ये मरे हुए लोग

  • 2014-10-29 06:37:28.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

जो जिन्दा होते हैं वे ही लोगों की श्रेणी में आते हैं मगर आजकल इंसान की जो दशा हो रही है उसे देख लगने लगा है कि अब लोगों की नई प्रजाति हमारे सामने आ रही है जिनमें जान तो है लेकिन वे जानदार नहीं कहे जा सकते हैं।

जान होते हुए भी लोग ऎसी हरकतें करते रहते हैं जैसे कि मरे हुए हों। जीवट और जीवन जीने के उत्साह के साथ जीना अपने आप में इंसान का सबसे बड़ा लक्षण है लेकिन अब इंसानों की एक नई किस्म हमारे सामने है जो बेजानों की तरह व्यवहार करती है और इनकी मौजूदगी से कहीं नहीं लगता कि कहीं कोई जीवंतता और इंसानी उल्लास शेष बचा रहा है।

हममें से काफी लोग इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं अथवा हम ऎसे लोगों को रोजाना अपने आस-पास देखते हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ऎसे लोगों में लगता नहीं कि कोई जान बची हुई हो। इस किस्म के अधिकांश लोग कहीं बैठेंगे तब भी कमर हमेशा झुकी हुई रहेगी, नज़रें नीची रहेंगी और जहाँ कहीं चलते-फिरते रहते हैं वहाँ भी लगता है कि कोई साया धीरे-धीरे चल रहा हो।

खासकर सड़कों पर चलते-फिरते और वाहन चलाते ऎसे लोग बहुतायत में मिल जाते हैं जो कि बीच राह में ऎसे चलते हैं जैसे कि मंथर गति से कोई पुतले जा रहे हों। न चलने का उत्साह, न घूमने-फिरने या जीने का कोई उत्साह।

खूब सारे लोग सड़कों पर भी ऎसे ही चलते हैं जैसे कि किसी उद्यान में मॉर्निंग वॉक करने के लिए आए हों। जमाने भर की रफ्तार का कबाड़ा करने वाले ऎसे लोग हर कहीं दिखने को मिल ही जाते हैं। कोई सा चौराहा, सर्कल या आम रास्ता हो, हर तरफ ऎसे-ऎसे लोगों का जमावड़ा लगा रहता है जिनके पास कोई काम नहीं है, सिवाय गप्पे हाँकने और दूसरों के बारे में चर्चाएं करने के।

अधिकांश लोगों की जिन्दगी ही हो गई है निरन्तर भ्रमण। इन लोगों को खुद को पता नहीं होता कि उन्हें कहाँ जाना है, क्यों जा रहे हैं। सवेरे उठते ही घर से बाहर निकल जाने की सनक उठती है और अधिकतम समय घर के बाहर बिना किसी काम काज के किसी डेरे पर गुजारने और बेवजह इधर-उधर भ्रमण करते रहकर दिन निकालने के सिवा इनका कोई लक्ष्य नहीं होता।

खूब सारे ऎसे हैं जिनके पास कोई काम नहीं है फिर भी हर कहीं आसानी से दिख ही जाएंगे, जैसे कि गांवों और शहरों की गश्त लगाने का काम इन्हीं लोगों के जिम्मे हो। सभी लोग इन मुर्दाल लोगों से परेशान हैं जो किसी भी राह या सार्वजनिक स्थल पर टीबी के मरीजों की तरह चलते हैं, पग-पग पर पिच-पिच कर थूंकते रहते हैं और ऎसे रहते हैं जैसे किसी ने मारपीट कर इनसे उत्साह और जीने का माद्दा छीन लिया हो और बेघर कर छोड़ दिया हो।

बात बसों, रेलों और सार्वजनिक स्थलों पर सफर की हो, अपने क्षेत्र की किसी देहाती या शहरी सड़क की हो, हर तरफ लोग अब ऎसे मर-मर चलने लगे हैं जैसे कि इनमें कोई जान ही नहीं बची हो। और चलेंगे भी बीच सड़क पर। न खुद आगे बढ़ते हैं, किसी और को आगे बढ़ने देते हैं।

मरे हुओं की तरह चलने वालों को शिकायत है कि सामान्य रफ्तार वाले लोग उनकी तरह क्यों नहीं चलते, और ठीेक-ठाक चलने वाले लोगों को शिकायत रहती है कि हर तरफ मुर्दाल लोग बीच राह में आड़े आते रहकर सामान्य रफ्तार को भी बाधित कर दिया करते हैं। इन हालातों में मध्यम मार्ग यही है कि या तो आगे बढ़ें या पीछे वालों को आगे जाने दें, उनके लिए रास्ता छोड़ें जो आगे जाना चाहते हैं।

आज के युग में सबसे बड़ा संकट मानव जाति पर है तो वह यह है कि न हम आगे बढ़ना चाहते हैं, न किसी को आगे बढ़ता देखना ही चाहते हैं। मानवी सभ्यता और संस्कृति का यह सर्वाधिक नकारात्मक पक्ष है जिसके कारण से हम सभी लोग पिछड़ेपन के शिकार हैं।

खुद के भीतर जान डालें और जीने का माद्दा पैदा करें, पूरे उत्साह से युग धर्म और कर्मयोग का निर्वाह करें या फिर दूसरों को आगे बढ़ने दें। किसी की राह में रोड़ा न बनें।