अब भारत और मोदी की बारी

  • 2014-11-11 04:02:47.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक

तालिबान ने वाघा पर विस्फोट किया, कई लोग मारे गए, कई घायल हुए। दुख हुआ लेकिन आश्चर्य बिल्कुल नहीं हुआ, क्योंकि इससे भी अधिक भयंकर घटनाएं पाकिस्तान में होती रहती हैं। अभी सितंबर में पेशावर के एक चर्च में 72 लोग मारे गए। यह भी हो सकता है कि वाघा पर आत्मघाती बम लगाने वाले लोग उस पार की बजाय इस पार बम लगा देते लेकिन जो बात सबसे ज्यादा चिंता की है, वह यह है कि वाघा के हत्याकांड की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन ‘जमातुल अहरार’ ने अब धमकी दी है कि अभी तो उसने वाघा को निशाना बनाया है लेकिन वह जल्दी ही भारत पर अपना कहर ढाएगा और ‘मुसलमानों के दुश्मन’ नरेंद्र मोदी को सबक सिखाएगा। इस संगठन के प्रवक्ता अहसानुल्लाह एहसन ने यह बात खुले आम कही है।


जाहिर है कि मियां नवाज़ शरीफ की सरकार इस बयान की भर्त्सना करेगी, क्योंकि ‘अहरार’ के लोग जितने बुरे नरेंद्र मोदी के लिए हैं, उससे ज्यादा नवाज़ शरीफ के लिए हैं। नवाज़ शरीफ की सरकार और फौज ने इन आतंकवादियों के खिलाफ बकायदा युद्ध छेड़ रखा है, जिसमें सैकड़ों आतंकवादी मारे जा रहे हैं। एहसन के बयान से भारत सरकार अब और भी सतर्क हो गई है। उसने प्रधानमंत्री की सुरक्षा भी बढ़ा दी है। यदि ‘अहरार’ के आतंकवादी अपनी करतूत में सफल हो गए तो आप कल्पना नहीं कर सकते कि उसके परिणाम क्या होंगे। यदि मोदी को कुछ हो गया तो इन तालिबान की वजह से दुनिया के सारे मुसलमानों को इतना खामियाजा भुगतना पड़ेगा, जितना उन्होंने सदियों में कभी नहीं भुगता होगा। इस अर्थ में तालिबान की यह धमकी मोदी और भारत को नहीं है, बल्कि सभी मुस्लिम देशों और दुनिया के सारे मुसलमानों को है। इस्लाम तो शांति और समता का मजहब है। उसके नाम पर हिंसा करना क्या काफिराना हरकत नहीं है?


इस वक्त पाकिस्तान की फौज को यह समझना होगा कि सभी तालिबान एक-जैसे हैं। सिर्फ पाकिस्तान और अमेरिका-विरोधी तालिबान को खत्म करना जरुरी नहीं है। जो तालिबान भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ हैं, उन्हें भी उसे उसी नजर से देखना होगा। कहीं ऐसा न हो, उसके इस अलग-अलग नजरिए के कारण भारत-पाक युद्ध छिड़ जाए। भारत की यह गलत या सही फहमी हो सकती है कि उस पर हुआ आतंकी हमला पाक फौज ने ही करवाया है। पाक फौजों की सांठ-गांठ पर पेंटागन की ताजा रपट ने अभी-अभी मुहर लगाई है। बेहतर तो यह हो कि भारत और पाक की सरकारें, फौजें, गुप्तचर एजेंसियां आपस में मिल बैठें और आतंकवाद का संयुक्त समाधान निकालें। इससे भी ज्यादा जरुरी है कि दोनों देशों के कुछ समझदार लोग तालिबान के साथ सीधा संवाद कायम करें, खतरा मोल लें और उन्हें प्रेम से समझाने की कोशिश करें कि वे जो कुछ कर रहे हैं, उससे इस्लाम और मुसलमानों का नुकसान ही होने वाला है।