मिलना ही चाहिए सज्जनों को संरक्षण

  • 2014-07-31 10:33:04.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

aaj ka chintan 1आज का चिंतन (31 जुलाई, 2014)।

वर्तमान युग का सबसे बड़ा पुण्य यही है कि सकारात्मक चिन्तन करें और सज्जनों को संरक्षण दें। समाज-जीवन, परिवेश और अपने क्षेत्र में जहाँ कहीं अच्छे लोग विद्यमान हैं उनको संरक्षित करने का काम समाज का है। समाज जब-जब भी इस दिशा में उदासीन हुआ है, समस्याओं से घिरता रहा है और अस्मिता पर संकट आते रहे हैं।

जब तक मानवीय मूल्यों का अनुपात ठीक रहता है, तब तक ही अमन-चैन रहता है, सभी लोग सुकून के साथ जीवनयापन करते हुए शांति और समृद्धि के शिखरों की ओर बढ़ते रहते हैं। लेकिन संस्कारहीनता और मानवीय मूल्यों के निरन्तर क्षरण के मौजूदा दौर में आसुरी वृत्तियों का प्रभाव कुछ ज्यादा ही बढ़ चला है।

यह बात नहीं है कि अच्छे लोगों और सज्जनों की कमी हो गई है। आज भी खूब सारे लोग ऎसे हैं जो कत्र्तव्यनिष्ठ, चरित्रवान, ईमानदार और संस्कारवान हैं तथा जीवन के आदर्शों और मूल्यों पर जीते हैं। लेकिन इन लोगों के साथ समस्या यह है कि असंगठित हैं।

आम तौर पर पूरी दुनिया में ऎसा ही होता रहा है। बुद्धिजीवियों, सज्जनों, भोले-भाले और सीधे-सादे लोग हर जगह असंगठित ही रहा करते हैं और इनकी बिखरावी संस्कृति का फायदा वे चन्द लोग उठाया करते हैं जो अपने स्वार्थों और आपराधिक मनोवृत्ति की सीमेंट कंकरीट से इतनी अधिक मजबूती से जुड़े रहते हैं कि इनके सभी प्रकार के संबंध आरसीसी या फेविकोलिक ही होते हैं जिन्हें तोड़ पाना न इनके लिए सहज है, न औरों के लिए।

संसार भर में सज्जनों के साथ यह संकट बरकरार रहता ही है। प्रायः दुष्ट प्रवृत्ति के वे लोग सभी स्थानों पर संगठित रहते हैं । संगठित रहना इन लोेगों के लिए अपने जीवन की सबसे बड़ी जरूरत होता है जिसके बगैर इनका अस्तित्व तक सुरक्षित नहीं रहता। ऎसे लोग एक पृथक इकाई के रूप में शक्तिहीन और नाकारा होते हैं लेकिन जब समूहों में जुट जाते हैं तब ही इनमें शक्ति का संचरण हो पाता है। इसके साथ ही एक-दूसरे की कमजोरियों को जानने-समझने वाले इन लोगों के लिए यह भी जरूरी है कि वे चाहे या अनचाहे भी संगठित रहें और अपनी कारगुजारियों में रमे रहें अन्यथा इकाई के रूप में अलग होने की स्थिति में इनके लिए चुनौतियाँ अपने आप बढ़ जाती हैं क्योंकि इनकी हरकतें और करम ही ऎसे होते हैं कि लोग इन्हें अकेला पाकर सहनशीलता और बर्दाश्तगी की सीमा तोड़ दिया करते हैं और फिर इनके साथ कहीं भी कुछ भी हो सकना संभव है।

अच्छे कामों को इंसान हमेशा अकेला कर सकने में भी सक्षम है लेकिन बुरे कामों को कोई भी इंसान अकेला नहीं कर सकता। अच्छे कामों के लिए किसी के सहयोग या संरक्षण की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन बुरे कामों के लिए सहयोगियों का होना नितान्त जरूरी होता है। और कुछ नहीं तो षड़यंत्र रचने से लेकर बुरे व पाप कर्मों को छिपाने और ढंके रखने के लिए तो अपनी ही तरह के दुष्ट और आसुरी लोगों की मदद लेनी ही पड़ती है।

सारे के सारे उलटे-सीधे धंधे और अपराध बिना एक-दूसरे की मदद के कभी संभव नहीं हो पाते, फिर चाहे इसमें मदद करने वाले खुद अपराधी या बुरे लोग हों या फिर उन्हें परोक्ष-अपरोक्ष रूप से प्रश्रय देने वाले। यही कारण है कि बुरे और नालायक लोगों को मकड़ियों के जाल की तरह ताने-बाने बुनते हुए सहयोगियों को साथ लेकर अपनी कारगुजारियों को अंजाम देने को विवश रहना पड़ता है और ऎसे में जो कुछ होता है वह सामूहिक भागीदारी का ही कमाल होता है।

इसके साथ ही यह भी उतना ही सच है कि नकारात्मक सोचने वाले, अंधेरा पसंद, भ्रष्ट, बेईमान, चोर-उचक्कों, डकैतों, तस्करों, रिश्वतखोरों, व्यभिचारियों और गुण्डे-बदमाशों से लेकर सभी प्रकार के निन्दित लोगों के निशाने पर वे ही लोग रहते हैं जो अच्छे कहे जाते हैं और जिनकी वजह से कहीं से रोशनी आने और अपने हीन कु (कर्मों) के प्रकाश में आ जाने का कोई खतरा बना रहता है। अन्यथा अपने स्वार्थों और ऎषणाओं की पूर्ति के लिए हर किसी अवस्था को अंगीकार कर लेने वाले और मलीन तथा आपराधिक मानसिकता में घुल जाने वाले लोगों की तो भरमार है और ये लोग मौका देखते ही पाला बदल लिया करते हैं।

इस परिवर्तन के साथ ही उनकी निष्ठाएं, स्वामीभक्ति और चरित्र भी बदल जाता है। इन्हीं लोगों की तासीर होती है कि जमीन बदलने के साथ ही जमीर भी बदल कर जाने क्या से क्या हो जाता है।  सामाजिक दुरावस्था और आज की तमाम विषम परिस्थितियों का मूल कारण यही है। हम सोचें कि समाज और देश की भलाई के लिए सोचने वाले कितने लोग हैं जिन्हें समाज का संरक्षण प्राप्त हो पा रहा है।

समाज में बुराइयों और बुरे लोगों के प्रति हम लोग भय और दूसरी आशंकाओं की वजह से उपेक्षा का भाव रखते हैं और इस कारण वे लोग हावी हो जाते हैं जबकि सज्जनों के प्रति हम अपेक्षा तो करते हैं कि वे समाज और देश के लिए कुछ करें, मगर इन सज्जनों और इनके कर्मों के प्रति हम उदासीन या उपेक्षित रवैया रखते हैं और इस वजह से समाज में अच्छाइयों और अच्छे लोगों के संरक्षण का भाव समाप्त होता जा रहा है और बुराइयों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।

यही कारण है कि आज हम हर जगह ऎसी-ऎसी घटनाओं को देखने-सुनने को विवश हैं जिनसे हमारा सर शर्म से झुक जाता है। वरना किसी में इतनी हिम्मत है कि इंसानों की बस्तियों में जानवरों जैसी हरकतें कर डाले। समाज की सेवा और देश के उत्थान के लिए यदि हम कुछ करने कही भावना रखते हैं तो हमें साफ तौर पर जीवन का लक्ष्य बना लेना चाहिए कि जहां कहीं अच्छे काम हो रहे हैं उन्हें प्रश्रय, प्रोत्साहन और संबल दें तथा समाज में सज्जनों को यथोचित आदर-सम्मान दें तथा उनके नेक कार्यों की सार्वजनीन तौर पर सराहना करें, हरसंभव भागीदार बनें। सज्जनों का संरक्षण ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता और पुण्य कार्य है।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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