सांईं मंदिरों के माध्यम से चल रही है भारत के इस्लामीकरण की मुहिम

  • 2014-08-03 16:09:51.0
  • उगता भारत ब्यूरो

K.P.Gurjarश्री के.पी. गुर्जर जाने माने ज्योतिषविद हैं, जो कि आठ वर्ष की अवस्था से ज्योतिष से जुड़े हैं। 14 वर्ष की अवस्था में उनकी पहली कहानी नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुई थी। आज देश के लगभग चालीस प्रमुख अखबारों में ज्योतिष संबंधी उनके लेख प्रकाशित होते हैं।
श्री गुर्जर शालीमार गार्डन साहिबाबाद में रहते हैं। पिछले दिनों सांईं विवाद में उन्होंने सांईं के सच को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब उनसे उनके निवास स्थान पर हमारी मुलाकात हुई तो कई ऐसी खास जानकारी उनसे हमें मिली जो जनसाधारण के लिए सांई के संबंध में जाननी आवश्यक है।
श्री गुर्जर कहते हैं कि उन्हें अब से कई वर्ष पहले श्री ‘सांई सत्चरित्र’ नामक पुस्तक सांई के एक भक्त ने लाकर दी। तब वह उस पुस्तक को पूरी को पढ़ गये। परंतु पुस्तक के बीच-बीच में कई ऐसे स्थल आए जिनसे सांई का सच जब मेरे सामने आया तो इस व्यक्ति के कारनामों को देखकर मुझे घृणा हो गयी। वह कहते हैं कि स्वरूपानंद जी महाराज ने सांई का भांडा फोडऩे के लिए जो कुछ कहा है उसे कहने में हालांकि कुछ देर हो गयी, परंतु जो कहा वह शत प्रतिशत सत्य है। इस अभियान में मैंने लगभग पांच सौ घरों में से सांई की मूर्तियों को लोगों को समझाकर हटवाया है। श्री गुर्जर कहते हैं कि इसमें आस्था का कोई प्रश्न ही नही है। लोगों को जैसे ही सच की जानकारी हुई तो उन्होंने स्वेच्छा से सांई की मूर्ति को हटा दिया, इतना ही नही अब वही लोग कई मंदिरों से मूर्तियां हटवा रहे हैं जो कभी सांई के बड़े भक्त थे।
श्री गुर्जर से जब हमने पूछा कि आपको सांई चरित्र से कैसा लगता है? तो उनका स्पष्ट जवाब था कि सांई का प्रचार-प्रसार भारत के महापुरूषों और देवी-देवताओं का अपमान कर धीरे-धीरे उन्हें मंदिरों से हटवाकर भारत के इस्लामीकरण की प्रक्रिया की तैयारी है। वह जोर देकर कहते हैं कि यदि भारतीय हिंदू समाज में चेतना नही आई तो भयंकर परिणाम उसे भुगतने होंगे।
परिणामों के बारे में पूछने पर वह कहते हैं किबंबई के एकसांई मंदिर में सीधे-सीधे नमाज अता की गयी। सांई मंदिरों में पहले पांच वक्त आरती होती थी, जिसमें अब परिवर्तन हो रहा है, और नमाज की तरह पांच वक्त सांई कीर्तन होने लगे हैं।
सांई बाबा के मुस्लिम होने के प्रश्न पर वह कहते हैं कि उक्त सांई चरित्र में सारी चीजें स्पष्ट लिखी हैं। जैसे-
-वह स्वयं और उनके भक्त ‘अल्लाहोअकबर’ का नारा लगाते थे।
- बाबा स्वयं ‘अल्लाह मालिक’ है, बोला करते थे। ‘सबका मालिक एक’ यह सांई का नारा नही था, बल्कि गुरूनानक देव जी का नारा था।
- बाबा को नत्र्तकियों का अभिनय तथा नृत्य देखने और गजल कब्बालियां सुनने का शौक था। अल्लाह का नाम सदा उनके होठों पर रहता था।
-उक्त पुस्तक के पेज 37 पर लिखा है किबाबा मस्जिद में निवास करने से पहले दीर्घकाल तक तकिया में रहे।
-बाबा के माता-पिता या जन्मस्थान का कोई अता-पता किसी पुस्तक से नही मिलता, इसका कारण यही है कि बाबा की असलियत को लोगों से छुपाकर रखा जाए।
-पुस्तक के पेज नं. 43 पर लिखा है कि बाबा के लिए चंदन समारोह का एक बार आयोजन किया गया, जिसे कोरहल के एक मुस्लिम भक्त अमीर शक्कल दलाल ने आयोजित कराया था। प्राय: इस प्रकार का उत्सव सिद्घ मुस्लिम संतों के सम्मान में ही किया जाता है।
- बाबा देवी-देवताओं की पूजा का सख्त विरोधी था, वह सब लोगों से देवी-देवताओं की पूजा छोडक़र अपने आपको ही सब कुछ मानने मनवाने का दबाव दिया करता था। उक्त पुस्तक के पेज 75 पर आया है कि न्याय तथा मीमांसा या दर्शनशास्त्र पढऩे की कोई आवश्यकता नही है। जिस प्रकार नदी या समुद्र पार करते समय नाविक पर विश्वास रखते हैं उसी प्रकार का विश्वास हमें भव सागर से पार होने के लिए सदगुरू पर करना चाहिए।
-बाबा की मान्यता थी हिंदुओं के सभी देवी-देवता भ्रमित करने वाले हैं।
-पुस्तक के पेज 87 पर आया है कि उन्होंने एक हाजी को अपने पास से 55 रूपये निकालकर दिये। तब से हाजी बाबा से खुश होकर नियमित उनकी मस्जिद में आने लगा।
-पुस्तक के पेज 93 पर लिखा है कि एक बार एक मामलतदार अपने एक डाक्टर मित्र के साथ शिरडी आए। डा. का कहना था कि मेरे इष्ट श्रीराम हैं, मैं किसी यवन (मुसलमान) को शीश नही झुकाउंगा।
-बाबा अपने भक्तों से आशीर्वाद देते समय हमेशा यही कहता था कि अल्लाह तुम्हारी इच्छा पूरी करेगा। (पेज नं. 104)।
श्री गुर्जर कहते हैं कि सांई चरित्र की उक्त पुस्तक में ऐसे और भी अनेक प्रमाण हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि बाबा एक मुसलमान था। वह मांसाहारी था और उसके मांस के बर्तनों में कुत्ते तक साथ खा लिया करते थे। श्री गुर्जर कहते हैं कि मुझे इस बात को पढक़र बाबा से बड़ी घृणा हुई कि वह कई-कई दिन तक नहाता नही था, उनके कपड़े बहुत गंदे रहते थे और 1858 में वह चोरी में पकड़ा गया था। जिसके प्रमाण को मैंने नैट पर लंदन की लाइब्रेरी से भी प्राप्त किया। वह बिरयानी को अपने भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा करते थे। जिसके लिए मस्जिद से एक मौलवी आता था और वह फातिहा पढक़र उस प्रसाद को लोगों में बांटने के लिए तैयार करता था।
श्री गुर्जर कहते हैं कि आज देश के हजारों मंदिरों को एक षडयंत्र के तहत सांई मंदिर में तब्दील किया जा रहा है। जिससे भारतीय धर्म और संस्कृति को नष्ट कर भारत के धार्मिक लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर उनका इस्लामीकरण करने का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है। वह कहते हैं कि उक्त सांई चरित्र के पृष्ठ 197 पर बाबा ने स्वयं को एक मुसलमान होना स्वीकार किया है। इसके बावजूद भी लोग उन्हें एक हिंदू देवता के रूप में या भगवान के रूप में पूजने की जिद करते हैं तो इसके पीछे के असली कारण को हमें पहचानना होगा, और यह कारण इन लोगों के सांई मंदिरों से होने वाली कमाई के माध्यम से आर्थिक हितों की पूर्ति होना है। इसके लिए श्री गुर्जर कहते हैं कि बहुत बड़े स्तर पर लोगों के द्वारा षडयंत्र रचा जा रहा है, जिसमें सांई की मूर्तियों को बिना पैसे घर-घर तक पहुंचवाना प्रमुख काम है। क्योंकि जब सांई की मूर्ति पहुंच जाएगी तो उस परिवार के लोग मंदिर आना अपने आप शुरू कर देंगे, और तब उनसे मनमाना धन वसूल किया जा सकता है। इससे मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम और योगीराज श्रीकृष्ण जी जैसे महापुरूषों के मंदिरों में सूनापन आता जा रहा है और लोग धीरे-धीरे सांई नाम के जहर से उसकी गिरफ्त में आते जा रहे हैं।
श्री गुर्जर ने कहा कि इस समय देश में सांई विरोध का एक जो माहौल बना है उसे बनाये रखने की आवश्यकता है, अन्यथा हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान तीनों ही मिट जाएंगे। इसलिए जिन लोगों को राष्ट्र, धर्म और संस्कृति की तनिक भी चिंता है तो उन्हें इस महान लक्ष्य की प्राप्ति में जुट जाना चाहिए कि भारत को सांई विहीन करके ही दम लिया जाएगा। श्री गुर्जर कहते हैं कि इस महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया है, और यह सौभाग्य की बात है कि आज देश में बहुत लोगों को सांई का सच समझ में आ रहा है। हमारा मानना है कि राष्ट्र की आस्था व्यक्ति की आस्था से सौ गुना बड़ी होती है, इसलिए व्यक्ति की आस्था से पहले राष्ट्र की आस्था को नमन करना चाहिए।