ढोलने वाले हैं या ओढ़ने वाले

  • 2014-08-02 07:07:05.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

aadmi mushafir hai मनुष्यों की पूरी की पूरी प्रजाति आजकल दो भागों में बँटी हुई दिखती है। एक वे हैं जो काम करने वाले हैं, इन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं रहती, जो काम मिला, जो दिया गया उसे चुपचाप कर लिया और मस्त। ऎसे लोगों का प्रतिशत हालांकि घटता जा रहा है तथापि इन्हीं लोगों के पुण्य प्रताप से सब कुछ हो रहा लगता है।

दूसरी किस्म में दो प्रकार के लोग हैं। एक वे हैं जो हर काम को या तो टाल दिया करते हैं या दूसरों पर ढोल दिया करते हैं। ये लोग इस काम में बड़े ही माहिर होते हैं। इनकी चाह यही रहती है कि कोई सा काम इन्हें करना नहीं पड़े और फल पूरा का पूरा मिलता रहे। ये अपनी बौद्धिक चतुराई और लच्छेदार या लफ्फाजी भरी बातों की चाशनी के कतरे फेंकते हुए इसी फिराक में रहते हैं कि कोई सा काम सामने आए, उसे कैसे टाला जाए या बड़ी ही तरकीब से भ्रमित करते हुए इस काम को दूसरों के हवाले कर दिया जाए।

इनके संपर्क में आने वाले सभी लोगों को दिल से यह महसूस होता है कि ये लोग आज जहाँ विराजमान हैं, वहाँ न होकर कहीं और होने चाहिए थे। खो-खो की ओलंपिक या वल्र्ड कप प्रतियोगिता होती तो हर बार जाने कितने सारे स्वर्णपदक ये महारथी लूट ले आते।

कोई सी बात या कोई सा काम, खो करना इन्हें अच्छी तरह आता है। इस किस्म के खो बाज लोग हर बाड़े और गलियारे में होते हैं जो अपने काम भी दूसरों के मत्थे मढ़ दिया करते हैं और खुद मुक्त और मस्त रहने का जुगाड़ करते रहते  हैं। यही कारण है कि देश में कई जगह ऎसे लोगों को खोड़ीलं भी कहा जाता है।

इस किस्म में अधिकांश लोग कारोबारी मनोवृत्ति के होते हैं। जिस काम में कुछ मुद्रा, मेवा-मिष्ठान्न मिलेगा, उसमें कोई ना नुकर नहीं करेंगे, बल्कि ऎसे आशाओं और लोभ-लालच से जुड़े काम बिना किसी को बताये चुपचाप खुद कर लेंगे लेकिन जिसमें कुछ नहीं मिलने वाला हो, ऎसे काम ये दूसरों की ओर डायवर्ट कर दिया करते हैं।

खूब सारे लोग आज इसी फन के कारण मस्ती और खुमारी में जी रहे हैं। ये लोग बहुधा अपने कामों को भी दूसरों के पाले में डाल दिया करते हैं। भले ही सामने वालों का यह काम हो या न हो, ऎसे शोषक और चालाक किस्म के लोग सभी जगह हैं जो अपने जिम्मे के कामों को भी खो कर दिया करते हैं। ऎसे लोग बड़े-बड़े कुर्सीनशीन भी हो सकते हैं और कलम घिस कर चिराग पैदा कर देने वाले भी।

चतुर लोगों की अपने यहाँ कहीं कोई कमी नहीं है जो यह अच्छी तरह जानते हैं कि किस आदमी को कैसे यूज करना है, कैसे यूज किया जा सकता है। ऎसे लोगों को विकृत मानसिकता वाले और शोषक कहा जा सकता है जिन्हें न मानवीय संवेदनाओं की समझ है, न मनुष्य के मूल्यों को पहचानते हैं।

एक तीसरी किस्म है ओढ़ने वाली। ऎसे लोग कोई सा काम हो, अपने ऊपर ओढ़ लिया करते हैं। इन लोगों को हर काम अपने मनमाफिक और परफेक्शन से भरा हुआ ही पसंद आता है इसलिए अपने आपको भी ये कामों में झोंक देते हैं।

ये लोग किसी भी प्रकार की सीमाओं में बंधने में विश्वास नहीं करते।  कई बार ये उन कामों को भी हाथ में ले लिया करते हैं जो इन्होंने कभी किया ही नहीं हो अथवा उनके लायक न भी हों। इस किस्म के लोग लोकप्रियता, नवाचार और प्रतिष्ठा के उपासक होते हैं। हालांकि ये लोग अपने कामों को लेकर तनावों में भी रहा करते हैं लेकिन उनकी यश कीर्ति और छपास की भूख के आगे ये तनाव हमेशा बौने  ही रहते हैं।

अपने आस-पास इसी प्रकार के लोगों का जमघट बना हुआ है। कोई टालू है, कोई ढोलू और कोई ओढ़ू।  तीनों ही प्रजातियां कभी-कभी इतना दुःख दे जाती हैं बयाँ नहीं किया जा सकता। फिर भी इंसानी नवाचारों में रमे हुए ये लोग जो-जो प्रयोग कर गुजरते हैं, वे सभी चाहे-अनचाहे स्वीकार करने ही पड़ते हैं।

तात्कालिक रूप से ऎसे लोग भले ही सफल दिखाई दें लेकिन सत्य यह भी है कि ऎसे लोगों को समाज कभी भी अच्छे इंसान के रूप में नहीं स्वीकारता।  जो इंसान इनके आडम्बरी मोहपाश में आता है वह थोड़े दिनों में ही इनकी असलियत समझ कर अपने आप दूर हो जाता है। यही कारण है कि ऎसे लोगों का कोई स्थायी मित्र होना संभव ही नहीं होता।  समझदार लोग इन लोगों को न जीते स्वीकारते है, न मरने के बाद कभी। इंसान वही है जिसे लोग बिना किसी राग-द्वेष के पूरी आत्मीयता के साथ लम्बे समय तक याद रखें और प्रेरणा पाने की सहर्ष कोशिश करें।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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