जब बलिदानों को गांधी जी ने कह दिया था ‘पागलपन’-(भाग-2)

  • 2015-10-17 01:00:24.0
  • राकेश कुमार आर्य

‘‘यह कांग्रेस विश्वास करती है कि जब तक इस प्रकार की कार्रवाई नही की जाती, तब तक जहां तक संभव हो, लोग सुधारों को इसी प्रकार काम में लायें, जिससे भारतवर्ष में शीघ्र पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना हो सके। सुधारों के संबंध में मांटेगू महोदय ने जो श्रम किया है उसके लिए यह कांग्रेस उन्हें धन्यवाद देती है।’’

इस अधिवेशन में उपस्थित रहे नवयुवकों में से एक नवयुवक ने तिलक जी से पूछा-‘‘आप कहते हैं कि अब आपका स्वास्थ्य अच्छा नही, और आप कुछ विश्राम करना चाहते हैं। ऐसी दशा में हमारा मार्गदर्शन कौन करेगा?’’ तब लोकमान्य ने उत्तर दिया-‘‘अब गांधी राष्ट्र का मार्गप्रदर्शक होगा। वही भावी नेता है।’’

गांधी को तिलक ने भावी नेता भी घोषित कर दिया और ‘गांधी जी की जय’ के साथ उनका संशोधन प्रस्ताव भी पारित हो गया, परंतु कांग्रेस में इस सबके उपरांत भी सब कुछ सामान्य नही था। पहले दिन से ही गांधी नीति का विरोध होने लगा। राष्ट्र जिन साधनों से और जिन नीतियों से स्वतंत्र हो सकता है उन साधनों और नीतियों का गांधी नीति में अभाव स्पष्टत: झलक रहा था। सारा देश जब अंग्रेजों की अनीति और अत्याचार से निराशाजनक परिस्थितियों से गुजर रहा था तब एक ऐसा वर्ग भी था जो गांधीजी के इस प्रस्ताव से असहमत था और निस्संदेह देश का बहुत बड़ा वर्ग इसी मत का था। गांधी जी के समक्ष उस बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व देशबंधु चितरंजनदास कर रहे थे, उनके साथी कर रहे थे, परंतु देश में यह वर्ग ही बहुसंख्यक था। इसलिए गांधीजी एक पार्टी के नेता बन गये थे, पर अभी ‘लोकमान्य’ नही थे। अमृतसर अधिवेशन में ही गांधीजी की पहली बार जय बोली गयी तो बही उसी दिन गांधीजी की नीतियों के विरोध में देशबंधु ने अपना बहुत ही ओजपूर्ण भाषण दिया। जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि जहां कही संभव होगा वहां सहयोग तथा जहां संभव होगा वहां ‘अड़ंगा’ नीति काम में लाने का राष्ट्र का अधिकार सुरक्षित है। उनके विचारों में गांधी के ये शब्द छू भी नही गये थे कि यह कांग्रेस राजीभक्ति पूर्वक उत्तर देती है....। दास बाबू अड़ंगा शब्द का प्रयोग कर रहे थे उनके इस शब्द का अभिप्राय था कि यदि अंग्रेज कोई भी कानून बनाते हैं, या कोई भी ऐसा कार्य करते हैं जो भारत और भारतीय लोगों के हितों के विपरीत हो तो उसका विरोध किया जाए, और यह विरोध अंग्रेजों की चाटुकारिता करते हुए उनसे पूछकर न किया जाए कि ‘यदि आप चाहें तो हम आप का थोड़ा सा विरोध कर लें,’ अपितु यह विरोध इस राष्ट्र का सुरक्षित विशेषाधिकार माना जाना चाहिए। जिसमें उसका स्वाभिमान झलके, और जिससे उसके स्वाभिमान की रक्षा भी की जा सके। दास बाबू की दृष्टि में राष्ट्र का स्वाभिमान बेचने वाला राजभक्तिपूर्वक जैसा शब्द सर्वथा अस्वीकार्य था। सिरों की गिनती में दास बाबू का प्रस्ताव गिर गया लेकिन देश के लोकसमाज ने उनकी बात का समर्थन किया। लोकतंत्र की यह दुर्बलता है कि इसमें सभा-समाजों मेें लोग सामान्यत: अपने नायक के अनुरूप ही अपना मत व्यक्त कर देते हैं, अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार बोलने का साहस लोग नही कर पाते हैं। जो लोग ऐसा साहस दिखाते हैं, उन्हें यह लोकतंत्र ही उनका गला घोंटने का अलोकतांत्रिक दण्ड देकर दंडित करता है। यह अलग बात है कि देर सबेर लोग अपनी अंतरात्मा के अनुसार बोलने वाले से ही सहमत होते हैं, पर जब तक इतिहास कई कदम आगे बढ़ चुका होता है। अवसर तब तक अपने आप में इतिहास बन चुका होता है। सीआर दास के साथ भी यही हुआ।

अमृतसर कांग्रेस में 36000 लोग आये थे। उनके इतनी बड़ी संख्या में आने का कारण भी यही था कि देश गांधीजी के नेतृत्व में अंग्रेजों से लडऩे का कोई ठोस और क्रांतिकारी निर्णय लेगा। पर जब गांधीजी की राजभक्ति को इन लोगों ने देखा होगा तो निश्चय ही उनमें से अधिकांश को निराशा ही हाथ लगी होगी। क्योंकि ‘‘गांधी जी उत्सुक थे कि पंजाब और गुजरात में जो मारकाट लोगों की तरफ से हो गयी थी उसकी निंदा की जाए।’’ डा. पट्टाभिसीता रमैया हमें बताते हैं कि यदि कांग्रेस गांधीजी के इस प्रस्ताव को नही मानती है तो उन्होंने कह दिया था कि ‘‘यदि कांग्रेस उनके दृष्टिबिन्दु को न अपना सके, तो दृढ़ता परंतु साथ ही विनम्रता, शिष्टता और अदब के साथ कांग्रेस में वह रहने में अपनी असमर्थता प्रकट करते हैं।’’

गांधीजी का निंदा संबंधी प्रस्ताव विषय समिति में गिर गया था। जिससे निराश होकर उन्होंने ‘बड़े अदब’ से कांग्रेस छोडऩे की धमकी दे दी थी। गांधी जी जानते थे कियहां राजभक्तों का ही बोलबाला है और यदि राजभक्ति के नाम पर वह यहां से उठकर जाते हैं तो बाहर सरकार भी उनका स्वागत एक हीरो की भांति करेगी, अर्थात उनके दोनों हाथों में लड्डू थे, कांग्रेस इस स्थिति से परिचित थी। इसलिए वह गांधी को छोडऩा नही चाहती थी। ऐसी परिस्थितियों में गांधीजी की धमकी के सामने उसने झुकना ही उचित समझा। गांधीजी ने लोकतंत्र के नाम पर अलोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनायी और विषय समिति के सामने अपने गिरे हुए प्रस्ताव को पारित करा लिया।

दूसरे दिन सुबह प्रस्ताव नं. 5 स्वीकार किया गया जो इस प्रकार था-‘‘यह कांग्रेस इस बात को स्वीकार करती है, कि बहुत अधिक उत्तेजित किये जाने पर ही जनसमूह के लोग क्रोध से बावले हुए थे, तो भी पिछले अप्रैल माह में पंजाब और गुजरात के कुछ भागों में जो ज्यादतियां हुई और उनके कारण जानमाल की जो क्षति हुई, उस पर यह कांग्रेस दुख प्रकट करती है, और उन कृत्यों की निंदा करती है।’’

गांधीजी पूर्ण हठी स्वभाव के व्यक्ति थे वह लोकमत पर निजीमत को स्थापित कराने में सफल हो गये। कांग्रेस को ‘बड़े अदब’ से छोडऩे की उनकी पहली धमकी अपना प्रभाव दिखा गयी। इसके पश्चात तो ऐसी धमकियां दे देकर अपना काम निकालना उनकी प्रवृत्ति ही बन गयी थी। अब प्रसन्नचित्त गांधीजी ने अपना भाषण दिया जिसमें उन्होंने कहा-‘‘इससे बढक़र कोर्ई प्रस्ताव (नही हो सकता) कांग्रेस के सामने नही है,....मैं कहता हूं कि यदि हम लोगों ने मारकाट न की होती, जिसके कि हमारे पास बहुत प्रमाण है, और उन्हें मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर सकता हूं वीरमगाय, अहमदाबाद तथा बंबई काण्ड के उदाहरण दे देकर कि वहां हमने जानबूझकर हिंसाकाण्ड किया है, सरकार ने लोगों को भडक़ने का और गरम हो जाने का जबरदस्त कारण दिया था, तो यह बखेड़ा न खड़ा होता। लेकिन उस समय सरकार भी पागल हो गयी थी और हम भी पागल हो गये थे। मैं कहता हूं पागलपन का जवाब पागलपन से मत दो, बल्कि पागलपन के सामने समझदारी से काम लो, और देखो कि सारी बाजी आपके हाथ में है।’’

इस प्रकार एक झटके में ही जलियांवाला बाग की घटना में सम्मिलित रहे लोग गांधीजी की ओर से ‘पागलपन की मानसिकता’ वाले, मान लिये गये। देशभक्ति को लेकर शहीद हुए लोगों को भी इसी प्रकार की श्रद्घांजलि अर्पित कर दी गयी। समाप्त

सत्याग्रही गांधीजी सत्य के आग्रह के सामने सरकार को झुकाकर स्वयं ही उसके सामने झुक गये। इस झुके हुए गांधी को कांग्रेस ने अपना नेता मान लिया। चाहे गांधीजी को कांग्रेस का भावी नेता तिलक ने ही घोषित कर दिया था, पर यह सच है कि वे लोकमान्य तिलक नही थे।

अपनी पहली धमकी से गांधीजी ने कांग्रेस को यह समझा दिया था कि कांग्रेस में वही होगा जिसे वह चाहेंगे, यदि इसके विपरीत कुछ करने का प्रयास किया गया तो वह उन्हें अस्वीकार्य होगा और वह संगठन को भी छोड़ देंगे। दूसरे गांधीजी ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस अपनी राजभक्ति पूर्ण कार्यशैली का परित्याग न करे उसे जो कुछ भी मिलेगा वह अपने अधिनायकों की सेवा सुश्रूषा में ही मिलेगा। तीसरे यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार चाहे जो करे हम उसके पागल पन का प्रतिरोध पागलपन से नही करेंगे।

इस सबका परिणाम यह निकला कि सरकार गांधी के प्रति इस बात से आश्वस्त हने गयी किउनकी राजभक्ति असंदिग्ध है। इसी लिए राजभक्त राष्ट्रवादी गांधी को जीवन में कभी काला पानी की सजा या ऐसी ही किसी प्रकार की यातनाएं नही दी गयीं।

जलियांवाला बाग हत्याकांड को वास्तव में गांधीजी को इतने सामान्य रूप से नही लेना चाहिए था। पर उन्होंने इसे जिस रूप में लिया उससे ब्रिटिश सरकार के ऊपर जो उस समय मनोवैज्ञानिक दबाव बना हुआ था और वह इस बात को लेकर तनाव, असमंजस एवं दबाव में थी कि भारत के क्रांतिकारी अब इस कांड की प्रतिशोधात्मक प्रतिक्रिया क्या करेंगे, वह सारी नही तो बहुत अधिक सीमा तक कम हो गयी साथ ही देश के भीतर के उन लोगों को भी गांधीजी की राजभक्तिपूर्ण राजनीति को सफल होते देखकर झटका लगा, जो देश में क्रांति के माध्यम से स्वाधीनता लाने का प्रयास कर रहे थे। यद्यपि क्रांतिकारी अपना कार्य करते रहे पर गांधीजी की कांग्रेस ने उनके प्रति अब एक स्पष्ट दूरी बना ली। लोकमान्य तिलक के भारतीय राजनीतिक पटल से हट जाने के पश्चात अब यह निश्चित हो गया कि अब से आगे की कांग्रेस गांधीजी की कांग्रेस होगी और उसके मंच पर वही होगा जो कि गांधी चाहेंगे।

गांधीजी 1919 के दिसंबर माह में संपन्न हुई अमृतसर कांग्रेस से हठीले आत्मविश्वास से भरे राजभक्त राष्ट्रवादी नेता के रूप में लौटे। अब उन्होंने अपनी कार्यनीति पर आगे विचार करना आरंभ किया। 1920 की जनवरी उनके लिए किसी मनोरम प्रात: से कम नही थी। इसी भोर में उन्होंने असहयोग आंदोलन की रूपरेखा पर काम करना आरंभ किया। पर इस समय दो शब्द भारतीय राजनीति के मिले असहयोग और अड़ंगा। गांधीजी असहयोग पर चल निकले पर अड़ंगा शब्द भी कांग्रेस के लिए जी का जंजाल बन गया था सीआर दास और उनके साथी असहयोग में भी अड़ंगा डालने की तैयारी कर रहे थे। जिससे पेता चलता है कि गांधीजी कांग्रेस के सर्वमान्य नेता अभी भी नही बन पाये थे।...और यह भी सच है कि सर्वमान्य नेता वह कभी भी नही बन पाए।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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