वो नेताओं का नेता बनेगा

  • 2014-10-12 03:08:28.0
  • उगता भारत ब्यूरो

go vanshहरियाणा की भाजपा सरकार के एक नेता ने मांग की है कि गोहत्या को मानव हत्या के बराबर माना जाए। जो गाय की हत्या करे, उसे धारा 302 के तहत मौत की सजा या आजन्म कारावास हो। जाहिर है कि इस राय से सब सहमत नहीं हो सकते। हालांकि कई राज्यों में गोहत्या के विरुद्ध काफी सख्त कानून बने हुए हैं, फिर भी गोमांस के खातिर गोहत्या होती रहती है। गोरक्षा और गौसंवर्धन की बात हमारे संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में कही गई है। लेकिन उसका पालन कौन करता है?

गाय पालने वाले लोग चाहे हिंदु हो या मुसलमान, अगर वे गायों को बेचे नहीं तो उन्हें कोई भी कसाई कत्ल कैसे कर सकता है।? जब पैसे का सवाल आता है तो लोग धर्म, कर्तव्य, मर्यादा,कृतज्ञता-सभी को ताक पर रख देते हैं। वे ये भूल जाते हैं कि जिस गाय को कसाई के हवाले कर रहे हैं उसने जीवन भर उनको दूध,दही,घी देकर मां की तरह पाला है। यदि हम देश में गोहत्या रोकना चाहते हैं तो पहले गो पालकों को शिक्षित करें, उनको कर्तव्य बोध करवाएं और फिर यह भी किया जाए कि बूढ़े गाय-बैलों की सेवा के लिए लोग गौशालाएं खोलें।

यदि संपूर्ण देश में ही गोहत्या पर प्रतिबंध लग जाए तो यह एक विश्व-स्तरीय घटना होगी। सारी दुनिया में भारत अकेला देश होगा, जहां गोहत्या वर्जित होगी। यह सारे विश्व को भारत का एक कृतघता-संदेश होगा। भारत, दुनिया को बताएगा कि लोगो को सिर्फ मनुष्यों के प्रति ही कृतज्ञ नहीं होना चाहिए बल्कि उन पशुओं के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए,जो मूक-भाव से मानव समाज की सेवा करते हैं। इस दृष्टि से क्या यह संभव है कि भारत में पशु-वध उसी तरह से अनैतिक और अवैध घोषित कर दिया जाए जैसे मानव-वध है? यदि ऐसा हो जाए तो भारत मनुष्यता को दैवीय स्तर पर ले जा सकता है।, भारत सभ्यता के चरम शिखर पर होगा।

लेकिन मेरे इस सुझाव का वे सब लोग विरोध करेंगे, जो पीढ़ियों से मांसहार कर रहे हैं।, वे भी जो अपने धर्मग्रंथों से ‘कुर्बानी’ की जरूरत बताएंगे। और सबसे ज्यादा वो करेंगे, जिनका काम-धंधा और व्यापार मांसहार के कारण ही चल रहा है। इन सब लोगो के साथ मेरी सहानुभूति है। मैं उनकी कठिनाईयों को भी समझता हूँ लेकिन मैं पूछता हूं कि आप यदि मांस न खाएं तो क्या आपको कोई घटिया मुसलमान या घटिया ईसाई या घटिया यहूदी या घटिया आदिवासी कह सकता है? मांसहार स्वास्थ्य के लिए जितना हानिकारक है, उतना ही वह राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था को चौपट करता है। यदि संपूर्ण भारत शाकहारी हो जाए तो देश की उत्पादकता दुगुना हो जाए। पशु-धन कोई छोटा-मोटा धन नहीं है। यह काम सिर्फ कानून से नहीं हो सकता। यह सरकारों और प्रधानमंत्रियों के बूते के बाहर का मामला है। यह काम पूरा करना होगा- माता-पिता को, शिक्षकों को, साधु-संतों को, मुल्ला-पारसियों को, समाज-सेवकों को और नेताओं को भी। जो यह काम पूरा करेगा, वह नेताओं का नेता बनेगा।



डॉ0 वेद प्रताप वैदिक