आज का चिंतन

  • 2014-07-29 07:14:36.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

aaj ka chintan 1(29 जुलाई 2014 के लिए)

समय मिलता नहीं, चुराना सीखें

आम तौर पर यह जुमला मशहूर है कि समय नहीं मिलता। किसी काम वाले से पूछें या महान से महान निकम्मे से, सारे के सारे एक वाक्य तकरीबन रोजाना और कितनी ही बार कहते रहे हैं कि समय नहीं मिलता, क्या करें।

आदमी को अपने रोजमर्रा के कामों के लिए समय मिल जाता है, फालतू इकट्ठे होकर आलोचना, निन्दा और बुरे कर्मों के लिए समय मिल जाता है लेकिन कोई सा अच्छा काम करने के लिए कहें, समाज या क्षेत्र की भलाई के लिए कहें या फिर किसी भी लोकसेवी काम के लिए कह दिया जाए तो काम करने में कई दिन और महीने निकाल देगा मगर हमेशा यह बहाना उसका सर्वोपरि रहेगा कि समय नहीं मिलता। कई बार अपने काम भी इसी कारण नहीं हो पाते हैं।

समय की कमी हम सभी नैष्ठिक कर्मयोगियों के लिए बहुत बड़ी बात हो गई है और इस कारण से हम खूब सारे काम नहीं कर पाते हैं। इसका मलाल हमें हर क्षण रहता ही है। और इस वजह से तनाव भी रहते हैं।

आदमी के व्यक्तित्व विकास के लिए कई सारे काम ऎसे हैं जिनका आश्रय पा लेने पर उसके तन-मन और धन सभी प्रकार के स्वास्थ्य, यश-प्रतिष्ठा और कीर्ति के लिए काफी मदद मिल सकती है और उसे अपने कामों में ताजगी तथा अतिरिक्त ऊर्जाओं का सहारा मिल सकता है। लेकिन हम अपने रूटीन कामों में ही इतने फंसे हुए हैं कि कुछ नया नहीं करना चाहते, जो हो रहा है वह ठीक है, जो चल रहा है, ऎसे ही चलता रहेगा।

हम सभी की यही स्थिति हो गई है। हमेशा हमें इस बात का मलाल रहता है कि हमारे इच्छित काम पूरे नहीं हो पाते। हम लोग सिर्फ कल्पनाओं के पहाड़ खड़े कर उन पर काल्पनिक शिखरारोहण करके ही संतुष्ट हो जाते हैं लेकिन हमारे मन में यह टीस हमेशा हर पल रहती है कि कहीं कुछ ऎसा है जो हम पूरे मन से चाहते हुए भी नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हमें टाईम नहीं मिलता।

आदमी की पूरी सामान्य जिंदगी में समय का अभाव हमेशा रहा है और रहने वाला है। इसका मूल कारण यह है कि हमारे कामों की प्राथमिकता तय नहीं है, हमारा समय प्रबन्धन विफल रहता है तथा हम जो भी काम-काज करते हैं उसे योजना के अनुरूप नहीं कर, हमारी अपनी सुविधा के अनुसार कर लेने को स्वतंत्र हैं। यही कारण है कि हम सभी लोग समय का रोना रोते हैं। लेकिन थोड़ी सी गंभीरता से सोचें तो साफ पता चल जाएगा कि समय का अभाव नहीं है बल्कि समय को अपने लिए उपयोग में लाने की कला का अभाव है और यही कारण है कि हमारे कई सारे काम पूरे नहीं होते, सोचे हुए काम मन-मस्तिष्क में ही दफन होकर रह जाते हैं और जिंदगी भर हम ऎसे ही बहाने बनाते हुए स्वर्ग या नरक सिधार जाते हैं अथवा शेष बचे हुए कामों को याद करते हुए भूत-प्रेत की योनि प्राप्त कर लिया करते हैं और फिर भटकते ही रहते हैं।

आजकल तीव्रतर भागदौड़ और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के मौजूदा दौर में हम सभी लोग ऎसे ही हो गए हैं। हमारे पास समय का अभाव सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। लेकिन हमें यह सोचना चाहिए कि यह बहाना अपने आप में केवल बहाना  ही है, जो सदियों से यों ही चला आ रहा है, पर कब तक इस घिसे-पिटे बहाने का इस्तेमाल करते रहेंगे।

इन विषम परिस्थितियों में समय को चुराने की कला सीखने की आवश्यकता है। जो इस कला को सीख जाता है वह समय के घोड़ों पर घुड़सवारी का हुनर पा लेता है और वह सब कुछ कर लेता है जिसे लेकर दूसरे लोग समय नहीं मिल पाने की बात करते रहते हैं।

आदमी की पूरी जिन्दगी में कभी प्रतीक्षा, कभी सफर और कभी निष्ठुर बैठे रहने के भरपूर मौके आते रहते हैं। इन अवसरों का इस्तेमाल करने की कला सीखने की जरूरत है।  जीवन में अपने अनुकूल या फुरसती समय कभी नहीं आता। समय को अपने अनुकूल बनाने और उपलब्ध छोटे-छोटे समय का भरपूर उपयोग करने का हुनर आना चाहिए।

इस हुनर को जान लेने वाला फिर कभी समय नहीं मिलने की बात नहीं करता बल्कि दूसरे लोगों को आश्चर्य होता है इनकी उपलब्धियों पर। आम लोग यह कयास लगाने तक को मजबूर हो जाया करते हैं कि आखिर इन उपलब्धियों के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं लोग।

रोजाना  की अपनी दिनचर्या का विश्लेषण करें और यह देखें कि कहाँ से अपने लिए समय को चुराया जा सकता है। छोटे-छोटे अन्तराल वाले समय का आकलन करें तो हमें साफ पता चल जाएगा कि थोड़ा सा विवेक और बाह्य आचरणों में मितव्ययता की आदत डाल लें तो हम अपने सोचे हुए कामों को आसानी से पूरा करने लायक समय निकाल सकते हैं।

जो लोग इस कला को अपना लेते हैं वे जीवन में आशातीत और अविस्मरणीय-चिरस्मरणीय सफलता पा लिया करते हैं, ऎसा काम कर जाते हैं कि दुनिया याद करती है और आने वाली कई पीढ़ियों तक प्रेरणा संचार होता रहता है। आज जरूरत समय नहीं होने का बहाना करने की नहीं है, बल्कि समय चुराकर अपने उपयोग के लिए काम में लाने की है।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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