राजनीति में अभी ऐसे लोग भी हैं

  • 2014-03-13 14:03:36.0
  • उगता भारत ब्यूरो

-गोवा की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर आईआईअी मुंबई से स्नातक हैं। सरकार की ओर से मकान तो लिया किंतु उसमें केवल अपना दफ्तर ही चलाते हैं, परिवार समेत निजी मकान में रहते हैं। खुद की मारूति या स्कूटर से ऑफिस जाते हैं। अभी एक दिन समाचार आया कि ऑफिस जाने के लिए स्कूटर से जा रहे एक आदमी से लिफ्ट मांग रहे थे।
अपने गृह नगर में सड़क के किनारे ठेले पर चाट या फ्रूट चाट खाते हुए देखे जा सकते हैं। आम आदमी की तरह जीवन यापन का अभ्यास। अपनी मेल आईडी पर नित्य संवाद। सरलता से जन समस्याओं का निबटारा। न लालबत्ती का काफिला, न सुरक्षा का तामझाम।
-त्रिपुरा के सीपीएम मुख्यमंत्री माणिक सरकार लगातार चौथी बार चुने गये हैं। इनके पास न तो अपना मकान है, न वाहन। मुख्यमंत्री के रूप में मिलने वाला वेतन भत्ता भी पार्टी के संचालन के लिए दान कर देते हैं, जबकि पाटी्र उन्हें मात्र 5 हजार रूपये खर्च करने के लिए देती है। फल, सब्जी आदि खरीदने खुद ही मण्डी जाते हैं। रिक्शा या ऑटो से भी सफर करने में परहेज नही है। अपने कपड़े खुद धोते हैं। आफिस पैदल जाते हैं तथा जरूरत के समय ही बिना लालबत्ती की सरकारी गाड़ी प्रयोग करते हैं।
-पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 34 सालों से स्थापित कम्युनिस्ट सरकार को उखाड़कर सत्ता में आयी है, परंतु सूती साड़ी, कंधे पर कपड़े का थैला, पैरों में हवाई चप्पल, अपनी निजी छोटी चौपहिया गाड़ी उनकी पहचान है। आम आदमी के हितों के लिए संघर्ष का भाव हमेशा ही चेहरे पर झलकता है। घर के ज्यादातर काम खुद ही निबटाती हैं।
-पाण्डिचेरी के मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी जनता की समस्याएं जानने के लिए मोटरसाईकिल से वहां की गलियों में घूमते हैं। प्रात: टहलने जाते समय अपने दोस्त की दुकान पर चाय जरूर पीते हैं। दफ्तर में नित्य जनता दरबार लगाकर दोपहर में आम आदमी की सुनवाई होती है।
घर के ड्राइंग रूम में प्लास्टिक की कुर्सियां और मेज हैं तथा शयन कक्ष में लकड़ी की चारपाई है। चुनाव लडऩे के लिए उन्होंने चंदा मांगने के बजाए अपनी पारिवारिक जमीन बेचकर प्रचार का खर्च जुटाया।
-राजनैतिक क्षितिज पर दीनदयाल उपाध्याय का बहुत बड़ा नाम है। जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे। जब उनकी हत्या हुई, तो कुल संपदा थी एक झोला, दो कुर्ता धोती, अंगोछा, बनियान, अंडरवियर, 100-200 रूपये और कुछ पुस्तकें, जबकि उसी वर्ष जनसंघ उत्तर प्रदेश सरकार का हिस्सा बन चुकी थी।
-इंद्रजीत गुप्ता संयुक्त मोर्चा सरकार में देश के गृहमंत्री बने, सुरक्षा के लिहाज से उन्हें बड़े बंगले में रहने की सलाह दी गयी, किंतु वे नही माने।
(राष्ट्र धर्म से साभार)
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