भारत में मताधिकार लोकतंत्र और कांग्रेस

  • 2016-05-18 05:24:58.0
  • राकेश कुमार आर्य

मताधिकार
अथर्ववेद (12/1/11) में आया है कि-‘‘हे मातृभूमि! तेरी पहाडिय़ां और बर्फ से ढके पहाड़ व वन जंगल हमें सुखदायक हों, भरण पोषण करने वाली, कृषि योग्य उपजाऊ भूरे काले और लाल रंगों वाली तथा अनेक रूपों वाली और स्थिरता वाली सबका आश्रय स्थान, विस्तृत तथा विस्तार वाली और ख्याति देने वाली, सम्राट से सुरक्षित अपनी मातृभूमि पर मैं पूर्ण आयुवाला, अहिंसित तथा सब प्रकार के कष्टों से रहित आनंदपूर्वक अधिष्ठित रहूं।’’ कहने का अभिप्राय है कि हमारे देश की राज्य व्यवस्था ऐसी हो कि बर्फीले पहाड़ों से लेकर छोटी-छोटी पहाडिय़ां जंगल व विभिन्न प्रकार की मृदाओं का राष्ट्र कल्याण के लिए सर्वोत्तम उपयोग हो। लोग राष्ट्र में निर्भय होकर रहें। प्रशासन राष्ट्र को सुदृढ़ और सुरक्षित करे एवं प्रत्येक नागरिक स्वस्थ नीरोग होकर पूर्ण जीवन सानन्द रहे।

वेद में ऐसी अनेकों ऋचाएं हैं जहां राष्ट्र आराधना का उत्कृष्ट भाव प्रदर्शन होता है और जिन्हें पढक़र या समझ कर हमें अपनी मातृभूमि के प्रति अपनी सामूहिक चेतना को सदा जागृत रखने की प्रेरणा मिलती है। इन ऋचाओं के प्रभाव से हर देशवासी कह उठता है-‘वयम् राष्ट्रे जागृयाम्’। राष्ट्र जागरण का अभिप्राय उस सामूहिक चेतना के प्रति सबके सामूहिक प्रयास करने से है जो हमें एकता के भावों में बांधती है और सदा एक दूसरे के लिए हम कुछ त्याग करने के लिए भीतर से ही प्रेरित रहते हैं। हमारी संवेदनाएं दूसरों के लिए जागती हैं, दूसरों के लिए सोचती हैं और दूसरों के लिए कुछ करती हैं। देश की राज्यव्यवस्था भी ऐसी ही होनी चाहिए जो देश के नागरिकों को एक दूसरे के प्रति कुछ करने के लिए प्रेरित करे। जिस देश के लेागों का और देश की राज्यव्यवस्था का चिंतन ऐसा होता है, वहीं वास्तव में लोकतंत्र होता है।

वैदिक चिंतन के सर्वथा विपरीत इस्लाम का चिंतन है जो व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ता नही अपितु काटता है, बांटता है और उसे संकीर्ण बनाता है। वैदिक संस्कृति का समष्टिवादी मौलिक चिंतन इस व्यष्टिवादी विचारधारा के साथ समन्वय नही बना सकता। बस यही वह बिंदु है जिसे लेकर भारत में इस्लाम हिंदुत्व से टकराता रहा है। वैदिक चिंतन कहता है कि समष्टिवादी बनो और इसी रास्ते पर आ जाओ और इस्लाम कहता है कि व्यष्टिवादी बनो और इसी रास्ते पर आ जाओ।

डा. अंबेडकर कहते हैं :-‘‘इस्लाम का भ्रातृत्ववाद सार्वभौम भ्रातृत्ववाद नही है। यह मुसलमानों का केवल मुसलमानों के लिए भाईचारा है। बंधुत्व तो है किंतु उसका लाभ केवल उन्हीं तक सीमित है जो इस्लामी दायरे के भीतर हैं। जो उसके बाहर हैं उनके लिए शत्रुता और घृणा के अतिरिक्त और कुछ नही है। दूसरे शब्दों में इस्लाम इसकी अनुमति नही देता कि एक धर्मनिष्ठ मुसलमान भारत को अपनी मातृभूमि स्वीकार करे तथा हिंदुओं से किसी प्रकार का कोई संबंध जोड़े। जब तक यह ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विद्वेष बना रहेगा, हिंदू तथा मुसलमानों के बीच के इस सहज विरोध के स्थान पर उनसे एकता की आशा करना अस्वाभाविक है।’’ इसी बात को मदनी साहब को भी स्वीकार करना पड़ा था जब उन्होंने कहा था-‘‘जीवनोपरांत दृष्टि से हिंदू मुस्लिम संयुक्त राष्ट्रीयता एक अस्थाई स्थिति है। वास्तव में इसकी आवश्यकता उसी समय तक है जब तक किसी देश में विभिन्न धर्मों (हिंदू और मुस्लिम) के लोग बसते हैं। जब सभी को मुसलमान बना लिया जाए जो कि सर्वप्रथम और वास्तविक ध्येय है तो यह अस्थायी स्थिति स्वयं ही समाप्त हो जाती है।’’

भारत में जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया गया उसका सबसे बड़ा दोष ये है कि यह व्यवस्था शरीर से तो भारतीय है पर आत्मा से विदेशी है। इसकी आत्मा देशवासियों को शरीर के भारतीय होने को दिखा-दिखाकर छलती है। जब देश स्वतंत्र हुआ तो देश में व्यस्क मताधिकार देने की व्यवस्था की गयी। व्यस्क मताधिकार देने की हमारी यह संवैधानिक व्यवस्था हमारे लोकतंत्र के शरीर का बाह्य रूप था। लोग छले गये उन्होंने सोचा कि हमें बहुत बड़ा हथियार मिल गया है जिसे अपनाकर हम अच्छे से अच्छे शासक और शक्तिसंपन्न व्यक्ति को भी सत्ताशीर्ष से उठाकर धरती पर पटक सकते हैं। इसमें दो मत नही कि व्यस्क मताधिकार ने एक बार नही कई बार सत्ताशीर्ष के समीकरणों को परिवर्तित करने में सफलता भी प्राप्त की है।

हम व्यस्क मताधिकार के विरोधी नही हैं परंतु हम इसके दुरूपयोग को रोकने में असफल हुए और इसके हाथों बिक गये, यह लोकतंत्र के विरूद्घ हैं। जिसके कारण आज की सारी व्यवस्था ही चौपट होकर रह गयी है। इसका कारण है कि जिस समय देश को स्वतंत्रता मिली और इस देश के लोगों ने अपना संविधान बनाकर उसके अनुसार अपना शासन करना आरंभ किया उसी समय देश के लोगों के भीतर भी अपनी-अपनी मजहबी व्यवस्थाओं को आगे रखकर चिंतन चल रहा था। वैदिक सनातन धर्मी हिंदू अपनी वैदिक चिंतन धारा के अनुसार इस देश का निर्माण होता देख रहा था। उसका मानना था कि सदियों के संघर्ष के पश्चात जो स्वतंत्रता मिली है उसका सदुपयोग करते हुए ऐसी सरकारों का गठन अब किया जाया करेगा जो भारत की ‘सामासिक संस्कृति’ को बढ़ावा देने वाली धारणाओं, सिद्घांतों, मान्यताओं और परंपराओं का पालन करेंगी। इन लोगों को आशा थी कि हमारा लोकतंत्र लोकछल और लोक विखण्डन की सारी इस्लामिक या ब्रिटिश षडय़ंत्रकारी नीतियों का परित्याग करेगा और ऐसे समस्त उपाय करेगा जिनसे इस सनातन देश की सनातन संस्कृति की रक्षा हो सके। उनका चिंतन ठीक था, लोकतंत्र की आत्मा के भी अनुकूल था।

दूसरी ओर इस्लाम और ईसाइयत थे इन्होंने लोकतंत्र में व्यस्क मताधिकार की व्यवस्था का अपने हितों के अनुकूल प्रयोग करना आरंभ किया। इन्होंने नाम शेष रहकर भी पचास-सौ वर्षीय दीर्घकालीन योजना बनायी और विचार किया कि व्यस्क मताधिकार को आधार बनाकर संसदीय या विधानसभाई क्षेत्रों पर जनसंख्या के आधार पर अपना नियंत्रण स्थापित कर वैदिक संस्कृति की जड़ें उखाडक़र इस देश को इस्लाम या ईसाइयत के रंग में पुन: रंगा जाए। जिस वैदिक ऋचा का उल्लेख हमने इस आलेख के आरंभ में किया है इस्लाम और ईसाइयत ने उसके विपरीत जाकर कार्य करना आरंभ किया। व्यस्क मताधिकार को अपना हथियार बनाकर इनका चिंतन इस प्रकार बना कि जिन प्रदेशों में हमारी जैसी जनसंख्या है हम उसका प्रयोग करते हुए ऐसे दल या व्यक्ति को अपना मत देंगे जो हमारे देशघाती कार्यों को भी उचित कहे और उन्हें जारी रखने में हमारी सहायता भी करे। इस विकृत और विखण्डन को बढ़ावा देने वाले चिंतन को लेकर जो लोग आगे बढ़े उन्होंने अपना सामूहिक मतदान किसी एक व्यक्ति या दल को देने का निश्चय किया। बदले में उनसे यह वचन लिया कि हम अपने क्षेत्र में जो चाहे सो करें तुम कुछ नही कहोगे।

‘घुटने टेक’ भारत की राजनीति के कर्णधारों ने इस प्रकार की ऐसे लोगों की मांग को राष्ट्रविरोधी न मानकर लोकतंत्र के अनुकूल मानने की घोषणा के साथ भारत के लोकतंत्र और राजनीति को इनके दर पर गिरवी रख दिया और इन्हें आश्वासन दे दिया कि हम हर पांच वर्ष पश्चात आपके पास अपनी इन दोनों अनमोल वस्तुओं को देखने के लिए आया करेंगे। हमारे आने के बाद आप हमें हमारी दोनों चीजों को दिखा दिया करेंगे और हम आपको इन दोनों के आपके हाथों में सुरक्षित होने का प्रमाण पत्र देकर लौट जाया करेंगे, तब आप चलते समय हमें हमारी विदाई में ‘वोटों का सूटकेस’ दे दिया करना। पाठकवृन्द! इसी सौदे से देश का लोकतंत्र आज तक गिरवी रखा हुआ है और पिछले 70 वर्षों से यह देश इस राज को नही समझ पाया कि ऐसा कब, क्यों किसने और कहां कर दिया? व्यस्क मताधिकार हमारे लिए गले की हड्डी बनकर रह गया है।

60-70 वर्ष पहले जिन लोगों ने हमारे लोकतंत्र का अपहरण व्यस्क मताधिकार के नाम पर किया था वे अब कई प्रदेशों में अपनी संख्या बढ़ाते जा रहे हैं। जहां-जहां वे बढ़ रहे हैं वहां-वहां से भारतीयता उखड़ रही है, भारत का वैदिक चिंतन उखड़ रहा है और भारत की संस्कृति का लोप हो रहा है। इस ‘पाप’ को करने में कांग्रेस की विशेष भूमिका रही थी पर अब यह अपने पाप का फल भोग रही है। जहां-जहां इसने भारतीयता को नष्ट कराने में सहायता की वहां-वहां से ही लोगों ने इसे उखाडऩा आरंभ कर दिया है। इसने देशविरोधी विचारधाराओं को देश की धरती पर फूलने फ लने  दिया था आज वही देश विरोधी विचारधाराएं इसे खाये जा रही हैं। ‘कांग्रेस विहीन’ भारत करने में मोदीजी उतने सफल नही रहे हैं जितनी सफलता अब कांग्रेस के पापों का परिणाम आने से मिलती दिखाई दी हैं। आसाम, पश्चिमी बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पांडिचेरी के चुनाव परिणामों की यदि इसी प्रकार समीक्षा की जाए तो लोगों को सच का पता चल जाएगा। पर हमें पता है कि तथाकथित बुद्घिजीवी चुनाव समीक्षक इन चुनाव परिणामों की इस प्रकार समीक्षा नही करेंगे, क्योंकि सच को सच कहने का साहस उनमें नही है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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