वेद धर्म का मूल है और वेदों का आचरण ही धर्म है

  • 2016-06-06 09:30:24.0
  • मनमोहन सिंह आर्य

वेद धर्म का मूल है

श्रीमद् दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, स्थान पौंधा-देहरादून में दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा पोषित सत्यार्थ प्रकाश स्वाध्याय शिविर दिनांक 2 जून, 2016 को चौथे भी जारी रहा। आज शिविर के प्रक्षिशणार्थियों को सत्यार्थ प्रकाश के दशम् समुल्लास का अध्यापन व प्रशिक्षण दिया गया। ऋषि भक्त आर्य विद्वान डा. सोमदेव जी ने पहले पूर्व के पाठों को दोहराया और उसके बाद दशम् समुल्लास के विषयों का परिचय कराकर उसके सभी मुख्य विषयों पर विस्तृत प्रकाश डाला जिससे वह श्रोताओं को हृदयंगम हो सके। विद्वान वक्ता ने कहा कि एकमात्र ईश्वर ही सब मनुष्यों का उपास्य है। उन्होंने कहा कि हमें जड़ देवता सूर्य, पृथिवी, चन्द्र, अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि का यथायोग्य उपयोग लेना चाहिये। डा. सोमदेव जी ने कहा कि ईश्वर के गुणों का प्रत्यक्ष होता है। गुण गुणी में रहते हैं। अत: गुणों से गुणी का भी प्रत्यक्ष होता है। सूर्य, पृथिवी व चन्द्र आदि को जो गति दे रहा व जिसने इन्हें धारण किया हुआ है वह परमात्मा है। उन्होंने कहा कि मनुष्य में बुरे काम करने से जो भय, शंका और लज्जा उत्पन्न होती है, वह ईश्वर की ओर से की जाती है जिससे कि मनुष्य जीवन में बुरे काम न करे। ईश्वर निराकार है, अत: उसका आकार व आकृति नहीं होती। ईश्वर की उपासना करने से उपासक को ईश्वर की प्राप्ती होती है। ईश्वर की उपासना व सान्निध्य से जीवात्मा के दोष दूर होते हैं। ईश्वर का उपासक बड़े से बड़े दु:ख में घबराता नहीं है। ईश्वर जीव के कर्म को करने से पूर्व उन कर्मों को जानता नहीं है। इसका कारण है कि जीव कर्म करने में स्वतन्त्र है। यदि ईश्वर को यह पता हो कि जीव भविष्य में क्या-क्या कर्म करेगा तो जीव स्वतन्त्र नहीं कहा रहेगा। डा. सोमदेव शास्त्री ने कहा कि परमाणु को गति देने का काम ईश्वर ने किया है। उन्होंने कहा कि ईश्वर, जीव व प्रकृति, ये तीन सत्तायें अनादि, नित्य व आरम्भ से रहित हैं। यह सदा से हैं और सदा रहेंगी। विद्वान वक्ता ने यह भी बताया कि कारण का कारण नहीं होता। उन्होंने कहा कि सत्यार्थ प्रकाश के नवम् समुल्लास में विद्या, अविद्या, बन्ध व मोक्ष का वर्णन ऋषि दयानन्द जी ने किया है। बन्धन व मोक्ष निमित्त से होते हैं। उन्होंने कहा कि ब्रह्म का प्रतिबिम्ब जीवात्मा नहीं है।

दशम् समुल्लास के विषयों से अवगत कराते हुए डा. सोमदेव शास्त्री ने कहा कि इस समुल्लास में आचार, अनाचार, भक्ष्य व अभक्ष्य आदि विषयों का वर्णन हुआ है। इस समुल्लास में महर्षि दयानन्द के विचारों के अनुसार समुद्रपार देशों की यात्रा करने में पाप नहीं होता की। महर्षि ने इसकी चर्चा इस समुल्लास में की है। इस समुल्लास में राष्ट्र की उन्नति के साधन भी बताये गये हैं। चार वर्णों में शूद्र के कर्मों सहित आर्यों की आपसी फूट की चर्चा भी इस समुल्लास में है। भक्ष्य व अभक्ष्य पदार्थों का ज्ञान कराने के साथ इस समुल्लास में गाय के महत्व, संसार में सुख व दु:ख कब व कैसे होते हैं, इन पर भी प्रकाश डाला गया है। सत्यार्थ का ज्ञान किसको होता है, विद्वानों का कर्तव्य क्या है तथा सत्पुरुषों के कार्यों व आचार-अनाचार आदि विषयों की चर्चा सत्यार्थ प्रकाश के दशम् समुल्लास में है जिसको पढक़र हम लाभान्वित होते हैं। आचार्य डा. सोमदेव शास्त्री ने कहा कि मनुस्मृति का ‘वेदऽखिलो धर्म मूलम्’ श्लोक स्मरण करने योग्य है। उन्होंने कहा कि जो आत्मा को प्रिय हो, वह धर्म का साक्षात् लक्षण होता है। आचार्यजी ने इसकी विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि बाल रखना, दाढ़ी बढ़ाना या न बढऩा, भिन्न भिन्न प्रकार से तिलक लगाना आदि जैसे कृत्य धर्म के चिन्ह नहीं हैं क्योंकि धर्म का कोई बाह्य चिन्ह नहीं होता। उन्होंने कहा कि आचरण योग्य कर्तव्यों का नाम ही धर्म है। धर्म का कोई विशेषण नहीं है। आत्मा का विशेषण धर्म है। धर्म की व्याख्या स्मृतियों में मिलती है। ऋषि भी अल्पज्ञ होते हैं। वेद में ज्ञान की न्यूनता नहीं है। वेद की शिक्षाओं का पालन ही धर्म है। उन्होंने कहा कि धर्म की बात उन्हीं को अच्छी लगती है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं हैं।

जो मनुष्य अपनी कामनाओं की पूर्ति में लगा है उसे धर्म की बात अच्छी नहीं लगती। जो धर्म की जिज्ञासा रखता है उसके लिए परम प्रमाण श्रुति अर्थात् वेद है। उन्होंने कहा कि मनुष्य आयु से व्यक्ति बड़ा नहीं होता अपितु विद्या से बड़ा होता है। ब्राह्मण ज्ञान में तथा क्षत्रिय बल में बड़ा होता है। उन्होंने यह भी कहा कि सदाचार व आचरण सबसे बड़ा धर्म है। आगमन, स्वाध्याय, प्रवचन तथा व्यवहार करने से विद्या प्राप्त होती है। उन्होंने कहा गुरु से 25 प्रतिशत, उसके स्वाध्याय से 25 प्रतिशत और, उनके प्रवचन से 25 प्रतिशत और अधिक तथा व्यवहार करने से विद्या 25 प्रतिशत प्राप्त होती है। आचार्य जी ने रोपड़ की एक आर्यसमाजी व्यक्ति का सत्य कथा सुनाई और कहा कि उसने कुंए से दलितों को जल देने का समर्थन किया था जिसके कारण उसके समुदाय के तथाकथित उच्च जाति के सवर्ण लोग उससे रूष्ट हो गये और उसे स्वयं जोड़ों अर्थात् तालाब का पानी पीना पड़ा। इसी बीच उसकी मां का स्वास्थ्य बिगड़ गया। डाक्टरों ने उसे शुद्ध जल पिलाने को कहा। वह मां का जीवन बचाने के लिए क्षमायाचना करने की बात सोच रहा था। इसका अनुमान कर मां ने स्पष्ट शब्दों में विरोध करते हुए अपने आर्यसमाजी पुत्र को कहा कि मैं एक दो महीनों में मरुं या बाद में, कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम अपने सिद्धान्तों से समझौता मत करो। इससे पुत्र को सहारा मिला। उसने ऐसा ही किया जिसका परिणाम उसकी माता का दो महीने में ही देहान्त हो गया। उन्होंने कहा ऋषि भक्तों ने सिद्धान्तों की रक्षा व दलितों के अधिकारों के लिए ऐसे-ऐसे त्याग व बलिदान के कार्य किये हैं। यही मनुष्य का धर्म है। उन्होंने कहा कि दलितों के प्रति असमानता की भावना धर्म न होकर अधर्म है। सत्यार्थ प्रकाश के आधार पर विद्वान वक्ता ने बताया कि ऋषि व्यास व उनके पुत्र पाताल लोक अमेरिका में निवास करते थे। उन्होंने ऋषि के शब्दों में कहा कि यदि यह लोग द्वीप द्वीपान्तर न जाते होते तो यह बातें क्योंकर सत्य हो सकती। उन्होंने यह भी बताया कि युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का निमन्त्रण देने उनके चार भाई चारों दिशाओं अर्थात् संसार के प्रत्येक देश में गये थे। कृष्ण भी अग्नि यान अश्वतरी से अमेरिका गये थे। उन्होंने कहा कि विश्व के देशों से व्यापार किये बिना उन्नति कभी नहीं हो सकती। विद्वान वक्ता ने पौराणिक पाखण्डियों की चर्चा कर कहा कि इन्होंने लोगों के विदेश जाने वा समुद्र यात्रा का विरोध इस कारण से किया कि यदि वह उन्हें दूसरे देशों में जाने की आज्ञा देंगे तो वह विद्वान हो जायेंगे और फिर वह उनके जाल में नहीं फसेंगे। सत्यार्थ प्रकाश के सखरी व निखरी प्रकरण को भी विद्वान वक्ता ने पढक़र सुनाया और उसकी व्याख्या की। डा. सोमदेव शास्त्री ने आर्यों के एक साथ भोजन करने का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि एक मत, एक सुख-दु:ख व एक हानि लाभ की भावना समाज में होनी चाहिये। उन्होंने कहा कि देश का हित तब होगा जब देश में एक धर्म, एक भाषा, एक प्रकार से ईश्वर की पूजा व सभी मनुष्यों की एक जाति होगी। इसी समुल्लास में ऋषि ने आर्यों की आपस की फूट और उसके परिणाम के बारे में व्यक्त विचारों को आचार्य सोमदेव शास्त्री ने पढक़र सुनाया और उनकी व्याख्या की। उन्होंने कहा कि इस फूट के प्रसंग में ऋषि की गहरी पीड़ा के दर्शन होते हैं। इस सन्दर्थ में उन्होंने आर्यसमाज की फूट की चर्चा की और कहा कि 9 वर्ष पूर्व उन्होंने मुम्बई में एक सम्मेलन किया था परन्तु उसका परिणाम कुछ नहीं निकला। हमें लगता है कि इसका कारण बड़े पदों पर बैठे कुछ व्यक्तियों की प्रवृत्ति, अंहकार और स्वार्थ होता है व उनके चापलूस प्रकृति के चाटुकार अनुयायी होते हैं।

हमारी दृष्टि में ऐसे लोग ऋषि द्रोही हैं। डा. सोमदेव शास्त्री जी ने सत्यार्थ प्रकाश के आधार पर कहा कि नशीले बुद्धिनाशक पदार्थों का सेवन जीवन में किसी को भी नहीं करना चाहिये। उन्होंने गाय की उपयोगिता का पूरा प्रसंग पढक़र सुनाया और गायों से होने वाले आर्थिक लाभों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि गायों का पालन बहुत आवश्यक है। ऋषि दयानन्द के अनुसार जब आर्यों का विश्व में चक्रवर्ती राज्य था तब कहीं पशुओं की हत्या नहीं होती थी। इसी कारण भूगोल में सुख था। जब विदेशी लोग भारत में आये और राज्याधिकारी हुए तब से आर्यों के दु:खों में वृद्धि होती जा रही है। यह निष्कर्ष महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में प्रस्तुत किया है। हमारी दृष्टि में यह बात ऐसी है कि जिसे पढक़र अंग्रेज ऋषि दयानन्द के प्रति अत्यन्त कुपित हुए होंगे। उन्होंने महर्षि दयानन्द के शब्दों में कहा कि जब गोहत्या के कारण सभी गाय मार दी जायेंगी तब यह गोहत्यारे व गोभक्षक क्या मनुष्य का मांस खाया करेंगे? विद्वान वक्ता ने कहा कि मांस मनुष्य का स्वाभाविक भोजन नही है। उन्होंने कहा कि ऋषि को समाप्त करने में अंग्रेजों का बहुत बडा योगदान रहा। इसी कारण उन्होंने सरकारी चिकित्सक डा. लक्ष्मण को ऋषि की चिकित्सा करने के लिए छुट्टी नहीं दी थी। सत्यार्थ प्रकाश के आधार पर उन्होंने कहा कि गुरू के भोजन करने के बाद शिष्य को भोजन करना चाहिये।

डा. सोमदेव शास्त्री ने इस वाक्य को रेखांकित करने को कहा जिसमें महर्षि दयानन्द कहते हैं कि परमात्मा सब मनुष्यों के मन में सत्य मत का अंकुर डाले। उन्होंने कहा कि सत्यार्थप्रकाश का यथार्थ आशय केवल उन मनुष्यों को ही विदित हो सकता है जो पूर्वाग्रह व पक्षपात छोडक़र न्याय की दृष्टि से इस ग्रन्थ का अध्ययन करते हैं। इसी के साथ सत्यार्थ प्रकाश शिविर का समापन हुआ।
- मनमोहन कुमार आर्य