कम क्यों नहीं हो रहीं दहेज हत्याएं

  • 2016-05-12 12:30:40.0
  • उगता भारत ब्यूरो

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दहेज का प्रश्न सबसे ज्यादा मध्यवर्ग का प्रश्न है, और आंकड़ों के अनुसार, कन्याभ्रूण हत्या भी सबसे ज्यादा शहरी मध्यवर्ग में ही हो रही है।(एक्सप्रेस आर्काइव)

हमें आधुनिक काल में प्रवेश किए दो सौ साल से ज्यादा हो गए, लेकिन सामाजिक संबंधों के निर्माण में हम अब तक आधुनिक दृष्टिकोण का विकास नहीं कर पाए हैं। सामाजिक संबंधों की धुरी स्त्री-पुरुष संबंध की शुरुआत आज भी दहेज लेकर और देकर की जाती है। जबकि दहेज लेने और देने के खिलाफ कानून है। लेकिन दहेज को लेकर सामान्य लोगों में कोई घृणा का भाव नहीं है। समाज का कोई भी वर्ग दहेज के लिए ना नहीं कहता। न ही दहेज लेना समाज की दृष्टि में आपराधिक कर्म माना जाता है। हमारा ध्यान दहेज के मामलों पर तब जाता है जब कोई लडक़ी दहेज के लिए उपेक्षा, हिंसा, प्रताडऩा और मृत्यु की भेंट चढ़ जाती है। दहेज न लाने के कारण कई परिवार लडक़ी को उसके मायके पहुंचा जाते हैं और जब तक मांग न पूरी हो, उसे ससुराल में जगह नहीं मिलती। एक आंकड़े के मुताबिक 2007 से लेकर 2011 तक दहेज के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2012 में दहेज हत्या के 2,833 मामले सामने आए। वर्ष 2011 में दहेज के कारण स्त्रियों की हत्या के मामले 2,618 थे। यानी औसतन एक घंटे में एक स्त्री की हत्या दहेज के कारण हुई है। 2013 में दहेज निरोधक कानून के दायरे में आने वाले 10,709 मामले दर्ज किए गए। दहेज प्रथा के पीछे यदि यह मंशा रही हो कि लडक़ी को पिता के घर में जिन चीजों के व्यवहार की आदत है, पति के घर उसे उन चीजों का अभाव महसूस न हो, तो भी यह हास्यास्पद तर्क है। कारण कि पारंपरिक विवाह प्राय: हैसियत में बराबरी के लोगों के बीच ही हुआ करते हैं, और दूसरा कि वर पक्ष जितना धनी होता है, दहेज की मात्रा भी उसी हिसाब से बढ़ जाती है।

छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए स्त्री को जला कर मार देना क्रूरता की पराकाष्ठा है। कभी पिता के घर से एक स्कूटर न लाने के कारण, कभी पैसे के कारण, कभी अन्य किसी चीज के कारण विवाहिता को जला कर या अन्य किसी तरीके से मार डाला जाता है। कन्या भ्रूणहत्या से लेकर दहेज हत्या तक सामाजिक कारण एक ही है। लडक़ी को दहेज देना पड़ेगा, वह माता-पिता के लिए आर्थिक तौर पर बोझ साबित होगी। अत: लडक़ी पैदा होने का मातम होता है और कई जगह पैदा होने के पहले ही गर्भस्थ कन्या-शिशु को मारने के सारे इंतजाम कर लिये जाते हैं। इस तरह की क्रूरताओं से बच गई कुछ लड़कियां दहेज हत्या का शिकार होती हैं। दहेज का प्रश्न सबसे ज्यादा मध्यवर्ग का प्रश्न है, और आंकड़ों के अनुसार, कन्याभ्रूण हत्या भी सबसे ज्यादा शहरी मध्यवर्ग में ही हो रही है। उच्चवर्ग में भी दहेज का चलन खूब है। लेकिन उच्चवर्ग पर इससे बरसों-बरस बचत करते रहने का दबाव नहीं होता, उसके लिए तो यह अपनी हैसियत के प्रदर्शन का जरिया होता है। दबाव तो मध्यवर्ग सहित समाज के उससे नीचे के तबकों पर पड़ता है, जहां तमाम परिवार जरूरी खर्चों में कटौती करते हुए भी दहेज का इंतजाम करने में लगे रहते हैं।

विचित्र यह है कि आजकल की आधुनिक लड़कियां भी दहेज को बुरा नहीं मानतीं। उसके प्रति घृणा नहीं रखतीं। वे इंतजार करती हैं कि माता-पिता उन्हें दहेज में क्या-क्या क्या देने वाले हैं। दहेज में प्राप्त संपत्ति को कन्या-धन माना जाता है, अत: वे भी चाहती हैं कि माता-पिता से उन्हें दहेज के रूप में यह संपत्ति मिले। मोटा दहेज देकर कैसी भी लडक़ी की शादी की जा सकती है। परिवारों का दहेज के आधार पर संबंध दरअसल संपत्ति के आधार पर बनाया गया संबंध है, मनुष्यता के आधार पर बनाया गया संबंध नहीं। स्वयं को मनुष्य के रूप में न देख पाने के कारण लड़कियां अपने को एक वस्तु या संपत्ति की तरह ही सजाती-संवारती हैं। इसमें किशोरी, युवती और बुजुर्ग सभी उम्र की महिलाएं शामिल हैं। वे वस्तु और उसके मालिक से अलग अपना मूल्य नहीं देखतीं। शिक्षित लड़कियां भी जहां दहेज का सवाल आता है, वहां विरोध नहीं करतीं। मां-बाप अपनी हैसियत के अनुसार दें और खुशी से दें तो भी वह दहेज ही कहलाएगा। माता-पिता को देना ही है तो अपनी संपत्ति में बेटी को हिस्सा दें। लेकिन ऐसे उदाहरण नहीं मिलते। न ही जनजागृति का ऐसा कोई प्रयास देखने को मिलता है कि बेटी भी संपत्ति की उत्तराधिकारिणी है। दहेज के खिलाफ कानून है, लेकिन हम उसका पालन नहीं करते। बेटी को भी संपत्ति में समान हक का कानून है, हम उसका भी पालन नहीं करते। फिर हम कैसे कह सकते हैं कि यह एक सभ्य नागरिक समाज है जो नियम-कानून से बंधा हुआ है! यह तो सुविधाजनक व्याख्या और व्यवहार से चल रहा है। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान स्त्री का है और व्यापक नुकसान समाज का है। बेटी को दहेज देकर दूसरे घर भेज कर छुट्टी पाने की मानसिकता का ही परिणाम है कि माता-पिता लडक़ी पर भरोसा नहीं करते। वैसा विश्वास नहीं करते जैसा वे अपने लडक़ों पर करते हैं। लडक़ी की शिक्षा समेत तमाम उपलब्धियों पर गर्व नहीं करते, उसे आत्मनिर्भर बनने का पूरा मौका नहीं देते। उसकी स्वतंत्रता पर नियंत्रण होना चाहिए। उस पर तमाम पाबंदियां इसी मानसिकता के कारण लाद दी जाती हैं। एक स्वतंत्र चेतना संपन्न और स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण के लिए जिस तरह का मुक्त, पाबंदी-रहित, आनंदपूर्ण वातावरण चाहिए, वह मध्य और निम्न मध्यवर्गीय लडक़ी को नसीब नहीं होता। फिर शिक्षित लड़कियां भी यदि अपने लिए बने पिंजरों में आनंद लेने लगें तो आश्चर्य क्या! उपभोक्तावादी व्यवस्था ने लडक़ी को सिखाया है कि उसकी देह को हर कोण से सुंदर लगना चाहिए। शादी के पहले ब्राइडल पैकेज का नया धंधा आरंभ है। यह महीनों चलता है। शादी के बाद भी शादीशुदा घरेलू और कामकाजी औरतें जिस तरह से अपने को सौंदर्य प्रसाधनों और पार्लरों के जरिए सुंदर बनाने की होड़ में लगी रहती हैं वह दुखद है। आज की आधुनिक लडक़ी की स्थिति यह है कि वह शिक्षित है, बहुत-सी आत्मनिर्भर भी हैं लेकिन दहेज को लेकर उनमें स्वीकृति का भाव है। मीडिया और विज्ञापनों का बाजार लडक़ी की इस मनोदशा को पकड़ता है। गहनों के विज्ञापन तो जैसे दहेज प्रथा का घोषणापत्र हैं। प्राय: हर विज्ञापन में लडक़ी का विवाह और उसमें दिया जाने वाला दहेज केंद्र में होता है। एक विज्ञापन में गहनों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी दिए जाने वाले दहेज के रूप में दिखाया जाता है। हाल के एक विज्ञापन में बच्ची के लिए पिता गहनों का भारी सेट खरीद कर लाता है, मां के आपत्ति करने पर वह कहता है, बच्ची बड़ी हो रही है, उसका विवाह भी तो करना है। एलआइसी के एक विज्ञापन में बेटी के विवाह के अवसर पर उसकी मां को विवाह में आया मेहमान बधाई देता है कि शर्माजी की मृत्यु के बाद भी उसने बेटी का विवाह बड़ी धूमधाम से किया तो वह कहती है कि सारे काम तो शर्माजी ने अपने जीते-जी कर दिए, उनके एलआइसी में जमा रकम से बेटी के विवाह का सारा खर्च निकला।
-सुधा सिंह

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