण हिंदू समाज ने समय-समय पर भीषण आपदाएं झेली हैं, इस संबंध में कितने ही उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं, किंतु इस तथ्य को सदैव ओझल करने की चेष्टा बनी रहती है कि जब बड़े-बड़े नाम वाले आधुनिक संगठन कहीं नही थे, उनका नाम निशान भी नही था, सुधारवादी आंदोलन करने वाले संगठन भी नही थे तब भी हमारे पूर्वजों ने विराट शक्ति संग्रह करके विदेशी आक्रमणकारियों का मुंह तोड़ उत्तर दिया था तथा अपने अस्तित्व व स्वाभिमान की रक्षा करने में अपूर्व सफलता प्राप्त की थी। इस संदर्भ में से जुड़े कुछ ऐतिहासिक प्रसंग यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

सिकंदर का सामना करने में सभी जातियां एक जुट रहीं

भारत पर सर्वप्रथम विदेशी आक्रमण का आरंभ ई. पू. 327 में सिकंदर के आक्रमण से हुआ। सिकंदर का राजा पुरू से भयंकर युद्घ हुआ यह सर्वविदित है। राजपूत राजाओं के अतिरिक्त सिकंदर का सामना मालव, शूद्रक अग्र श्रेणी, योद्घेय तथा ब्राह़्मणक नामक गणराज्यों ने भी डटकर किया था।

मालव और शूद्रक गणराज्य की एकात्मता

दोनों गणराज्यों में कभी कभी मनमुटावा भीहो जाता था। सिकंदर के बढ़ते सैन्य दल की घटनाएं सुनकर इन दोनों राज्यों ने अपनी सेनाओं का एकीकरण कर लिया। सामाजिक एकता स्थापित करने के लिए दोनों के नागरिकों ने व्यापक प्रमाण पर वैवाहिक संबंध भी स्थापित किये। लगभग एक हजार वर-वधुओं ने परस्पर एक दूसरे राज्य के व्यक्ति को अपना जीवन साथी स्वीकार कर वैमनस्य को सदा के लिए समाप्त कर दिया।

मालव शुद्रक गणराज्यों की इस संयुक्त शक्ति से भयंकर युद्घ करते समय सिकंदर ने इस गणराज्य के नगर पर डेरा डाला किंतु संगठित भारतीय वीरों ने ग्रीक  सेना को एक इंच भी आगे न बढऩे दिया। क्रोधी सिकंदर सीढ़ी लगाकर शत्रु के घेरे में कूद पड़ा। भीषण संग्राम प्रारंभ हो गया। अकस्मात एक भारतीय वीर ने सिकंदर के सीने में घुस गया। सिकंदर बेहोश हो गया। अकस्मात एक भारतीय वीर ने सिकंदर को लक्ष्य कर अपनी प्रत्यंचा से एक विषाक्त तीर छोड़ा जो सिकंदर के सीने में घुस गया। सिकंदर बेहोश हो गया। ग्रीक सैनिक किसी प्रकार उसे अपनी छावनी में ले गये। अंत में दोनों पक्षों में संधि हुई और सिकंदर को अपनी सेना के साथ घर वापिस जाने की अनुमति दे दी गयी। विश्व विजय के स्वप्न लेकर भारत पर आक्रमण करने वाला सिकंदर अंतत: बिना भारत को जीते ही वापिस ईरान पहुंचा। भारतीय रणबांकुरों से हुए भीषण युद्घों में सिकंदर पूरी तरह टूट चुका था। परिणामत: डेढ़ दो वर्ष में ही बेबीलोन में सिकंदर की मृत्यु हो गयी। सिकंदर की मृत्यु के पश्चात उसके सेनापति सैल्यूकस ने भारत पर आक्रमण किया किंतु आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य के लक्षावधि सैन्य बल के सामने सैल्यूकस की एक न चली और उसे चंद्रगुप्त के साथ संधि करने के लिए विवश होना पड़ा। दहेज में अपनी पुत्री हैलेना भी उसने चंद्रगुप्त को समर्पित कर दी।

चाणक्य व चंद्रगुप्त के रूप में ब्राह्मण और मौर्य जाति की एकात्मा

अखण्ड भारत के चित्र को मूर्तिमंत स्वरूप प्रदान करने वाले आचार्य चाणक्य ब्राह्मण थे जबकि सम्राट चंद्रगुप्त की जाति मौर्य थी जो कालांतर में क्षत्रीय वंश से ही विकसित हुई। ब्राह्मण और मौर्य जाति के इस अद्भुत समन्वय ने तत्कालीन भारत को जो गौरव दिलाया वह हिंदू राष्ट्र के इतिहास के अविस्मरणीय पृष्ठ के रूप में युगों युगों तक भारत के देशभक्तों को प्रेरणा देता रहेगा।

सिंध पर मुस्लिम आक्रमण

ईसवी सन 712 में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया। उस समय का शासक मोहियाल ब्राह्मण राजा दाहिर था। राजा दाहिर के पिता चच के व्यवहार ने सिंध के जाटों को अपना विरोधी बना दिया था। फिर भी जब दाहिर पर मुस्लिम आक्रमण हुआ तो दाहिर की सेना ने उपसेनापति के रूप में जाट प्रतिष्ठित रहे। साथ ही ब्राह्मणों के अतिरिक्त राजपूत सैनिक हजारों की संख्या में थे। बाद में 714 ई. में महाराणा बप्पा रावल के सहयोग से मुस्लिम विजेताओं को परास्त करने में सफलता प्राप्त हुई।

परिणामत: कई सौ वर्ष तक फिर से निष्कंटक हिंदू राज्य सुरक्षित बना रहा। जाटों ने ब्राह्मण राजा द्वारा लगाये गये कई अनर्गल प्रतिबंधों को सहकर तथा जातीय अपमान को भुलाकर राष्ट्रीय संकट की घड़ी में राजा दाहिर की सेना का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। जिन हिंदुओं को बलात मुसलमान बना लिया गया था उनका शुद्घि अभियान चलाने की व्यवस्था देवल ऋषि द्वारा बनाई गयी जिस कारण विधर्मी बनाये गये सभी हिन्दू अपने मूल धर्म में वापिस आ गये। बाद में जब महमूद गजनबी ने सोमनाथ को लूटा तो वापिस जाते हुए गजनबी की सेना पर जाटों ने पीछे से आक्रमण कर उसे भारी क्षति पहुंचाई।

जाटों का राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान को सहयोग

पृथ्वीराज चौहान ने मौहम्मद गोरी को युद्घ में कई बार पराजित किया किंतु अंतिम दौर में कन्नौज के राजपूत राजा जयचंद तथा जम्मू के राजपूत राजा ने जब पृथ्वीराज का साथ नही दिया तो विकट परिस्थिति में रोहतक के जाटों ने अपनी विशाल सेना तैयार की तथा पृथ्वीराज चौहान का युद्घ के मैदान में साथ दिया। पृथ्वीराज के पुत्र का विवाह भी रोहतक की जाट कन्या से हुआ। युद्घ में पराजय का कारण परस्पर स्वजातीय वैमनस्य भले ही रहा हो किंतु अन्य जातियों ने कंधे सेकंधा मिलकार राष्ट्रीय संकटों को झेला।

क्रमश: