विजयंत थापर! तुम्हें सलाम

  • 2016-03-14 03:30:11.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की सेना सूखे चने चबाकर देश की सेवा के लिए सदा तत्पर रहती है। इसकी शौर्य, कत्र्तव्यनिष्ठा, देशभक्ति और मर्यादा की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है। कितने ही अवसरों पर इसने शत्रु को ‘नानी याद’ कराई है। बात 1999 के कारगिल युद्घ की करें और चाहे उससे पूर्व के किसी युद्घ की करें, भारतीय सेना की बलिदानी परंपरा के समक्ष हर देशभक्त भारतवासी का सिर झुके बिना नही रहता। भारत की इसी बलिदानी सेना के लिए भारतमाता की छाती पर उपद्रव मचाते हुए जब कोई व्यक्ति ऊल-जलूल आरोप लगाता है तो बड़ा कष्ट होता है।

[caption id="attachment_26195" align="alignleft" width="220"]विजयंत थापर! तुम्हें सलाम विजयंत थापर[/caption]

तोलोलिंग को कारगिल का निर्णायक मोड़ माना जाता है और मेजर मोहित सक्सेना की असॉल्ट टीम में सम्मिलित विजयंत थापर की प्लाटून ने पाकिस्तान के एक बंकर पर तिरंगा फहराया। हमारे इस महान योद्घा विजयंत थापर की आयु उस समय केवल 22 वर्ष की थी। यह वह अवस्था होती है जिसमें हर कोई नौजवान जवानी का पूर्ण आनंद ले रहा होता है, मचलती हुई जवानी किसी को घर-गृहस्थी बसाने की ओर ले जाती है तो किसी को मां भारती की सेवा करने के लिए देश की सीमाओं पर ले जाकर खड़ा कर देती है। विजयंत थापर को उनकी मचलती जवानी ने अपनी बांहों में उठाया और इस मचलते हुए जवान को देश की सीमाओं पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मां भारती के इस पुत्र ने अपना कत्र्तव्य बड़ी वीरता से निभाया।

तोलोलिंग को जीतना कठिन ही नहीं असंभव था, इसे जीतने में द्वितीय राजपूताना राईफल्स 1.5 महीने से लगातार असफल हो रही थी । ज्यादातर जवान और अधिकारी घायल थे और जब आदेश आया कि यदि तुमसे यह कार्य नहीं हो पाता है तो खाली करो हम दूसरी रेजिमेंट भेजेंगे। तब कमांडिंग ऑफीसर कर्नल एम.बी. रविन्द्रनाथन बोले कि राजपूताना की प्रतिष्ठा का प्रश्न है । बस 11 घंटे में तोलोलिंग पर तिरंगा था ।

तोलोलिंग के बाद द्वितीय राजपूताना रेजीमेंट को अगला कार्य मिला  थ्री पिंपल्स को कब्जे में लेने का। जानते हो तोलोलिंग और टाईगर हिल के बीच सैंडविच की तरह फंसी काले पत्थरों की उबड़-खाबड़ भद्दी सी पहाड़ी है यह। पर हमारे वीर सैनिकों ने हिम्मत नही हारी और जो आदेश पीछे से मिल गया था उसे क्रियान्वित करने के लिए शेर की भांति आगे बढ़ चले। पीछे हटना हमारी भारतीय सेना की परंपरा नही रही है, आदेश का पालन करना और पालन करते-करते प्राण न्यौछावर कर देना यह है भारतीय सेना की परंपरा। अत: आदेश को शिरोधार्य कर हमारे सैनिक आगे बढ़ चलते हैं।

29 जून की वह पूर्णिमा की रात थी, नॉर्दन लाईट इनफैंटरी (पाकिस्तान) की छठी बटालियन चोटी पर 100 एमएम की बंदूकें लेकर पूरी तैयारी से बैठी थी। चांदनी के उजाले में बेहद संकरा रास्ता, दोनों ओर करीब 15000 फीट की खड़ी ढाल, सामने से बचाव के लिए कोई ओट नहीं , केवल छोटी-छोटी चट्टानें तिस पर तुर्रा ये कि तापमान -15 डिग्री सेल्सियस। इसके उपरांत भी हमारे सैनिकों का हौंसला देखने लायक था। ‘जब हम बैठे थे घरों में-वे झेल रहे थे गोली’-सारा देश निश्चिंत था और गहरी नींद सो रहा था पर हमारे वीर सैनिक योद्घा शत्रु की सौ एमएम की बंदूकों का सामना करने के लिए अपने सीने को चौड़ा किये आगे बढ़ते जा रहे थे । आग से खेलने का शौक था उन्हें, और आज बर्फ के बीच आग बरसने वाली थी। उन्हें सब कुछ पता था पर देशभक्ति का जज्वा उनपर ऐसा चढ़ा था कि पीछे हटने का नाम नही ले रहे थे। साक्षात यमराज से भिड़ जाने सा था यह। पर विजयंत की यूनिट ने असाल्ट शुरू किया कम्पनी कमांडर पदमपाणि आचार्य के अधीनस्थ रहकर। जैसे ही चढ़ाई पूरी हुई दुश्मन ने मशीन गनों का मुंह खोल दिया और 100 एमएम की गोलाबारी शुरू हो गई। हमारी ओर से पाकिस्तान की इस गोलाबारी का बराबरी का जवाब दिया गया, लेकिन इसके उपरांत भी क्षति अपने ही पक्ष की अधिक हुई । कुछ ही देर की मुठभेड़ में हमारे कंपनी कमांडर शहीद हो गए,ज्यादातर जवान या तो मर चुके थे या बुरी तरह जख्मी थे और इस निर्णायक घड़ी में विजयंत ने दुश्मन से सीधा सामना किया। क्या ही अच्छी पंक्तियां हैं-

जब अंत समय आया तो कह गये कि अब मरते हैं।
खुश रहना देश के प्यारो अब हम तो सफर करते हैं।।

मात्र 15 मीटर की दूरी पर दो लाईट मशीन गनों के बीच   आगे बढ़ कर मोर्चा लेना भारतीय सेना ही कर सकती है, और उसे विजयंत थापर जैसे वीर योद्घाओं ने करके दिखाया।

मात्र 15 मीटर की दूरी से विजयंत को गोलियां बींध गईं थी; सीने , पेट और सिर में ........और वह रक्तरंजित नायक अपने साथी नायक तिलक सिंह की बाहों में गिरा। जानते हो केवल 6 महीने हुए थे उसे सेना में भर्ती हुए और जब उन्हें वीरचक्र से सम्मानित किया गया तो पुरस्कार लेने आईं थी उनकी 82 साल की वृद्धा दादी । उस बुढिय़ा से पूछना उनकी छातियों में दूध उतर आया होगा उस वक्त । ग्रेटर नोएडा में उनकी अंतिम यात्रा में करीब 1.5 लाख की भीड़ उमड़ आई थी ।

और हाँ विजयंत केवल इसीलिए नहीं याद किये जाते एक 6 साल की बच्ची थी रुखसाना-आतंकियों ने हत्या की थी उसके परिवार की और इसी सदमें से उसकी आवाज चली गई थी। मात्र 5 महीने में ही उसकी आवाज लौट आई थी।

आज हमें विजयंत थापर की याद इसलिए आई है कि हमारे ही देश के भीतर कुछ ऐसे नाग पैदा हो गये हैं जो अपने ही देश की इस बहादुर सेना पर तरह-तरह से कीचड़ उछालने का काम कर रहे हैं। आज काश्मीर के लिए पूरा देश अपने खून पसीने की कमाई में से मोटी धनराशि देकर इस प्रांत को पालने का काम कर रहा है, केवल इसलिए कि इस प्रांत से हमारा आत्मीय लगाव है और इसे हम अपने देश का शीश समझते हैं, जिसके लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देंगे परंतु इस शीश को कटने नही देंगे। भारतमाता को ‘डायन’ कहने वाले और ‘कितने अफजल मारोगे-हर घर से अफजल निकलेगा’ बोलने वाले ये समझ लें कि जब तक विजयंत थापर की बलिदानी परंपरा जीवित है तब तक यहां हर घर से थापर निकलेगा और इस देश को कभी गुलाम नही होने देगा। ‘लाल सलाम’ इस देश के लिए ही नही पूरी मानवता के लिए ही खतरनाक है। जिसने इस भूमंडल पर हजारों लाखों नही अपितु करोड़ों लोगों का रक्त बहाकर अपनी पाशविक प्रवृत्ति का पूर्व में परिचय दिया है, इसलिए लोग इसके सच को जानते हैं। जहां तक भारत की सेना का प्रश्न है तो भारत की सेना ने मानवता का रक्त बहाने वाले हर चंगेजखां और तैमूर का हर काल में सामना किया है और हर काल में इसने अपने थापर बलिदान किये हैं। ‘लाल सलाम’ की बात करने वाले विचार लें कि यही थापर कभी राजा दाहर था तो कभी पृथ्वीराज चौहान था, कभी यह महाराणा प्रताप था तो कभी छत्रसाल बुंदेला था, कभी यह शिवाजी था तो कभी यह संयमराय था। यही आल्हा था, यही ऊदल था, यही चंद्रशेखर था, यही बिस्मिल था और यही सुभाषचंद्र बोस था। ‘लाल सलाम’ वालों को पता होना चाहिए कि हमारा थापर कभी मरता नही है क्योंकि हमारे यहां आत्मा अमर है। तुम हमारे एक थापर को नही मार सकते, पर हमारे थापर ने बार-बार तुम्हारे अफजल को खत्म किया है और मानवता की सेवा करते हुए इस वसुधा को हरा-भरा रखने के लिए और यहां पर जीवन की चहल-पहल रखने के लिए अपना जीवन बलिदान किया है। ऐसे महान योद्घाओं को नमन।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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