विश्वविजेता सिकंदर की भारत विजय: एक भ्रम-भाग-3

  • 2015-10-09 03:00:12.0
  • उगता भारत ब्यूरो

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

क्या ऐसे व्यक्ति से सपने में भी यह आशा की जा सकती है कि उसने पुरु जैसे शत्रु के साथ दया और उदारता का व्यवहार किया होगा जिसने उसकी अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया, और युद्ध में जिसके पहले ही प्रहार से सिकंदर घोड़े से गिर पड़ा और घायल हो गया?

7.0 क्षमा दान किसे ? पुरु को या सिकंदर को ?

भारत में सिकंदर द्वारा अपने शत्रु पुरु के  क्षमादान  की चर्चा करने वाले लेखक सिकंदर को महिमा- मंडित करने के चक्कर में यह भूल ही गए कि पहले वे सिकंदर की क्रूरता के भी ढेरों प्रमाण प्रस्तुत कर चुके हैं । यह भी भूल गए कि  क्रूरता  और  क्षमा  परस्पर संचारी नहीं , विरोधी भाव हैं । ऐसा लगता है कि उन्होंने नाटक के पात्र बदल दिए और जो संवाद वास्तव में पुरु के थे, वे सिकंदर से कहलवा दिए । सिकंदर के घमंडी , निर्दयी, और क्रूर व्यवहार के अलावा इस प्रकार की शंका करने के अन्य भी अनेक कारण हैं ।

ये ही लेखक बता चुके हैं कि सिकंदर ने जिस भी स्थान को जीता, उसे उजाड़ कर अपने  असुर विजयी नृप  होने का परिचय दिया , तो फिर भारत इसका अपवाद कैसे बन गया? इन्ही लेखकों ने यह भी लिखा है कि सिकंदर तो अभी और आगे जाना चाहता था, पर उसकी सेना अब युद्ध करते - करते थक गई थी, ऊब गई थी और उसे घर की याद सताने लगी थी । अत: उसने विद्रोह कर दिया और सिकंदर को वापस जाने का निश्चय करना पड़ा । आश्चर्य होता है कि जो सेना  विश्व - विजय  के लिए निकली थी , जो बराबर विजय प्राप्त करती जा रही थी , और इस प्रकार सफलता जिसके कदम चूम रही थी, वह ( पुरु से युद्ध करने के बाद, और ध्यान रखिए कि यह युद्ध  महाभारत  की तरह कोई अठारह दिन नहीं , एक दिन , केवल एक दिन हुआ था , उसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि सेना ) एकाएक थकान का अनुभव करने लगी , ऊब गई , उसे घर की याद सताने लगी और वह भी इस बुरी तरह कि विजय - अभियान बीच में ही छोडक़र वापस जाने के लिए  विद्रोह  पर आमादा हो गई ? इस एक दिन से पहले तो थकान , ऊब , घर की याद की कोई चर्चा नहीं की गई ! थकान और ऊब विजयी व्यक्ति को सताती है या हारे हुए को ? कहीं ये विवरण अपने गर्भ में सिकंदर की पराजय की कहानी तो नहीं छिपाए बैठे हैं ?

यूरोपीय इतिहासकारों ने जो विवरण प्रामाणिक बताकर प्रसारित किए हैं , उनके विपरीत अन्य देशों के लेखक कुछ और ही कहते हैं ।

8.0 यूरोपीयेतर साहित्य में सिकंदर

8.1 फारसी साहित्य

एक ओर तो यूरोपीय लेखकों के परस्पर विरोधी विवरणों में ही अनेक ऐसे प्रसंग हैं जो तरह - तरह की शंकाओं को बल प्रदान करते है, तो दूसरी ओर जानकारी के कतिपय अन्य स्रोतों से भी चित्र कुछ और ही उभरता है। फारसी के प्रसिद्ध कवि और इतिहासकार  फिरदौसी  ने अब से लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व ईरान के शासकों का सिलसिलेवार इतिहास अपनी प्रसिद्ध कृति  शाहनामा  में लिखा । इसमें प्रसंगवश भारत पर सिकंदर के आक्रमण की चर्चा करते हुए लिखा है :

सिकंदर बद- ऊ गोफ्त कय नामदार ,

दो लश्कर शेकस्त: शुद अज कारज़ार ,

हामी दामो - ददे मगज़े मर्दुम खरद ,

हमी नअले - अस्प उस्तुखान बेस्परद ,

दो मर्दीम हर दू देलीरो जवान ,

सुखनगूयो वा मगज दू पहलवान

( शाहनामा , भाग 7 , शाहनामा प्रेस, मुंबई, 1916 , पृष्ठ 81 )

अर्थात युद्ध में अपनी सेना का विनाश देखकर सिकंदर व्याकुल हो गया। उसने राजा पुरु से विनीत भाव से कहा, ‘ हे मान्यवर, हम दोनों की सेनाओं का नाश हो रहा है। वन के पशु सैनिकों के भेजे नोच रहे हैं और घोड़ों की नालों से उनकी हड्डियाँ घिस गई हैं। हम दोनों वीर, योद्धा और बुद्धिमान हैं। इसलिए सेना का विनाश क्यों हो और युद्ध के बाद उनको नीरस जीवन क्यों मिले ?

जऱा विचार कीजिए, ऐसे शब्द युद्ध जीतने वाला कहेगा या हारने वाला ?

8.2 इथियोपिक टेक्स्ट

फारसी के अतिरिक्त अन्य प्राचीन भाषाओं में भी ऐसी सामग्री मिलती है जो यूरोपीय लेखकों द्वारा प्रचारित किए गए तथ्यों से मेल नहीं खाती। इथियोपिया (अफ्रीका) में सिकंदर से सम्बन्धित विभिन्न लेखकों के लिखे कतिपय ग्रन्थ मिले हैं जो इथियोपियाई, अरबी, हिब्रू आदि भाषाओं में हैं। इन्हें ब्रिटिश म्यूजियम के बहु -भाषाविद सर अर्नेस्ट अल्फ्रेड वालिस (1857 - 1934 ) ने  ( प्रकाशक  सी जे क्ले एंड संस, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस वेयरहॉउस, लन्दन 1896 ) नाम से अंग्रेजी अनुवाद सहित संपादित किया है। इसे  इथियोपिक टेक्स्ट  भी कहते हैं। इसके एक ग्रन्थ के अनुसार अपने साथियों को मरते देख सिकंदर के सैनिकों ने शस्त्र फेंक कर शत्रु ( पुरु ) की ओर जाना चाहा। सिकंदर स्वयं बड़े संकट में था। अपने सैनिकों के इरादे का पता चलते ही वह युद्ध रोकने की आज्ञा देकर इस प्रकार विलाप करने लगा ,  ओ भारतीय सम्राट, मुझे क्षमा कर। मैं तेरा शौर्य और बल जान गया हूँ। अब यह विपत्ति मुझसे सहन नहीं होती। मेरा हृदय पूरी तरह दुखी है। इस समय मैं अपना जीवन समाप्त करने की इच्छा करता हूँ। परन्तु मैं नहीं चाहता कि ये जो मेरे साथ हैं वे बरबाद हो जाएँ क्योंकि मैं ही वह व्यक्ति हूँ जो इन्हें यहाँ मृत्यु के मुख में ले आया हूँ। यह एक राजा के लिए किसी भी प्रकार उचित नहीं है कि वह अपने सैनिकों को मौत के मुंह में धकेल दे ( पृष्ठ 123 ) । सिकंदर की भारत विजय की जो कहानी  प्रामाणिक  बताकर हमें सुनाई जाती है, ये विवरण उससे मेल नहीं खाते। उधर सिकंदर की वापसी यात्रा की जो कहानी बताई जाती है, उसमें भी कई असंगतियाँ हैं।

9.0 सिकंदर की वापसी यात्रा

जिस मार्ग से वह आया था, उससे वापस नहीं गया। उसने ऐसा क्यों किया, इस पर मतभेद है। कुछ लोगों का कहना है कि आते समय उसने जिन लोगों के साथ विश्वासघात किया था, उसे डर था कि कहीं वे लोग बदला लेने को तैयार न बैठे हों (विश्व विजेता का डर देखिए और यह भी ध्यान रखिए कि जिस एरियन ने सिकंदर का प्रशस्ति गान किया है, उसी ने उसे  धूर्त  भी बताया है,  196   दूसरे लोगों का मानना है कि नए स्थान देखने की इच्छा से उसने ऐसा निश्चय किया। उसने सेना को दो भागों में (कुछ लेखकों के अनुसार तीन भागों में ) बाँट दिया (प्रश्न किया जा सकता है कि जब नए स्थान ही देखने थे तो सेना को दो/तीन भागों में बांटने की क्या आवश्यकता थी ?   एक बेड़ा अपने सेनापति निआरकस को सौंप दिया और उसे जलमार्ग से वापस जाने का आदेश दिया। दूसरा बेड़ा अपने साथ रखकर मकरान के मरुस्थल के मार्ग से जाने का निश्चय किया। यह तथ्य फिर ध्यान देने योग्य है कि मकरान के मरुस्थल की दुश्वारियां ‘ अज्ञात ‘ नहीं,  सर्व ज्ञात  थीं। फिर भी सिकंदर इसी मार्ग पर चल दिया (विश्व विजेता था इसलिए, या अन्य कोई विकल्प नहीं था, इसलिए ?  सिकंदर की इस यात्रा का वर्णन एरियन ने काफी विस्तार से और बड़ी करुण भाषा में किया है। उसने लिखा है कि झुलसाने वाली गर्मी और पानी के अभाव ने सिकंदर , उसके सैनिकों और पशुओं को मौत के मुंह में धकेल दिया। रेत के टीलों पर चढऩा - उतरना, उसमें पशुओं और सैनिकों का दब कर मर जाना, जैसी असह्य विपदाएं थीं। वे जहाँ रसद के लिए रुकते थे, वहां विरोध का सामना करना पड़ता था। अनेक स्थानों पर तो सैनिकों को जान बचाकर भागना पड़ता था (यह विश्व विजेता होने का परिणाम था या हार कर भागने का प्रमाण ?  रसद के अभाव में वे अपने ही पशुओं घोड़ों, खच्चरों आदि को मार कर उनका खून पी जाते और मांस खा जाते । दिखावा यह करते कि ये पशु भूख , प्यास और थकान से मरे हैं । रास्ते में जो भी सैनिक या पशु थक कर गिर जाते वे वहीँ तड़प कर मर जाते, कोई भी किसी की सुध नहीं लेता था। जहाँ कहीं पानी दिखाई पड़ता था तो प्यास के मारे वे उसमें कूद पड़ते थे और इतना अधिक पानी पी जाते कि वहीँ मर जाते। उनकी लाशों से वह पानी भी पीने लायक नहीं रहता। कुछ लोग थकान के कारण अगर रास्ते में एक ओर आराम करने को रुक जाते तो बाद में राह भटक कर भूख से मर जाते। कहीं उन्हें ऐसी जगह डेरा डालना पड़ा जहाँ रात में एकाएक बाढ़ आ गई। फलस्वरूप तमाम सामान, पशु, और सैनिक बह गए। भाड़े के अनेक सैनिक तो रास्ते में साथ छोडक़र ही चले गए। उधर निआरकस और उसके साथ जो सेना थी, उसकी भी दुर्गति हुई। रसद प्राप्त करने के लिए उसने जहाँ - जहाँ लंगर डालने की कोशिश की, उनमें से अनेक स्थानों पर उसके सैनिकों की जान जोखिम में पड़ गई और बिना रसद लिए ही उसे भागना पड़ा (क्या यह सचमुच विश्वविजयी सेना थी ?

क्रमश:

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