राम कथा का गायक- तुलसीदास

  • 2014-08-03 16:03:10.0
  • डा० इंद्रा देवी

डा. इन्द्रा देवी
तुलसीदास हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं। उनका अमर महाकाव्य रामचरित मानस भारतीय साहित्य ही नही अपितु विश्व साहित्य की सर्वोत्तम रचनाओं में से एक है। तुलसी हिन्दू धर्म के अत्यन्त प्रिय कवि है विद्वानों से लेकर साधारण जन तक में उनका प्रचार और महत्व है। वे पांडित्य, कवित्व, सामाजिक चेतना और अपनी भक्ति में अनुपम है।
इनका जन्म सन 1554ई0 में बॉदा जिले के राजापुर गॉव में माना जाता है। कुछ विद्वान इनका जन्म स्थान श्रावण शुक्ला सप्तमी को सोरो एटा मानते है इनका जीवन काशी अयोध्या और चित्रकूट में अधिक व्यतीत हुआ इनके गुरू नरहर्या नन्द थे। इन्ही से इन्होने रामायण की कथा सुनी थी काशी के विद्वान पंडित शेष सनातन से इन्होने शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त किया था। इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था। अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण जन्म के ही समय इनके माता पिता ने इन्हे त्याग दिया था। ऐसा प्रसिद्ध है कि पत्नी रत्नावली के उपदेश ने ही इनके मन में वैराग्य उत्पन्न किया था। इनका जीवन बहुत ही संकटमय रहा।
सन् 1631 में ये अयोध्या आये और यहीं उन्होने रामचरित लिखना आरम्भ किया। अयोध्या से कुछ समय पश्चात फिर काशी में आ गये। पहले प्रह्लाद घाट पर रहे फिर अस्सी घाट पर आ गए। सन् 1680 में उनकी बाहु पीडा से अस्सी घाट पर उनकी मृत्यु हुई। जिसके सम्बन्ध में यह दोहा प्रचलित है-सम्वत सोरह सौ असी असी गंग के तीर श्रावण श्यामा तीज शनि तुलसी तज्यो शरीर।
तुलसी के नाम से बहुत ग्रन्थ मिलते है किन्तु विद्वानों ने 12 ग्रन्थों को ही तुलसी द्वारा रचित स्वीकार किया है ये 12 ग्रन्थ है। रामचरित मानस, विनय पत्रिका, दोहावली, कवितावली, गीतावली, कृष्णा गीतावली, रामज्ञा प्रश्न, बरवै रामायण ,रामलाल नहद्यू, वैराग्या संदीपनी, पार्वती मंगल और जानकी मंगल। रामचरित मानस उनका महाकाव्य है यह दौहा चौपाई की प्रबन्ध शैली में अवधि भाषा में लिखा गया है। आज भी हिन्दू जाति मानस का सम्मान धर्म शास्त्र के समान करती है। विनय पत्रिका दास्य भक्ति भावना का सुन्दर गंरथ है। तुलसी के विचारों की प्रौढतम अवस्था इस ग्रंथ में देखी जा सकती है। दोहावली में 573 दोहे संग्रहित है। कवितावली में रामायण के कुछ विशेष अंशो की कवित्त-सवैया शैली में गाया गया है। कवितावली सूर सागर से प्रेरित होकर लिखी गई है। सूर सागर की शैली में रामकथा के अंशो का वर्णन इसमें किया गया है। यह कोमल रस प्रधान रचना है। कृष्ण गीतावली में कृष्ण कथा का वर्णन है गीति काव्य शैली में किया गया है। रामलला नहदू के 20 छन्दों में राम के नख काटने का सुन्दर वर्णन है। रामाज्ञा प्रश्न में दोहों मे राम कथा है। यह शुभ-अशुभ फल जानने के लिए लिखा गया है। बरवै रामायण में रामकथा को बरवै छन्द में लिखा गया है।
वैराग्य संदीपनी में ज्ञान भक्ति और वैराग्य का विवेचन है। जानकी मंगल में जानकी के विवाह और पार्वती मंगल में पार्वती विवाह वर्णन है।
तुलसी कवि से पहले भक्त थे। वे राम के अनन्य उपासक थे उनकी भक्ति राम की ही भक्ति थी। राम को वे परम ब्रह्म मानते थे। वे राम के सगुण रूप को मानने वाले है उनकी भक्ति आनन्द भाव की है। उनकी भ्क्ति की मूल भावना राम का महत्व और भक्त की दीनता है। वह जानते है उनसे कोई छोटा नही है। और राम से अधिक बडा कोई नही है। तुलसी को मोक्ष की इच्छा भी नही है, वे तो केवल रात की शरण चाहते है। तुलसी समन्वयवादी हैं उन्होने भक्ति और ज्ञान का समन्वय किया है। वह ज्ञान का पथ कठिन और भक्ति का पथ सुगम मानते है। निर्गुण ब्रह्म को वह समझ न आने वाला मानते हैं वे आत्मा को ब्रह्म का अंश मानते है। जो कि विशिष्ट अद्वैतवाद के अनुकूल है। वह माया के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भी माया के बन्धन को काटने के लिए भक्ति को ही सर्वश्रेष्ठ साधन मानते है।
तुलसी ने रामचरित मानस में यह स्पष्ट लिखा है कि उन्होने स्वान्त्य: सुखाय राम कथा का गायन किया है। किन्तु गहराई से देखा जाये तो कबीर के पश्चात तुलसी की सामाजिक चेतना सबसे प्रबल है। रामचरित मानस के द्वारा उन्होने समाज की सुव्यवस्था की है। इसलिए उनकी कविता स्वान्तय: सुखाय ना होकर बहुजन हिताय है। इस रचना में वे एक महान उद्देश्य को लेकर चले है। यह सन्देश रामराज्य और राम भक्ति का सन्देश है। राम राज्य उस आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत करता है। जहॉ समाज के प्रत्येक वर्ग को सुख शान्ति प्राप्त हो। वे मनुष्य की लौकिक सुख की भी चिन्ता करते थे। और परलौकिक की भी।
तुलसी सिद्धांत: वर्णाश्रम-धर्म के समर्थक थे किन्तु भक्ति के क्षेत्र में उन्होने ब्राह्मण तथा शुद्र को समान स्थान प्रदान किया है। जिस तल्लीनता से उन्होने अहिल्या के उद्धार का वर्णन किया है। वही ढंग शबरी और केवट के उद्धार के वर्णन में अपनाया गया है। राम को शबरी के कन्द-मूल फल खाते देखकर कौन समीक्षक छुआछूत का इतिहास लिख सकेगा।
तुलसी ने तीन प्रकार के व्यक्तियों का सफल चित्रण किया है। देव चरित्र, राक्षस चरित्र और मानस चरित्र। राम और भरत देव चरित्र है। रावण, मेघनाद आदि असुर चरित्र है दशरथ, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि मनुष्य चरित्र है। तुलसी मानव प्रकृति के बहुत बडे ज्ञाता थे। मानव चरित्र का उन्होने गहन अध्ययन किया। इसी कारण उन्हे मनौवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण करने में बहुत अधिक सफलता पायी है। चिते तुम त्यौ हमरो मन मोह वास्तव में अत्यन्त भाव गर्भित वाक्य है। उसमें एक ओर तो राम के आचरण की पवित्रता है और दूसरी ओर ग्रामीण नारियों के प्रेमभाव की सात्विकता दोनो एक साथ झलकती है किन्तु राम सीता की ओर ही देखते है। उन स्त्रियों की ओर नही। यह शील तुलसी को कही भी उन्मुक्त नही होने देता है।
तुलसी का अध्ययन विस्तृत था। संस्कृत के वे पूर्ण पंडित थे धर्म के विभिन्न अंगो का उन्हे पूर्ण परिचय था। अध्ययन के साथ उनका लौक जीवन का निरीक्षण भी विस्तृत था। लोक जीवन की संवेदनाओं का चित्रण उन्होने अपनी कविता में सफलता पूर्वक किया है। काव्य के मार्मिक स्थलों की उन्हे पूर्ण पहचान है।
राम के अयोध्या त्याग का करूण चित्रण, दशरथ और कौशल्या की व्यथा, चित्रकूट प्रसंग का गंम्भीर शास्त्रीय विवेचन, लंका युद्ध की भीषणता, लक्ष्मण का मेधनाद युद्ध में रौद्र रूप, अशोक वाटिका की विरहणी सीता की व्यथा सभी का चित्रण तुलसी ने अनुपम कवित्व शक्ति से किया है।
तुलसी राम कथा के गायक है। लौकिक काव्य करना वह कविता का अपमान समझते हैं। राम कथा का क्षेत्र ही इतना व्यापक है। कि मानव जीवन के प्रत्येक पहलू का उन्होने चित्रण किया है। उनके पात्र जीवन की विषम स्थितियों में भी सत्य के साथ विजयी होकर आते है। मनुष्य हृदय की जितनी भावनाओं का चित्रण तुलसी ने अपने काव्य में किया है, उतना किसी अन्य कवि ने नही किया।
राम का गुण-गान उनकी कविता का उद्देश्य है। राम कथा को अनेक भाषा-शैलियों में अनेेक प्रकार से उन्होने गाया है। रामकथा का गान करते उनका हृदय कभी शिथिलता अनुभव नही करता। तुलसी की लौकप्रियता का रहस्य उनके काव्य के विषय और काव्य कौशल में निहित है। उनकी भाषा जन भाषा है। अपने काव्य में उन्होने भारतीय संस्कृति के आदर्शों को स्थापित किया है। तुलसी का मन राम का मनमोहक रूप पर नही अपितु उनके शक्तिशाली स्वरूप पर ही अधिक मुग्ध है। तुलसी सौन्दर्य के नही, शक्ति, शील-शिवत्व के अधिक उपासक थे।
कहा जाता है एक बार तुलसी वृन्दावन पहुचें, वहॉं कृष्ण के मन्दिर में युग-बिहारी की मनमोहिनी मूर्ति के सम्मुख उपस्थित होते ही उन्होने कहा-तुलसी मस्तक जब नवै धनुष बाण लेहु हाथ। तुलसी के राम तो बचपन से ही धनुष धारी थे। जो कर्मण्यता के प्रतीक थे। कर्मठ व्यक्ति ही लोक कल्याण कर सकता है। तुलसी हिन्दी के ही गौरव नही अपितु समस्त भारतीय भाषाओं के गौरव है। साहित्य की दृष्टि से वे सर्वश्रैष्ठ कवि थे। तो जनता की दृष्टि से अत्यन्त लोकप्रिय भक्त। जनता ने रामचरित मानस का मूल्यांकन अपना धर्म शास्त्र मानकर किया है।

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