‘वैधानिक प्रक्रिया’ और भारत का बंटवारा

  • 2015-11-11 02:30:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

एक अमेरिकन पत्रकार ने जिन्नाह के विषय में लिखा था-‘‘मि. जिन्ना धर्मनिष्ठ मुसलमान नही थे। वह शराब पीते थे और सूअर का मांस खाते थे जो इस्लामी शरीयत के विरूद्घ है। वह शायद ही कभी मस्जिद में जाते हों। वह न अरबी जानते थे, और न उर्दू। चालीस वर्ष की आयु में उन्होंने अपने धर्म से बाहर एक 18 वर्षीय पारसी युवती से विवाह किया था।

ऐसा जिन्ना अब देश के विभाजन की प्रक्रिया का मुख्य सूत्रधार बन गया था। ‘पाकिस्तान’ की ओर बढ़ती लीग और उसके नेता जिन्नाह के कदमों को पहचानकर जून 1940 में गांधीजी में एक अच्छा परिवर्तन दिखायी दिया। जब उन्होंने कहा-

‘‘ब्रिटिश सरकार सर्वसम्मत समझौते के लिए आग्रह नही करेगी यदि उसे दिख पड़े कि सत्ता लेने के लिए कोई समर्थ दल है। यह मानना होगा कि अभी कांग्रेस में वह सामथ्र्य नही है यदि वह और दुर्बल न पड़े और पर्याप्त धैर्य धारण करे, तो उसमें सत्ता लेने के लिए पर्याप्त सामथ्र्य आ जाएगा। यह भ्रम हमने ही उत्पन्न किया है कि सभी दलों के साथ समझौता कर लेने पर ही हम आगे बढ़ सकेंगे।’’


गांधीजी इससे पूर्व मुस्लिम लीग के सहयोग के बिना आगे बढऩा असंभव मानते थे पर अब उन्हें दिखाई दिया कि राष्ट्रहित में मुस्लिम तुष्टिकरण को त्यागना ही उपयुक्त है। खेद का विषय रहा कि गांधीजी में आया यह परिवर्तन स्थायी नही रह सका। गांधीजी में ऐसे परिवर्तन को देखकर मुस्लिम लीग ने 20 अगस्त को राष्ट्र से मांग कर डाली-‘‘इस बात को ध्यान में रखते हुए कि संयुक्त राष्ट्र विश्व के छोटे राष्ट्रों के स्वातंत्रय और स्वाधीनता की सुरक्षा की प्रत्याभूति की घोषणाएं प्राय: करता रहता है, कार्यकारिणी (मुस्लिम लीग) भारत के दस करोड़ मुसलमानों की इस मांग की ओर संयुक्त राष्ट्र का अविलंब ध्यान दिलाना चाहती है कि उन क्षेत्रों में जो उनके गृह प्रदेश है और जहां उनका बहुमत है प्रभुता संपन्न राज्य स्थापित किये जाएं।’’

कांग्रेस जब ‘भारत छोड़ो’ का नारा लगा रही थी तब जिन्नाह ने ‘बांटकर छोड़ो’ का नारा लगाना आरंभ कर दिया। उसने पाकिस्तान प्राप्ति के लिए एक जनसंघर्ष समिति का गठन कर दिया और सडक़ों पर भी ‘दो-दो हाथ’ करने की धमकी कांग्रेस को दे डाली।

उन दिनों अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बड़े तीव्र वेग से परिवर्तन हो रहे थे। अगस्त 1939 में हिटलर ने रूस के स्टालिन से संधि की थी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद को समाप्त करने की सौगंध उठायी थी जिससे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी उस समय साम्राज्यवाद विरोधी हो गयी थी। पर जून 1941 में जर्मनी ने रूस पर आक्रमण कर दिया तो रूस हिटलर का विरोधी होकर ब्रिटेन की ओर चला गया। परिणामस्वरूप भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी ब्रिटिश साम्राज्य के चिरस्थायित्व के गुण गाने आरंभ कर दिये। अत: उसने मुस्लिम लीग के ‘भारत बांटकर छोड़ो’ के साथ अपना सुर मिलाते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस को हिटलर के साथ खड़ा देखकर उन्हें भी ‘तोजो का कुत्ता’ कहना आरंभ कर दिया। ऐसे परिवर्तन को देखकर अंग्रेजों ने भी जिन कम्युनिस्टों को जेल में डाल रखा था उन्हें रिहा कर दिया। इन कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग के ‘द्विराष्ट्र सिद्घांत’ को बौद्घिक बल प्रदान करने के लिए अपनी पार्टी के मुस्लिम सदस्यों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करना आरंभ कर दिया। जिससे देश में अंग-भंग के बीज चारों ओर बिखेरे जाने लगे।

कांग्रेस की चुप्पी, अंग्रेजों-लीग व कम्युनिस्टों के अनैतिक गठबंधन और जिन्नाह की हठधर्मिता के चलते 3 मार्च 1943 को सिंध विधानसभा ने अपनी पाकिस्तान की मांग कर प्रस्ताव पारित किया।

हमारा मानना है कि भारत उस समय नही टूटा जब तक उसके बाहुबल से युद्घ के क्षेत्रों में हार जीत को निर्णय होते रहे। भारत तब हारा जब विधानमंडलों में सिरों की गिनती से कलम का खेल आरंभ हो गया। इसे ‘वैधानिक प्रक्रिया’ का नाम दिया गया। वास्तव में यह ‘वैधानिक प्रक्रिया’ भारत की आत्मा की हत्यारी सिद्घ हुई। इसमें नाटक लोकतंत्र का किया गया और कार्य राष्ट्रघाती तानाशाही के किये गये। वास्तव में किसी राष्ट्र और किसी संस्कृति को मारने का यह सरल उपाय है कि आप ‘वैधानिक प्रक्रिया’ को अपना लें। जिसमें आप को संपूर्ण राष्ट्र की सहमति स्वीकृति की या उसकी सामान्य इच्छा या अंतश्चेतना की ओर देखने की आवश्यकता नही है। बस आपको कुछ सिरों का मोलभाव करना है और उनकी गिनती में यदि आप सफल हो जाएं तो आप एक बड़ा युद्घ जीत लेते हैं। जिस सिंध के लिए भारत ने अब तक लाखों बलिदान दिये और उसे अपने साथ रखने में सफल रहा था उसे ‘वैधानिक प्रक्रिया’ के नाटक से भारत से छीनने की तैयारी होने लगी। भारत का पौरूष जीवित तो था पर उसे इस ‘वैधानिक प्रक्रिया’ ने पंगु बना दिया।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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