जनजातीय नृत्य पर पाश्चात्य प्रभाव

  • 2016-05-16 09:30:27.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

जनजातीय नृत्य
गीत- संगीत की कलाएं जीवन में रस उत्पन्न करने के लिए आवश्यक होती हैं। इसका आकर्षण जानवर तक को अपनी ओर खिंच लेता है। वंशी की सुमधुर सुरीली आवाज सुनकर गाय, बैल तथा गोपियों का मुरली मनोहर श्रीकृष्ण की ओर बरबस खींचे चले आना , इसका सख्त उदाहरण है। यही हाल  मधुर गानों का भी है. अपनी सुध - बुध खोकर मानव इसके वश में हो जाता है द्य अगर गीत- संगीत के साथ नृत्य का भी समावेश हो, तो फिर कहने ही क्या ?




समस्त विश्व के साथ हमारे देश भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों की भान्तिही झारखण्ड और सीमावर्ती प्रदेशों के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाली बनवासी जनजातियाँभी अपने गीत- संगीत एवं नृत्य की चिरंतन-परम्परा पर गर्व कर सकती है, और इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं ही द्य पुरातन काल से ही नृत्य वनजातीय अथवा जनजातीय  परम्पराओं में आदिवासियों की आदिवासियों की संस्कृति तथा उनके जीवन का एक आवश्यक अंग रहा है द्य कहा जाता है कि, एक वनजाति जो नाचना जानती है , कभी मर नहीं सकती द्य इसके मूल में यही रहा है कि व्यक्ति और जाति के अस्तित्व की रक्षा ही इसका कार्य है। नृत्य आदिवासी- संस्कृति का एक अविभाज्य अंग है द्य वनजाति अर्थात आदिवासी समाज में नृत्य की प्रधानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रत्येक मौसम में, जीवन के प्रत्येक क्षण नृत्य से ओत- प्रोत होते हैं। प्रसन्नता, उदासी, जुदाई, पूजा, आदि प्रत्येक अवसरों पर जनजातीय समाज में गीत, संगीत, नृत्य का प्रचलन है। ये नृत्य जनजातियों के प्राय: हरेक पक्षों, यथा, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनितिक आदि में उद्भासित होते रहते हैं और इस तरह उनकी सांस्कृतिक विरासत उनके नृत्यों की लंबी परम्परा में अक्षुण बनी रहती है। आदिवासी समाज और संस्कृति यथार्थ रूप में जानने के लिए उनके जीवन के अविभाज्य अंग के रूप में सम्मिलित उनकी नृत्य-परम्परा का अध्ययन समीचीन जान पड़ता है।

गीत-संगीत एवं नृत्यप्रियता वनवासी आदिवासियों का एक स्वाभाविक गुण है जो उतने ही प्राचीन हैं जितना कि  मानव समाज तथा यह उसी तरह विस्तृत है जिस तरह उनकी जाति द्य आधुनिक युग के वनवासी जनजातीय समुदायों में भी नृत्य की यह प्राचीन परम्परा बड़े ही विस्तृत रूप में देखने को मिलती है, फिर भी समय - समय पर इनमें गीत- संगीत-नृत्य को कर्णप्रिय, आकर्षक एवं मनोहारी बनाने के लिए अथवा अन्यान्य प्रेरणाओं के आधार पर जनजातियों के संगीत-नृत्य की भावनाओं में तीव्र बदलाव देखने को मिला है तथा ये पाश्चात्य एवं लोक धुनों से, संगीतों से लबरेज हो रहे हैं द्य जनजातीय लोग नृत्य को अत्यन्त महत्व देते हैं तथा प्रतिदिन रात्रि को स्त्री - पुरूष गाँव के अखाड़े में एकत्रित होते हैं और नाचते-गाते हैं। ऐसा प्राय: प्रत्येक रात्रि को होता है. पर्व-त्योहारों एवं अन्य अवसरों पर जनजातियों का यह मस्ती भरा आलम और भी कई दिनों तक चलता रहता है। लडकियाँ और महिलायें भी इस नृत्य में बढ़- चढ कर भाग लेती हैं और पूरा अखाड़ा स्त्री-पुरूष और युवक-युवतियों से सहसा भर उठता है।

वनजातीय आदिवासी नृत्य- संगीत स्वर एवं पद की स्वाभाविक गतियों पर आधारित होते हैं। इन संगीत-नृत्यों के पीछे एक शक्तिशाली संवेगात्मक भाव होता है। प्रकृति की सुरम्य वादियों से चित्रित वातावरण एवं जनजातीय जीवन की सरलता के परिणामस्वरूप इन संगीत एवं नृत्यों के शक्तिशाली संवेगात्मक भाव और भी उद्दीप्त हो उठते हैं। जनजातियों के गाँवों में  धुमकुरिया अर्थात युवा गृह और अखाड़े ये दो संस्थाएं महत्वपूर्ण होती हैं, जिनमें आदिवासी नृत्य शैली व गीत- संगीत के उद्भव-विकास, पोषण एवं परस्पर सम्बद्धता बनाये रखने के लिए अनेक कार्य संचालित किये जाते हैं द्य युवा गृह जनजातियों के सामाजिक जीवन का एक प्रमुख नाग है, जिसका प्रचलन प्राय: सभी जनजातियों में देखने को मिलता है। विभिन्न जनजातियों में इस संस्था का अलग- अलग नाम है द्य उराँव जनजाति में युवा गृह को कुँवारों का घर, कुडुख भाषा में जोख-अरपा, मुण्डा तथा हो में गतिओरा अथवा गितिओरा और खडिय़ा, बिरहोर और एवं तीनों प्रकार के नागाओं में भी युवा गृह के अपने प्रचलित नाम हैं। अनेक जनजातियों के बस्तियों में लडक़े एवं लड़कियों का युवा गृह अलग-अलग होता है। लड़कियों के युवा गृह की देख-बहाल वृद्धा अथवा विधवाएं करती हैं। जनजातियों के अनेक परम्परागत पर्व-त्योहार, उत्सव- समारोह नृत्य के साथ इस प्रकार सम्बंधित हो चुके हैं कि उन्हें एक- दूसरे से अलग कर इनका लुत्फ़ उठा पाना, मजा ले पाना अत्यन्त कठिन है द्य वस्तुत: जनजातियों के उत्सव एवं समारोह इनसे सम्बंधित नृत्य के ही परिप्रेख्य में समझे जा सकते हैं।

चावल से निर्मित एक प्रकार का परम्परागत नशीला पेय पदार्थ हडिय़ा और अविवाहित-विवाहित वनवासी आदिवासी युवक- युवतियों का उन्मुक्त मिलन के साथ इनके नृत्य, गीत तथा  संगीत के वाद्य में अतिरिक्त उत्साह, मस्ती के आलम तथा उमंग को दुगुने जोश से भर देते हैं। समस्त जनजातीय समुदाय की भान्ति ही झारखण्ड और इसके सीमावर्ती प्रान्तों यथा, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश और उडीसा आदि प्रान्तों में  निवास करने वाली एक प्रमुख जनजाति उराँव जनजाति के लोग भी नृत्य के साथ गीत-संगीत को काफी महत्व देते हैं तथा नृत्य इनके जीवन का एक प्रमुख साधन है। दिनभर की कठोर हाड़ -तोड़ परिश्रम के पश्चात प्रतिदिन रात्रि को अखाड़े में उराँव नाचते- गाते हैं द्य पर्व- त्योहारों के अवसरों पर इनका यह नाच-गान का सिलसिला कई दिनों तक चलता ही रहता है। विभिन्न वय के युवक-युवती, स्त्री-पुरूष पंक्तियों में पृथक-पृथक नृत्य करते हैं तथा भान्ति- भान्ति के गाने गाते हैं। मनोरंजन के साथ ही उराँव लोग नाचते समय वर्षा के लिए , बीमारी से मुक्ति , पशुओं की रक्षा तथा कृषि की उन्नति के लिए भी प्रार्थना भी करते हैं। उराँव प्रत्येक पर्व - त्योहार पर अलग-अलग प्रकार का नृत्य तथा तरह-तरह के गाने गाते हैं।

उराँव के साथ ही अन्य जनजाति में भी प्रत्येक पर्व- त्योहार पर इनके अलग - अलग नृत्य तथा तरह - तरह के गाने हैं द्य मुण्डा, खडिय़ा, हो, बिरहोर एवं संथाली आदि जनजातियों में भी पर्व - त्योहार पर किस्म-किस्म के गाने, वाद्य- यंत्रों की धमधमाती गूंज के मध्य भान्ति-भान्ति के नृत्य होते हैं। प्राय: सभी जनजातियों में वर्षा एवं कृषि की उन्नत्ति, बीमारियों से रक्षा आदि के लिए प्रार्थना करने की परिपाटी है।

इस प्रकार नृत्य जनजातीय संस्कृति का एक अविभाज्य अंग है तथा यह गाँव की कुछ संस्थाओं और रीति-रिवाजों से सम्बंधित है।
-अशोक प्रवृद्ध