केजरीवाल से मेरा मोहभंग

  • 2015-03-07 05:10:31.0
  • उगता भारत ब्यूरो

यशवंत सिंह 


केजरीवाल से मेरा मोहभंग। घटिया आदमी निकला। दूसरे नेताओं जैसा ही है यह आदमी। संजय सिंह, आशुतोष जैसे चापलूसों और जी-हुजूरियों की फ़ौज बचेगी 'आप' में। सारा गेम प्लान एडवांस में रचने के बाद खुद को बीमार बता बेंगलोर चला गया और चेलों ने योगेन्द्र-प्रशांत को निपटा दिया। तुम्हारी महानता की नौटंकी सब जान चुके हैं केजरी बाबू। तुम्हारी आत्मा कतई डेमोक्रेटिक नहीं है। तुम सच में तानाशाह और आत्मकेंद्रित व्यक्ति हो। तुममें और दूसरी पार्टियों के आलाकमानों में कोई फर्क नहीं है।


केजरीवाल ने शपथ ग्रहण के दिन दूसरों को उपदेश पेला था कि अहंकार मत करना. लेकिन सबसे पहले अहंकार देवी ने केजरीवाल को ही शिकार बनाया और इस आदमी को पता तक नहीं चला. यह पुराना खेल खेलता रहा. अपने चिंटूओं संजय सिंह, आशीष खेतान, आशुतोष आदि को योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण के खिलाफ सक्रिय कर दिया. उसके बाद खुद के बारे में अफवाह फैला दी कि बहुत बीमार हैं, बहुत मेहनत कर रहे हैं, इलाज कराने जा रहे हैं, बहुत दुखी हैं विवाद से आदि आदि. अंततः अहंकारी अरविंद केजरीवाल ने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पीएसी यानि पोलिटिकल अफेयर्स कमेटी से बाहर का रास्ता दिखवा दिया. खुद चुप्पी साधे महाप्रभु बना बैठा है.




अरविंद केजरीवाल ने अहंकार से ग्रस्त होकर दोनों साथियों को पीएसी से निकलवाकर खुद को भले ही मजबूत और सबसे प्रभावी साबित किया व विजेता घोषित कराया हो लेकिन उनकी इस जीत में भी हार है. मेरे जैसे करोड़ों लोग अरविंद केजरीवाल को बहुत डेमोक्रेटिक और अत्यंत धैर्यवान नेता मानते थे. यह भी मानते थे कि अरविंद दूसरों को गौर से सुनते विचारते हैं. पर यह सब छवि खंडित हो गई और यह एहसास हो गया कि यह आदमी भी बाकी पार्टियों के नेताओं की तरह बहुत छोटे दिल दिमाग का आदमी है. राजनीतिक फायदे के लिए शब्दों की जलेबी छानते हुए केजरीवाल भले ही खुद को खुद की जुबान से इमानदार से लेकर अति आम तक साबित करता फिरता रहा हो पर अब जब सफलता उनके चरणों में लोट रही है और पूरे देश की निगाह उनके क्रिया-कलापों पर है तो केजरीवाल ने अपनी नीच हरकत से खुद को एक्सपोज कर लिया है.


योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे विचारवान व एक्टिविस्ट लोगों को किनारे करके केजरीवाल मूर्खों व चापलूसों की फौज मात्र ही तैयार करेंगे और अंत में इस पार्टी में वही सारे रोग लग जाएंगे जो दूसरी पार्टियों में हैं. किसी ने सच कहा था कि सारी क्रांतिकारिता का अंत सत्ता में घुसकर पावर एक्वायर कर लेने तक होती है, उसके बाद लोग अपने रीयल फेस, असली चाल चरित्र चेहरे में चले आते हैं. उम्मीद करते हैं कि केजरीवाल को अकल आएगी और अपनी गल्ती सुधारेंगे. अन्यथा, अहंकार बड़े बड़ों को नष्ट भ्रष्ट कर देता है, केजरीवाल क्या चीज हैं.