आज का चिंतन-08/05/2014

  • 2014-05-08 03:56:06.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

चर्चा उसी से करें


जिससे उसका संबंध हो


- डॉ. दीपक आचार्य


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आजकल हर जगह अजीब सी बात ये हो रही है कि हम लोग अपनी बातें मन-तन से बाहर निकालने के लिए उनके सामने रोना रो लिया करते हैं जिनका इससे कोई संबंध नहीं होता। जिन लोगों का हमारी किसी बात से संबंध होता है और जो लोग हमें मदद कर सकने की स्थिति में हुआ करते हैं उनके सामने अपनी बात करने में हम हिचकते हैं लेकिन जिन चर्चाओं का जिनसे संबंध होता है उनके समक्ष तो बात करने से परहेज करते हैं मगर दूसरे-दूसरे लोगों के सामने मुखर होकर अपनी व्यथा कथाओं की कैसेट्स अनचाहे ही चला दिया करते हैं।

हम लोग अपनी पूरी जिंदगी की अधिकांश बातें उन लोगों के सामने परोसते रहते हैं जिनका इन बातों से कोई रिश्ता नहीं हुआ करता। हम ऎसे लोगों के सामने अपनी बात जबरन रखकर भले ही रिक्त होने का सुकून जरूर पा सकते हैं पर इससे कई सारी समस्याओं और आफतों को हम मोल ले लिया करते हैं क्योंकि जो बात हमारे मुँह से बाहर निकल जाती है वह दूर तलक जाती है और यह जरूरी नहीं कि हमारी बातें उसी सौ फीसद शुद्ध अवस्था में सामने वालों के पास जाएं, जैसी कि हमने कही हैं।

बल्कि आमतौर पर होता यह है कि हम जो बात करते हैं उसमें अपने-अपने लाभ-हानि भरे स्वार्थों और अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर मिलावट करने वाले मुनाफाखोर खूब लोग सभी जगह विद्यमान हैं। यही कारण है कि कई बार ऎसा होता है कि हमारी बात विकृत होकर जाने किस-किस स्वरूप में सामने वालों तक पहुंच जाती है और अर्थ का अनर्थ, कभी-कभी तो महा अनर्थ तक हो जाता है। कई बार बात इतनी बिगड़ जाती है कि हम सफाई देते-देते थक जाया करते हैं मगर लोगों के मन से मलीनता को दूर नहीं कर पाते।

हमारे पूरे जीवन का अधिकांश हिस्सा उन लोगों से चर्चा करने में व्यर्थ हो जाता है जिनका हमारी बातों या हमसे किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं होता बल्कि अधिकतर बार हम अपनी ही बातों को लेकर सार्वजनिक तौर पर उपहास का पात्र बन जाते हैं।

जीवन की कोई सी घटना हो, व्यथा-कथा हो या दिली सुकून की बातें, उन्हीं से करनी चाहिएं जो हमें समझते हैं और हमें किसी न किसी रूप में मार्गदर्शन दे सकते हैं या दिल से हमारी वांछित मदद करने को समुत्सुक रहा करते हैं। ऎसे लोग हमारी किसी भी बात को अन्यथा नहीं लेते, बल्कि हमारे वास्तविक शुभचिंतक होते हैं।

आजकल शुभचिंतकों में भी दो फिरके हो गए हैं। एक वे हैं जो हमारे शुभ के लिए ही मौका आने पर चिंतन करते हैं, दूसरे वे हैं जो दिन-रात इसी बात का चिंतन करते रहते हैं कि कहीं हमारा शुभ न हो जाए। हम सभी लोग आजकल हर तरफ इन दोनों ही किस्मों के शुभचिंतकों से घिरे हुए हैं।

पूरी जीवनयात्रा में जब हम अपने लोगों की पहचान कर पाने में कामयाब हो जाते हैं तब हमारे जीवन की आधी से अधिक समस्याओं का समाधान अपने आप पा जाते हैं। अपने जीवन की हर बात का जिक्र किसी न किसी से जरूर करें ताकि हमारा मन-मस्तिष्क हमेशा खाली रहे और ताजगी के आवाहन के लिए खुला रहे अन्यथा इंसान की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपनी बातें न किसी से कर पाता है, न वह किसी को विश्वास में ले पाता है।

इस वजह से निरन्तर घुटन के कारण मानसिक एवं शारीरिक व्याधियां उत्पन्न हो जाया करती हैं। यदि हम खुले और खाली रहने का अभ्यास बना लें तो एक भी बीमारी हमारे आस-पास तक नहीं फटक सकती। अपनी हर बात, हर फिकर का जिक्र जरूर करें, मगर उन लोगों के सामने करें जो हमें समझने वाले हों,हमारी बातों को तवज्जो देते हों तथा हमारे लिए आत्मीय मददगार हों।  तभी जीवन समस्याओं से मुक्त हो सकेगा। वरना ऎसे लोगों के सामने दिल खोलने का कोई महत्त्व नहीं है जो न हमारे हैं, न हो सकने वाले हैं बल्कि ये तो तमाशबीन की तरह तमाशा रचने और देखने के लिए ही पैदा हुए हैं।

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डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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