यूपी को प्रयोगशाला मत बनाओ

  • 2016-04-25 04:58:28.0
  • राकेश कुमार आर्य

यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव

यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों में सभी दल बड़ी मुस्तैदी से जुट गये हैं। सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी गोटियां बैठा रहे हैं और  कैसे अगली बार इस महत्वपूर्ण प्रदेश की सत्ता प्राप्त की जाए-इस जुगत में लग गये हैं। सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष करना लोकतंत्र में अनिवार्य तो होता ही है साथ ही ऐसा संघर्ष करना प्रत्येक राजनीतिक दल का अपना अधिकार भी होता है। परंतु किसी भी संघर्ष या अधिकार की अपनी संवैधानिक सीमाएं भी होती हैं।

अब उत्तर प्रदेश के लिए राजनीतिक परिवर्तन महासंघ नाम का एक नया राजनीतिक संघ तैयार किया गया है। इस राजनीतिक परिवर्तन महासंघ में राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल, राष्ट्रीय क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी, इंसाफ राज पार्टी, स्वराष्ट्र जन पार्टी, सवर्ण समाज पार्टी, राष्ट्रीय अंबेडकर दल, ब्रह्मास्त्र, भारतीय प्रजातंत्र निर्माण पार्टी, नयादौर  पार्टी, देशभक्ति निर्माण पार्टी, इंसाफवादी महाज, वतन जनता पार्टी, भारतीय किसान परिवर्तन पार्टी, पिछड़ा जनसमाज पार्टी, वंचित समाज इंसाफ पार्टी, युवाजन क्रांति पार्टी सम्मिलित हैं।

इस महासंघ का कहना है कि उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कोई मुसलमान होना चाहिए क्योंकि अब तक इस समाज का केवल राजनीति के नाम पर शोषण किया गया है और किसी भी व्यक्ति को मुख्यमंत्री नही बनाया गया है। हमारे देश के संविधान ने कहीं पर भी किसी व्यक्ति को संप्रदाय, जाति अथवा लिंग के आधार पर किसी राजनीतिक पद को प्राप्त करने से रोका नही है, अर्थात किसी भी मुस्लिम का किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना उतना ही संभव है जितना किसी अन्य संप्रदाय के व्यक्ति का। कोई व्यक्ति मुसलमान हो और उसे केवल इसलिए उसे केवल इसलिए किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाए कि वह मुसलमान है, तो यह असंवैधानिक, अतार्किक और नियम विरूद्घ बात होगी। फिर भी यदि इसे तार्किक और संवैधानिक आधार बनाकर पेश किया जा रहा है तो यही तर्क और संवैधानिक आधार इन लोगों को कश्मीर के बारे में भी प्रस्तुत करना चाहिए और कहना चाहिए कि वहां का मुख्यमंत्री हिंदू होगा। क्योंकि वहां पर एक संप्रदाय ने हिंदू को आज तक मुख्यमंत्री नही बनने दिया है। लेकिन जब कश्मीर की बात की जाती है तो धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए तर्क दिया जाता है कि कश्मीर में किसी मुस्लिम के मुख्यमंत्री बनने से ही धर्मनिरपेक्षता की रक्षा होनी संभव है, क्योंकि वह मुस्लिम बहुल प्रांत है। जबकि उत्तर प्रदेश जैसे हिंदू बहुल प्रांत में धर्मनिरपेक्षता तब जीवित रहेगी जब अल्पसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति को केवल उसके अल्पसंख्यक होने के कारण मुख्यमंत्री बना दिया जाए। ऐसी योग्यता संविधान ने कहीं भी उल्लिखित नही की है।
अच्छी बात यह होगी कि किसी भी प्रांत का मुख्यमंत्री बनने या देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए व्यक्ति समाज में स्वयं मेहनत करे और जनता को यह विश्वास दिलाये कि यदि उसे सत्ता दी जाती है तो वह साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखकर और लोगों के मध्य संप्रदाय, जाति और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न करते हुए शासन करेगा। जब लोग किसी संप्रदाय या जाति की राजनीति करते हुए और उसी संप्रदाय या जाति की वोट पाकर सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तब उनका राजनीतिक दृष्टिकोण और लक्ष्य अत्यंत संकीर्ण हो जाता है और ऐसे लोग या ऐसे शासक ही देश में सांप्रदायिक  या जातीय दंगे कराने में अक्सर संलिप्त होते देखे जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में उचित यही होगा कि साम्प्रदायिक आधार पर किसी व्यक्ति को किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित करने जैसी परंपराओं या घोषणाओं को समाज में विसंगतियां पैदा करने वाली मानकर समाज को तोडऩे वाली मानसिकता के अनुरूप माना जाए और उनकी ऐसी घोषणाओं को असंवैधानिक घोषित किया जाए।

हमारे देश में चुनाव सुधारों की अभी बहुत आवश्यकता है। जो लोग लोकतंत्र को संप्रदाय, जाति और क्षेत्रवाद की जंजीरों में जकडक़र लोगों का मूर्ख बनाते हुए इस शासन प्रणाली को अपने हाथों की कठपुतली बना देना चाहते हैं, उनके ऐसे प्रयासों को रोकने के लिए कठोर कानून की आवश्यकता है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर आप कुछ भी करते चले जाएं, यह संभव नही है। जनता की सेवा का भाव जगाकर और कुछ समय जनता के बीच रहकर जनता का विश्वास जीतकर जो लोग आगे बढ़ते हैं और सत्ता प्राप्त करते हैं, लोकतंत्र उन्हीं का स्वागत करता है और उन्हीं का समर्थक भी है। यहां पर सत्ता की तिकड़में फिट करने के लिए ‘भानुमती की कुनबा’ बना-बनाकर पेश करने की राजनीतिज्ञों की तुच्छ मानसिकता वाली नीतियों को यह देश कई दशकों से देखता आ रहा है, और उसके कटु अनुभव भी इसने किये हैं। अब इसके लिए और अधिक अनुमति देना निश्चय ही घाटे का सौदा होगा। वास्तव में जितने अधिक दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं-उनके विषय में यही मानना चाहिए कि ये सारे के सारे हारे-थके पुरूषार्थहीन लोग हैं जो अकेले चुनाव जीतने और सत्ता चलाने का दम-खम नही रखते। इसलिए इनको ‘भानुमति का कुनबा’ बार-बार बनाना पड़ता है। यह अजीब बात है कि अलग-अलग राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कल सत्ता हासिल करने के लिए एक दल क्यों और कैसे बना लेते हैं? जब उनकी सोच और राजनीतिक उद्देश्य या राजनीतिक कार्यशैली अलग-अलग है तो केवल एक स्वार्थ अर्थात सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें एक साथ आ जाने की अनुमति हमारा कानून क्यों देता है? यदि इनके भीतर पुरूषार्थ की भावना है तो इन्हें अकेले अपने बल पर सत्ता प्राप्त करनी चाहिए। जनता को मूर्ख बनाकर सत्ता हासिल करने की नीतियों पर अब विराम लगा देने का समय आ गया है। हमें ऐसी राष्ट्रघाती प्रवृत्तियों का सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिए और जितना शीघ्र हो सकता है उतनी शीघ्रता से ऐसी गतिविधियों को असंवैधानिक घोषित कर देना चाहिए। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य को हम नये-नये प्रयोगों की प्रयोगशाला बनने से रोकें यह समय की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मोदी इस दिशा में गंभीर हों और देश में चुनाव-सुधार अभियान चलाकर यश के भागी बनें-तो ही अच्छा है।