जब बलिदानों को गांधी जी ने कह दिया था ‘पागलपन’

  • 2015-10-16 01:00:46.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की किसी भी प्रकार की अकर्मण्यता, प्रमाद और शिथिलता की भावना को झकझोरते हुए राष्ट्र कवि दिनकर (परशुराम की प्रतीक्षा पृष्ठ-12) लिखते हैं :-

‘‘चिंतको! चिंतना की तलवार गढ़ो रे!
ऋषियों ! कषानु उद्दीपन मंत्र पढ़ो रे।
योगियो! जगो जीवन की ओर बढ़ो रे।
बंदूकों पर अपना आलोक मढ़ो रे।
है जहां कभी भी तेज हमें पाना है,
रण में समग्र भारत को ले जाना है।’’

कितने सुंदर शब्द हैं ये कवि के? जीवन के हर क्षेत्र से क्रांति की पुकार उठ रही है। कवि ने हर वर्ग को और हर श्रेणी के व्यक्ति को झकझोरा है। सबका एक ही लक्ष्य निर्धारित किया है-राष्ट्रवंदन। सबको एक ही उद्देश्य दिया है-राष्ट्र आराधना। ऐसी वंदना और ऐसी आराधना के लिए सबको एक ही सुर दिया है-स्वतंत्रता का मधुर गीत। ऐसा गीत जिससे कोई भयभीत ना हो, ऐसा गीत जिससे मीत बढ़ें और प्रीत बढ़े। ऐसा गीत जो इस जीवन को तो भव पार लगाये ही आने वाले जीवन के लिए एक सुंदर आधार भी बन जाए,  ऐसा गीत जो वसुधा के इस छोर से दूसरे छोर तक लोगों को एक साथ झूमने और एक साथ संपूर्ण वसुधा के लिए ‘वंदेमातरम’ बोलने के लिए प्रेरित करे।

अब अपने विषय पर आते हैं। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के पश्चात कांग्रेस ने दिसंबर में अमृतसर कांग्रेस का आयोजन किया। इस अमृतसर कांग्रेस के स्वागताध्यक्ष स्वामी श्रद्घानंद और अध्यक्ष पंडित मोतीलाल नेहरू बनाये गये। स्वामी श्रद्घानंद जी और पं. मोतीलाल नेहरू इलाहबाद में साथ-साथ पढ़े-खेले थे। आज दोनों एक साथ एक मंच पर राष्ट्र सेवा का कार्य कर रहे थे-यह एक सुखद संयोग ही था।

जलियांवाला बाग  हत्याकाण्ड को लेकर सरकार ने अनुभव किया कि ‘भूल’ हुई। जब ‘हण्टर कमेटी’ की रिपोर्ट आयी तो सरकार यह देखकर दंग रह गयी कि पंजाब के निर्दोष लोगों पर उसके अधिकारियों ने कितनी नृशंसता से गोलियां चलाई थीं? सरकार को अपने मुंह से ही अपने अधिकारियों के अत्याचारों की कहानी को ‘नृशंसता’ कहना पड़ा। तब ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम ने भारतवासियों का विश्वास जीतने के उद्देश्य से कहा था
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‘‘जब से भारत की रक्षा का भार हमारे शाही परिवार के कंधों पर डाला गया है, तब से हम उसे एक पवित्र धरोहर मानते रहे हैं, और विश्वास दिलाया गया कि भारत वासियों को शीघ्र से शीघ्र अपने देश के शासन का भागीदार बनाना अंग्रेजी शासन का ध्येय है।’’ घोषणा के अंत में यह भी कहा गया-‘‘नये संविधान के प्रचारित होने के साथ ही मैंने रियासतों के शासकों की सभा संगठित करने की भी स्वीकृति दे दी है,
जिसका उद्घाटन करने के लिए मैं अपने प्रिय पुत्र ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ को अगली सर्दियों  में भारत भेजने की  इच्छा रखता हूं।’’ भारतवासियों को यह भी विश्वास दिया गया है कि-‘‘गत उपद्रवों के कारण जिन लोगों को दण्ड दिये गये हैं, उनमें से जिनके छोडऩे से सार्वजनिक सुरक्षा को कोई भय न हो, उन्हें छोड़ दिया जाएगा।’’

इस घोषणा के पश्चात डा. सत्यपाल व डा. किचलू जैसे सम्मानित नेताओं को रिहा कर दिया गया। जिससे लोगों को कुछ सुखानुभूति हुई। विरोध के स्वर कुछ मद्घम पड़े।

इसी समय ‘देशबंधु चितरंजन’ दास का उदय हुआ। वह देश की राजनीतिक गतिविधियों में बढ़-चढक़र भाग लेने लगे। अब से पूर्व वह कलकत्ता में वकालत कर रहे थे। वह उस समय के अच्छे अधिवक्ताओं में गिने जाते थे। उनका नाम भी था और कमाई भी 25-30 हजार रूपया मासिक की थी। अब उन्होंने अपनी वकालत को लात मारकर देश सेवा का व्रत लिया और अमृतसर की कांग्रेस में ‘अग्रगामी दल’ के नेता के रूप में उभरकर सामने आये। वह सम्राट की घोषणा को 1858 की महारानी विक्टोरिया की घोषणा के समान केवल झांसा ही मानते थे। उनका व्यावहारिक दृष्टिकोण था और अंग्रेजों से वह कठोरता से निपटने को प्राथमिकता देते थे। ऐसा ही विचार लोकमान्य तिलक का था। उन्होंने उन दिनों कांग्रेस के लिए वक्तव्य दिया था कि उसे अंग्रेजों के प्रति ‘प्रतियोगी सहयोग’ करना चाहिए। जिसका अभिप्राय था कि जितना सरकार हमारी ओर बढ़े अर्थात जितना सरकार हमें हमारे अधिकार देने में उदारता का प्रदर्शन करे उतना ही हमें भी उसकी ओर बढऩा चाहिए।

देशबंधु चितरंजन दास ने अमृतसर कांग्रेस में स्पष्ट शब्दों में प्रस्ताव रखा था कि-‘‘वैध सुधारों के संबंध में दिल्ली की कांग्रेस द्वारा पारित किये गये प्रस्तावों पर ही कांग्रेस दृढ़ है और उसकी राय है कि सुधार कानून अपूर्ण असंतोषजनक और निराशाजनक हैं।’’


यद्यपि देशबंधु ने अपने शब्दों का चयन पूर्ण गंभीरता से किया था, परंतु गांधीजी को यह प्रस्ताव समझ में नही आया। वह नही चाहते थे कि अंग्रेज सरकार के प्रति ‘निराशाजनक’ शब्द का प्रयोग किया जाए। इसलिए उन्होंने अमृतसर कांग्रेस में सरकार का बचाव करते हुए प्रस्ताव में से ‘निराशाजनक’ शब्द के स्थान पर  संशोधन प्रस्तुत किया और ये शब्द बढ़ाने पर बल दिया-‘‘जब तक ऐसा न हो, यह कांग्रेस शाही घोषणा में प्रकाशित भावों का राजभक्ति पूर्वक स्वागत करती है और विश्वास रखती है कि अधिकारी और प्रजा दोनों मिलकर शासन सुधारों को कार्यान्वित करने में इस प्रकार सहयोग करेंगे कि जिससे पूर्ण उत्तरदायी शासन शीघ्र स्थापित हो। यह कांग्रेस माननीय मांटेग्यू को इस सिलसिले में किये गये उनके परिश्रम के लिए हार्दिक धन्यवाद देती है।’’
अमृतसर कांग्रेस में गांधीजी के इस संंशोधन को स्वीकार कर लिया गया। लोगों ने करतल ध्वनि से गांधीजी के संशोधन प्रस्ताव का स्वागत किया। बैठक के अंत में पहली बार ‘महात्मा गांधी की जय’ का उद्घोष सुनने को मिला। इसके पश्चात तो यह नारा कांग्रेस की परंपरा ही बन गया था। अमृतसर कांग्रेस में लोकमान्य तिलक भी उपस्थित थे। उन्होंने अपना संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए ‘प्रतियोगी सहयोग’ के अपने विचार को रखने का प्रयास किया था। गांधीजी और तिलक जी के प्रस्तावों का निष्कर्ष निकाल कर अब नया  प्रस्ताव पारित किया गया।  क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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