हमारी जिन्दादिली और हमारा लोकतंत्र

  • 2014-04-20 04:48:50.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

दिल के टूटने पर भी हंसना,
शायद जिंदादिली इसी को कहते हैं।
ठोकर लगाने पर भी मंजिल तक भटकना,
शायद तलाश इसी को कहते हैं।
किसी को चाहकर भी न पाना,
शायद चाहत इसी को कहते हैं।
टूटे खंडहर में बिना तेल के दीया जलाना,
शायद उम्मीद इसी को कहते हैं।
गिर जाने पर भी फिर से खड़ा होना,
और ये उम्मीद, हिम्मत, चाहत तलाश
शायद जिंदगी इसी को कहते हैं।
हमारे नेता चुनावों की कड़ाही में फिर वोटों के पकोड़े तल रहे हैं, और कड़क चाय के साथ उनका मजा ले रहे हैं। लोकतंत्र का 16वां पर्व पूरे भारतवर्ष में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। हर पार्टी और हर प्रत्याशी जनसाधारण की अदालत में फरियादी बनकर खड़ा है। बड़े-बड़े नाटक किये जा रहे हैं। लगता है सारे पंथ-निरपेक्ष भारत का संपूर्ण दर्शन इस समय नेताओं ने घोट घोटकर पी लिया है, इसीलिए जहां एक नेता सुबह मंदिर में दिखता है, सूरज चढ़ते चढ़ते वह चर्च में होता है और दोपहर को किसी मस्जिद में होता है, तो सांयकाल को वही नेता आपको किसी गुरूद्वारे में मत्था टेकता नजर आ सकता है। पता नही बेचारे को कौन से धर्मस्थल से मिला आशीर्वाद रंक से राजा बना दे। वास्तव में भिकारी तो वह भगवान के दर का है, जहां से मन्नतें पूरी होती हैं, और मनचाही मुराद पाकर व्यक्ति 'मुरीद' बन जाता है। पर ऐसे नेता की मजबूरी है कि उसे मुरीद बनने से पहले अपने मतदाता के सामने भी सिर झुकाना पड़ता है। पांच वर्ष के सत्ता सुख की चाह में बेचारों को मतदाता जैसे छोटे से भगवान के सामने भी सर झुकाना पड़ता है।

अत: जनता से छोटे बड़े नेता बड़े बड़े वायदे करते हैं। पिछले 67 वर्ष से वायदों का ये अंतहीन सिलसिला चल रहा है और मतदाता के जीवन में केवल उम्मीद हिम्मत, चाहत और सिवाय तलाश के कुछ और नही बचा है। एक पत्र के संपादक महोदय जो देश की एक बड़ी पार्टी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हेांने अपने संपादकीय में लिखा है-
कैसे बीतेंगे आने वाले पांच बरस,

यह तय करेगा आपका एक वोट।
फिर न कोई सोचे भूखा,
कि लोकतंत्र के डंके मारो ऐसी चोट।
अब न हो ऐसे चीरहरण,
न शीश कटें जवानों के
हर खेत में लहराये धानी चुनर
न लटके धड़ किसानों के,
लोकतंत्र के डंके से मारो ऐसी चोट।
पंक्तियां अच्छी आशा बंधाती हैं। लगता है कि शायद एक दिन में ही क्रांति हो जाएगी। पर क्या ऐसा संभव है कि दशकों ही नही बल्कि सदियों से भटका निजाम रातों रात आवाम का शुभचिंतक बनाकर बैठा दिया जाए। विशेषत: तब जबकि भाजपा जैसी पार्टी भी 56 पूर्व कांग्रेसियों को ही अब तक अपना पार्टी प्रत्याशी बना चुकी है। लौट फिर कर वही पुरानी शराब रह जानी है। ऐसी व्यवस्था हमारे लोकतंत्र की मजबूरी है।
जब पार्टियों के प्रत्याशियों में आमूल परिवर्तन नही हो पाया है तो देश के निजाम में कैसे आमूल परिवर्तन आ सकता है?
एक महिला प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती करायी गयी। डॉक्टर ने मां बच्चे की स्थिति को देखा। डा. ने समझ लिया कि स्थिति गंभीर है। इसलिए उसने महिला के परिजनों से कागजों पर हस्ताक्षर करा लिये कि मां व बच्चे में से कोई एक यदि ना रहे, तो उसके लिए आप कोई दावा अस्पताल पर नही करेंगे। तब एक बुजुर्ग ने डा. की बात को समझकर उस महिला के सिर पर हाथ फेरा और कहने लगा कि-''बेटे, सब ठीक हो जाएगा। डा. आ गया है, चिंता मत करो?'' महिला समझदार थी, बोली-'पिताजी क्यों झूठी तसल्ली देते हो? मैंने सब कुछ सुन लिया है, पर मैं एक बात कहना चाहती हूं कि यदि मैं ना रहूं तो मेरे बच्चे का ध्यान रखना।'
बस इस देश के मतदाता को भी ये चुनावी घोषणा पत्र, ये वादे, ये कवितायें पिछले 15 लोकसभा चुनावों में यूं ही झूठी तसल्ली देने वाले सिद्घ हुए हैं। फिर भी हर मतदाता हर बार इन नेताओं
mudda-9-041211 को ये कहकर चुन लेता है कि मैं ना रहूं तो भी मेरे देश का ध्यान रखना। पर कितने नेता हैं जिन्होंने देश का ध्यान रखा है। जो देश का ध्यान नही रख पाये उनसे मतदाता का ध्यान रखने की उम्मीद करना बेमानी है। इस देश का हर आदमी जिंदा दिल है और वह अपनी जिंदादिली के लिए नेताओं का मोहताज नही है। हमारी इसी जिंदादिली से यहंा लोकतंत्र की मशाल जल रही है। पिछले 67 वर्ष से इसी जिंदादिली से जीते-जीते गुजर गये। 15 अगस्त 1947 को जन्मे बच्चे अब बूढ़े हो चले हैं। उन्होंने देश में कंगाली और फटेहाली को शैतान की आंत की तरह बढ़ते देखा है, और नेताओं की अमीरी को भी इसी तर्ज पर दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते देखा है। अब यकीन नही आता कि एक दिन का बादशाह अर्थात मतदाता वोट डाल
ते ही व्यवस्था बदल देगा। 15 बार वह झूठी तसल्ली देने वाले लोगों के बहकावे में आ चुका है, पर उसे वो चीज नही मिली जो मिलनी चाहिए। पर चलो एक बार फिर सही...