विभाजन और हमारा नेतृत्व

  • 2015-11-17 02:30:19.0
  • राकेश कुमार आर्य

डा. बलदेवराज गुप्त अपनी पुस्तक ‘कांग्रेस का इतिहास’ के पृष्ठ 168 पर विभाजन संबंधी ‘माउंटबेटन योजना’ पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं :-‘‘उधर जब जवाहरलाल नेहरू को माउंटबेटन की इस योजना की विस्तृत जानकारी हुई तो उसमें अनेक खामियों को देखकर उन्होंने उसका विरोध किया। वी.पी.मेनन जो लार्ड वेवल के समय से ही भारत सरकार के संविधान परामर्शदाता थे, परंतु लार्ड माउंटबेटन ने उनकी सलाह नही ली थी और अपने ब्रिटिश परामर्शदाताओं से ही पूरी योजना बनवाई थी। माउंटबेटन ने नेहरू को और पटेल को बुलाकर समझाया। मेनन ने भी कहा कि इस योजना की सभी कमियां स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी, अगर भारत और पाकिस्तान कॉमनवेल्थ (राष्ट्रकुल) के तहत उसका डोमिनियन बन जाएं। पूर्ण स्वतंत्रता की जिद छोड़ दी जाए। क्योंकि डोमिनियन भी पूर्ण स्वतंत्रता जैसा ही होगा और इससे ब्रिटेन भी उनकी आने वाले वर्षों में हर प्रकार की सहायता करता रहेगा, नेहरू और पटेल ने श्री वी.पी मेनन की इस बात को मान लिया और कांग्रेस की पुरानी मांग पूर्ण स्वराज्य को ताक पर रख दिया। माउंटबेटन भी खुश हो गये। वी.पी. मेनन की इस योजना को ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने पुन: स्वीकृति प्रदान कर दी। यहां तक कि सदा प्रसिद्घ भारत विरोधी चर्चिल ने भी इस योजना का स्वागत किया।’’


विद्वान लेखक ने उक्त उद्घरण ‘फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया’ से लिया है।

इस उद्घरण से प्रमाणित होता है कि भारत को जब स्वतंत्रता मिली तो उसे अंग्रेज अपनी शर्तों पर ही देने को तैयार हुए थे। उन शर्तों में से प्रथम शर्त यह भी कि भारत को ‘पूर्ण स्वराज्य’ न देकर ‘डोमिनियन’ घोषित किया जाएगा। बात स्पष्ट थी कि ब्रिटिश राजा का भारत पर प्रत्यक्ष शासन न होकर अप्रत्यक्ष शासन बना रहेगा? इस प्रकार सत्ता के लिए लालायित नेहरू ने अपने नेतृत्व में 1929 की 31 दिसंबर को लिए गये उस संकल्प को विस्मृत कर दिया जो उन्होंने ‘पूर्ण स्वराज्य’ की प्राप्ति के लिए रावी नदी के किनारे लिया था। कांग्रेस तब से ही 26  जनवरी को ‘स्वाधीनता दिवस’ के रूप में मनाती आ रही थी, पर फिर 1929 से पूर्व की अपनी मांग पर लौट जाने से कांग्रेस के किसी स्वाधीनता दिवस की कोई महत्ता नही रह गयी थी। इस प्रकार कांग्रेस 1947 में जीती नही थी, अपितु हार गयी थी। अंग्रेजों ने उससे उसका राष्ट्रीय संकल्प वापस कराकर ही उसे ‘डोमिनियन’ भारत की बागडोर सौंपना स्वीकार किया था। यह बहुत बड़ा सौदा था, जो भारत के स्वाभिमान के मूल्य पर किया गया था।

इसके पश्चात ‘भारत स्वतंत्रता अधिनियम-1947’ को पारित किया गया। इस अधिनियम को ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई 1947 को पारित किया। जिसमें व्यवस्था की गयी थी कि 15 अगस्त 1947 से भारत पाकिस्तान ‘ब्रिटिश कामनवेल्थ’ के अंदर दो ‘डोमिनियन’ होंगे। प्रत्येक ‘डोमिनियन’ में ब्रिटेन के सम्राट एक गवर्नर जनरल नियुक्त करेंगे या एक ही व्यक्ति दोनों डोमिनियन का गर्वनर जनरल भी रहेगा। प्रत्येक डोमिनियन अपने गृह और विदेशी मामलों में स्वतंत्र होगा और ब्रिटिश का कोई भी आदेश आज्ञा या ब्रिटिश संसद का कोई भी कानून उन पर लागू नही होगा। भारत या पाकिस्तान सभी मामलों में स्वयं निर्णय लेंगे। भारत और पाकिस्तान में अलग अलग दो संविधान सभाएं होंगी और अपना-अपना नया संविधान बनाएंगी। जब तक नया संविधान नही बनेगा तब तक ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट’ 1935 के माध्यम से यहां शासन चलेगा। ब्रिटेन की भारत की देशी रियायतों पर कोई प्रभुसत्ता नही होगी। उन्हें यह भी स्वतंत्रता होगी कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में मिलें या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखें।

अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने से पूर्व 11 अगस्त 1947 को सर्वप्रथम जिन्नाह को पाकिस्तान की संविधान सभा का अध्यक्ष बनवाया, फिर पाकिस्तान के निर्माण की घोषणा 14 अगस्त को की गयी। बात स्पष्ट थी कि वे किसी भी प्रकार का संकट खड़ा करना नही चाहते थे और अपने लक्ष्य को बड़ी सावधानी से प्राप्त कर लेना चाहते थे। जिस दिन भारत (14-15 अगस्त की मध्य रात्रि) को स्वतंत्र घोषित किया जाना था उस दिन के कार्यक्रम को संसद में आयोजित किया गया। उस समारोह की अध्यक्षता डा. राजेन्द्र प्रसाद ने की थी। इसी समय पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारत के मनोनीत प्रधानमंत्री के रूप में अपना पहला ऐतिहासिक भाषण दिया था। अगले दिन केन्द्रीय असेम्बली ने लार्ड माउंटबेटन को भारत का पहला गवर्नर जनरल नियुक्त किया। यह पहले ही निश्चित किया जा चुका था कि स्वतंत्र भारत का प्रथम गवर्नर जनरल ब्रिटेन के सम्राट द्वारा नियुक्त किया जाएगा। लेडी माउंटबेटन से अपने संबंधों के चलते नेहरू जी के लिए माउंटबेटन से उत्तम कोई व्यक्ति इस पद के लिए नही हो सकता। इसलिए उनको ही देश का प्रथम गवर्नर जनरल बनाया गया। माउंटबेटन परिवार से नेहरू की मित्रता पुरानी थी। ब्रिटेन के राजवंशी परिवार के इस वायसराय ने ब्रिटिश नौसेना के सेनापति का दायित्व का भार भी संभाला था। ब्रिटेन के नौसेनापति के रूप में जब वह मलाया में नियुक्त थे तो उस समय नेहरू वहां भारतीय सेना के एक स्मारक का अनावरण करने विमान से पहुंचे थे। तब वेवल ने एक गुप्त संदेश देकर माउंटबेटन से नेहरू का बहुत भव्य आतिथ्य सत्कार कराया था। माउंटबेटन भी जानते थे कि नेहरू को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शीघ्र ही एक महत्वपूर्ण दायित्व मिल सकता है। यहां से नेहरू जी माउंटबेटन के परिवार के निकट चले गये थे।

10 जुलाई 1946 को इन्ही नेहरू ने कभी पहले घोषणा की थी कि संविधान सभा में कांग्रेस ‘पूर्ण स्वतंत्र’ होकर ही प्रवेश करेगी। पर जुलाई 1947 में नेहरू ‘डोमिनियन’ के ब्रिटिश प्रस्ताव से सहमत हो गये।

नेहरू के विषय में सरदार पटेल ने 29 जुलाई 1946 को अपने मित्र डी.पी. मिश्र को लिखा था :-हालांकि वे (नेहरू) चौथी बार अध्यक्ष चुने गये हैं पर अक्सर वे बच्चों जैसे काम करते हैं, जिससे हम सब अचानक कठिनाई में फंस जाते हैं।

आपको गुस्सा आना स्वाभाविक है पर हम गुस्से को अपने विवेक पर हावी नही होने दे सके... हाल के दिनों में उन्होंने कई ऐसे काम किये हैं जिन्होंने हमें परेशानी में डाला है, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के तत्काल बाद उनकी प्रैस कांफ्रेंस भावात्मक उन्माद का एक उदाहरण है। ऐसे में चीजें ठीक करने में हम पर बहुत बहुत दबाव बढ़ जाता है। वे व्यावहारिक नही हैं और इसलिए विरोध कभी-कभी उन्हें पगला देता है।’’

जहां तक सरदार पटेल की बात है तो उनके द्वारा विभाजन का देर तक कड़ा विरोध किया गया था। जनवरी 1946 में भारत आये ब्रिटिश संसदीय प्रतिनिधिमंडल को पटेल ने स्पष्ट कहा था-‘‘यह ब्रिटिश सरकार के हाथ में नही है कि वह पाकिस्तान दे दे। हिंदुओं और मुसलमानों को इसके लिए लडऩा होगा। गृह युद्घ हो जाएगा।’’

पर इसके पश्चात सरदार पटेल ने जब देखा कि यदि गृहयुद्घ की स्थिति बनी तो भारत को ही अधिक क्षति वहन करनी पड़ेगी तब उन्होंने विभाजन को स्वीकार करना अधिक उपयुक्त समझा। वह समझ गये थे कि यदि विभाजन के स्थान पर गृहयुद्घ को स्वीकार किया गया तो एक नही कई पाकिस्तान देश में बन जाएंगे और तब देश की अखण्डता को बचाये रखना असंभव हो जाएगा। इसलिए उन्होंने इस नीति पर कार्य करना आरंभ किया कि जितना पाकिस्तान मांगा जा रहा है उसको वह जितना कम करके दे दिया जाए, उतना कम कर लिया जाए और शेष बचे भारत की रियासतों को जैसे हो अपने देश के साथ लाकर खड़ा किया जाए, जिससे एक सुदृढ़ भारत का निर्माण हो सके। यह सच है कि इन रियासतों को एक साथ लाना नेहरू और गांधीजी के वश की बात नही थी, इसलिए लोगों में नेहरू और गांधीजी से अधिक सम्मान सरदार पटेल का है। नेहरू जी और गांधीजी ने अपने कार्य और भाषणों से कोई ऐसा संकेत नही दिया था किवह भारत के साथ रियासतों का विलीनीकरण करने की क्या योजना रखते हैं? जबकि सरदार पटेल पहले दिन से ही इसी कार्य में लग गये थे।

पटेल का व्यावहारिक दृष्टिकोण का एक उदाहरण यह भी था कि वह एक निर्णायक विभाजन चाहते थे, अर्थात पाकिस्तान से पूरी हिंदू आबादी को भारत लाना तथा भारत से पूरी मुस्लिम आबादी को पाकिस्तान भेजना चाहते थे। पर इसे भी गांधी, नेहरू की जोड़ी ने ही फलीभूत नही होने दिया था। गांधीजी मुस्लिमों को ‘छोटा भाई’ मानकर भारत में ही रखने को तैयार हो गये थे। यदि सरदार पटेल का यह सुझाव मान लिया जाता तो आज पाकिस्तान में नारकीय जीवन जी रहे हिन्दुओं को अपना देश मिल गया होता और वहां जिन करोड़ों हिंदुओं का धर्मांतरण कर उन्हें समाप्त कर दिया गया है वह भी ना होता। दूसरे पाकिस्तान तब अपने ही अंतर्विरोधों से स्वयं ही एक ‘बर्बाद मुल्क’ बन चुका होता।

हम रफीक जकरिया को भी उद्घृत करना चाहेंगे :-सभी नेताओं में पटेल ही ऐसे थे जो जिन्ना का मुकाबला कर सकते थे, पर दुर्भाग्य वश लौहपुरूष ने भी घुटने टेक दिये। अपने स्कूली दिनों में भारत का जो सुंदर नक्शा हम देखा करते थे वह बदरंग हो गया। यदि पटेल एक साल और अड़े रहते तो पाकिस्तान के निर्माण का अकेला उत्तरदायी (जिन्ना) उनका बीमार प्रतिद्वंद्वी तब तक मर चुका होता। पटेल आजाद से अधिक खान अब्दुल गफ्फार खान का आदर करते थे। उनकी भी यही राय थी कि लीग से  निराश होकर ही पटेल ने हार मान ली थी। सरहदी गांधी का मानना था कि यदि पटेल ने थोड़ा सा और दबाव डाला होता तो पाकिस्तान बनता ही नही। खान के अनुसार नेहरू की तुलना में पटेल इस्पात के बने थे।’’

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.