विश्व को बनायें आनंद का सागर

  • 2016-01-01 02:30:12.0
  • राकेश कुमार आर्य

यद्यपि ईसवी सन भारतीय परंपरा और वैज्ञानिक नियमों के अनुकूल नही है। परंतु फिर भी एक परंपरा का पालन करते हुए इस नववर्ष पर सभी साथियों, इष्ट मित्रों, बंधु बांधवों और ‘उगता भारत’ के प्रिय पाठकों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

इस समय समस्त संसार पारस्परिक ईष्र्या-द्वेष और घृणा की आग में जला जा रहा है, सर्वत्र कलह और कटुता का परिवेश है। बीते हुए वर्ष 2015 ने इस घृणास्पद परिवेश को घटाने के स्थान पर बढ़ाने में ही सहयोग दिया था। बीते वर्ष के जाते-जाते सीरिया में एक आशा की किरण दिखाई दी जब वहां पिछले तीन वर्षों से चले आ रहे युद्घ को रोकने पर विश्व की दो शक्तियों रूस और अमेरिका ने शुभ संकेत दिये और सुरक्षा परिषद ने वर्ष 2015 के अंतिम शुक्रवार को सीरिया के लिए एक अच्छी योजना को स्वीकृति प्रदान की। युद्घ की विभीषिकाओं को झेलते सीरियावासियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई इस सुखदायक पहल का स्वागत किया है और वर्ष 2016 में वे बड़ी आशाओं के साथ पदार्पण कर रहे हैं। ईश्वर ऐसी ही खुशियां शेष विश्व के उन सभी लोगों को दिलाये जी उत्पीडऩ, दलन, शोषण और उपेक्षा के कारण जीवन की खुशियों को ही भूले पड़े हैं, और किसी न किसी प्रकार के अत्याचारों को सदियों से या पीढिय़ों से सह रहे हैं। इनमें भारत में कश्मीर से पलायन कर गये कश्मीरी पंडितों के परिवार भी सम्मिलित हैं। ऐसे लोगों का पुन: स्थापन अपने गृह प्रदेशों में हो और वह अपने जीवन की खुशियों का आनंद मना सकें, क्योंकि उन्हीं की शुभकामनाएं हमारे मंगल में वृद्घि का कारण बनेंगी। हम सुखी इसलिए ही नही हैं कि विश्व के अधिकांश लोग आज भी स्वतंत्रता से वंचित हैं, और शोषण व उत्पीडऩ का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जिस दुनिया ने उनकी खुशियों पर पहरा लगाया है वे उस दुनिया के लिए चौबीसों घंटे यही कहते हैं कि-‘ऐ निर्मम दुनिया! तेरा नाश हो।’
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विश्व में चारों ओर आतंक की खेती करने वाले लोग, या धनबल या ‘गन’ बल से लोगों को अधिकार विहीनकर उनकी स्वतंत्रता का हनन करने वाले लोग आज भी अपने इन कार्यों से दुनिया के एक बहुत बड़े वर्ग को गुलाम बनाकर रख रहे हैं, जिन्हें यह ज्ञात ही नही हो पाता कि कब नयावर्ष आ गया और कब पुराना वर्ष चला गया। कदाचित यही कारण है कि हम सभी  विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। शंका-आशंकाओं में घिरे व्यक्ति के होठों पर चाहे, कितने ही प्यारे और कर्णप्रिय शब्द क्यों न हों पर उसके हृदय में रेगिस्तानी धूल उड़ रही है, वहां तो पानी की एक बूंद भी नही है। इसलिए तथाकथित विद्वान भी भीतर से प्यासे हैं, निराश हैं, हताश हैं। कारण कि विद्वत्ता का लबादा तो पहन लिया है पर उन लोगों के कल्याण के लिए कुछ नही कर पाये जो विश्व में सर्वाधिक हैं और किसी न किसी प्रकार से हताश और दुखी हैं।

नये वर्ष में हम एक ऐसे विश्व की मंगलकामना के साथ पदार्पण कर रहे हैं, जो सुखी-संपन्न और समृद्घ लोगों से बना हुआ हो, जिसमें अन्याय और अत्याचार के विरूद्घ लडऩे की इच्छाशक्ति हो और आतंक की खेती करके जो लोग विश्व की शांति व्यवस्था को भंग कर रहे हैं या करने का प्रयास करते रहते हैं उनके विरूद्घ कठोर कार्यवाही करने की इच्छाशक्ति हो, एक ऐसा सुंदर विश्व जो निर्धनों, असहायों, दुर्बलों और  किसी भी प्रकार से अक्षम लोगों के प्रति दयाभाव रखने वाला हो और उन्हें अपने साथ लेकर चलने की भावना रखने वाला हो। हम इस नयेवर्ष में  हर प्राणी के जीवन का सम्मान करना सीखें, किसी प्राणी को उसके जीने के अधिकार से केवल इसलिए न वंचित कर दें कि उसे एक वर्ग के लोग अपनी धार्मिक श्रद्घा के साथ देखते हैं और केवल उसे इसीलिए मारकर खा लिया जाए कि इससे दूसरे वर्ग को कष्ट हो, दूसरा वर्ग भी यह ध्यान रखे कि यह देश सबका है, यह धरती सबकी है, यह सूर्य सबका है और यह चंद्रमा सबका है, इसलिए सबको जीने का समान अधिकार है। हम चौदहवीं शताब्दी की किसी भयंकर साम्प्रदायिकता के शिकार न हों और किसी ऐसी सोच के शिकार न हों जो दूसरों के अधिकारों का हनन करने के लिए हमें प्रेरित करती हो।  उसी से हमारा सबका कल्याण हो पाना संभव है। ऐसी भावना से नया वर्ष मंगल मय होगा। जितनी आंखों के आंसू कम होते जाएंगे उतना ही विश्व आनंद का सागर बनता जाएगा। आईए हम सब मिलकर नववर्ष में इस घृणा से भरे विश्व को प्रेम के आनंद का सागर बनायें और सब मिलकर आगे बढ़ें।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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