मार फावड़ा भक्ति का

  • 2014-07-06 13:59:00.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

318146_293947000690942_100002269340389_657740_695126562_nमैंने भगवान से कहा-‘‘मेरी सारी पीड़ाएं छीन लो।’’ भगवान ने कहा-‘‘मुझे छीनने की क्या आवश्यकता है। तुम स्वयं उन्हें अपने साथ लिये घूम रहे हो। तुम ही त्याग दो।’’ मैंने कहा-मुझे सहन करने की शक्ति दो, धीरज दो।’’ उसने कहा-‘‘धीरज आसमान से नही टपकता। परेशानियों के बीच उपजता है वह। उसे तुम्हें स्वयं ही उगाना होगा।’’ मैंने कहा-‘‘मुझे प्रसन्नता दो।’’
भगवान ने कहा-मैं तुम्हें आशीवार्द दे सकता हूं। खुशी तुम्हें अपने भीतर स्वयं ही जगानी पड़ेगी।’’ मैंने कहा-अच्छा फिर मुझे वो सारी चीजें दो, जिससे मैं जिंदगी का आनंद ले सकूं। उसने कहा-‘संसारी चीजों में अल्पकाल का आनंद है, मेरी याद के सिवाय किसी और चीज से तुझे सदाकाल का आनंद मिल ही नही सकता।’

मैंने कहा-ठीक है, फिर मुझे वह शक्ति तो देना कि मैं भी दूसरों से उतना ही प्यार करूं, जितना कि तुम मुझसे करते हो।’’ भगवान मुस्कराकर बोले,-‘‘तुम मेरा दिया हुआ प्यार जितना बांटोगे उससे कई गुना प्यार तुम्हारे भीतर स्वत: ही भरेगा।’’
कितना प्यारा संवाद है भक्त और भगवान का। यह संवाद हमें संदेश देता है कि भीतर से निष्कपट और निश्छल बन, तेरी बाहरी दुनिया खुद ब खुद सुंदर बन जाएगी। क्योंकि वास्तविक आनंद का प्रवाह, आनंद का स्रोत तो तेरे भीतर बह रहा है। तू उसका अनुभव कर, पल-पल क्षण-क्षण उसे अपने भीतर देख और उसकी अनुभूतियों में अपने को आनंदित होता देख। देख, भीतर कि कितना प्यारा झरना प्रवाहित हो रहा है। तू उसके बनते-बिगड़ते बुलबुलों को देख, जो बता रहे हैं कि संसार सरिता का प्रवाह कभी समाप्त नही होता। हां, इसमें नश्वर शरीरों का हर क्षण निर्माण और विनाश अवश्य हो रहा है। बना, अपने आपको एक भोला और मासूम बच्चा। जिसके लिए कवि ने कहा है-
इसलिए तो बच्चों में नूर सा बरसता है।
शरारतें करते हैं साजिशें तो नही करते।।
यदि हमारा हृदय साजिशों का भण्डारागार है और हम उन चीजों का या बातों का अपने अंतर्मन में भी कहीं स्वागत या समर्थन करते हैं, जो मानव जीवन के लिए उचित नही हैं, या त्याज्य हैं तो साधना हमारी भी असफल ही रहेगी। उसका उचित और मनोवांछित लाभ हमें नही मिल सकता। यह बगुला भक्ति हो सकती है, पर ईश्वर भक्ति नही और ईश्वर भक्ति यदि बगुला भक्ति बन गयी तो क्रूर काल का तमाचा अवश्य लगेगा।
समय के तमाचे की देर है प्यारे
मेरी फकीरी भी क्या तेरी बादशाही भी क्या?
किसी नवजात शिशु को देखिए और फिर संसार से जाते किसी मुर्दे को देखिए। बच्चा, बिना लिबास के है और मुर्दा लिबास (कफन) लिए हुए है। बच्चा रो रहा है कि कहां आ गया? मानो, आते ही संसार का भयानक कोलाहल और अशांत वातावरण उसे रोने के लिए विवश कर रहा है और संसार से जाने वाला इसलिए शांत है कि ये समझ रहा है कि अच्छा रहा, जो यहां से चल दिया। इसलिए वह मुंह ढंककर चुपचाप जल्दी निकल जाना चाहता है। आने वाले का रोना और जाने वाले की चुप्पी दोनों ही बहुत कुछ बता रहे हैं, समझने वाले समझ रहे हैं कि ना तो हम से आने वाला ही खुश है और ना जाने वाला ही खुश है।
समझदार समझ रहा है-
‘‘बिना लिबास आये थे इस जहां में।
बस एक कफन की खातिर इतना सफर करना पड़ा।’’
अरे नादान मनवा! सदाकाल के आनंद के लिए भीतर के रस प्रवाह को देख, भीतर के पट खोल। दुनिया भर के कपाटों को खोलने के लिए भ्रमित करने वाली तीर्थ यात्राओं में मत भटक, भीतर के कपाट खोल ले। आनंद का ऐसा फव्वारा फूटेगा कि संभाले से भी नही संभलेगा। लबालब भरे इस सरोवर में भक्ति का फावड़ा मारकर तो देख। निकलती धारा तुझसे संभाले भी नही संभलेगी।

देवेंद्र सिंह आर्य ( 262 )

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