आज का चिंतन-10/02/2014

  • 2014-02-10 12:05:42.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

चाहे जहाँ न रोएँ


घर-गृहस्थी का रोना


डॉ. दीपक आचार्य


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हर बात के लिए अपना एक विशिष्ट अंदाज और मंच होता है। सम सामयिकता और स्थान की उपयुक्तता हमारे कई सारे कामों को आसान कर देती है, कल्पनाओं को सहज ही आकार दे डालने में समर्थ होती है। हर व्यक्ति को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि कौनसी बात किस समय और किस स्थान पर कहना उचित होगा।

कोई बात कितनी ही अच्छी और अमूल्य हो, अगर उसे कहने का समय या स्थान उपयुक्त न हो, तो वह हवा में आयी-गयी हो जाती है। इसी प्रकार अच्छे से अच्छा और पर्याप्त समय हो, लेकिन बात में दम न हो तब भी मजा नहीं आता। इन सभी किस्मों के प्राणियों के बीच कई सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें न उपयुक्त स्थान की फिकर होती है, न समय की, ये चाहे जहाँ मौका मिलने पर अपना रोना शुरू कर देते हैं।

अधिकांश लोगों की आदत ही आजकल ऎसी हो गई है कि जहाँ दो-चार श्रोता दिखे नहीं कि इनकी बातों के पिटारे एक-एक कर खुलने लगते हैं और फिर एक बार ये जो शुरू हो जाएं तो वह समय कभी नहीं आता जब इन्हें बोलने में किसी प्रकार की थकान का अहसास हो। बातें चाहे घर-गृहस्थी की हों अथवा अपने रोजमर्रा के काम-धंधों या नौकरियों की, इन्हें उन्हीं के सामने परोसना ज्यादा हितकर होता है जिनसे इनका संबंध होता है।

जिन लोगों का हमारी घर-गृहस्थी, दुकानदारी, नौकरियों, काम-धंधों से कोई सीधा जुड़ाव नहीं होता, उनके आगे रोना रोने का कोई अर्थ नहीं है। हाँ ऎसा करते हुए हम अपने मन को हलका जरूर महसूस कर सकते हैं लेकिन इस प्रकार की आदत की वजह से कई सारी नई परेशानियाँ सामने आ खड़ी होती हैंं। इसीलिए शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है - वाचालो लभते नाशम। अर्थात जो जितना अधिक बोलता है वह उतना ही जल्दी नाश को प्राप्त होता है।

एक जमाने में जो बातें गांवों की चौपालों, चौरों-चबूतरों और पनघटों पर हुआ करती थीं उनका सिर्फ स्थान बदल गया है। आजकल बसों, रेलों और सार्वजनिक स्थलों से लेकर उन सभी स्थानों पर बातूनियों के डेरे सजे रहते हैं जो आम हैं। यहां ये लोग उन विषयों पर चर्चा करते रहते हैं जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं होता अथवा पारस्परिक चर्चाओं में घर-गृहस्थी, कांमधंधों की बातें हावी रहती हैं। ये बातें भी धीमी नहीं उतनी तेज आवाज में की जाती हैं कि आस-पास के सभी लोग उनकी अमृतवाणी का लाभ प्राप्त कर उनकी निजी जिन्दगी के तमाम पहलुओं के बारे में अवगत हो सकें।

इस परंपरा को और अधिक बढ़ाया है उन नौकरों और काम वाली बाईयों ने, जो घर-घर जाकर चौका-बर्तन और झाडू बुहारी करती हैं। अघिकांश घरों में तो इन काम वाली बाइयों का घर की गृहिणियां रोजाना बेसब्री से इंतजार करती हैं कि कब ये आएं और दूसरों घरों की रामकहानी बयाँ करते हुए आनंद प्रदान करेंं। फिर जब पराये घरों की चर्चा सुन लें तो अपने घर की महिलाएं भी कहाँ पीछे रहती हैं। वे भी चौबीस घण्टे की भडास और अपनी अन्यतम सोच तथा कल्पनाओं को उनके सामने उघाड़ कर ऎसे रख दिया करती हैं जैसे कि इन काम वाली बाइयों के पास ही समाधान का कोई रामबाण नुस्खा हो।

कई परिवारों में तो काम वाली बाइयां काम करते हुए इस तरह औरों के घरों के हालातों को बयाँ करती हैं जैसे कि ये कोई सिद्ध और ओजस्वी कथावाचिकाओं से कम नहीं हों। यह वह समय होता है कि जब कई सारे घरों की गृहिणियों को इनके नॉन स्टॉप कथा पुराण को सुनकर तथा अपनी बातों को इनके समक्ष उण्डेल कर आने वाले चौबीसा घण्टों के लिए नई ऊर्जा और ताजगी का अहसास होता है।

यही हालत बसों और रेलों की है जिनमें अधिकांश लोग अपने नाते-रिश्तेदारों या परिचितों के मिल जाने पर सारे घर की पोल-पट्टी और अपनी व्यथा-कथा को सामने परोस देते हैं। पिछले कुछ समय से बसों-रेलों में बातूनियों की संख्या में जबर्दस्त उछाल आया है। इन लोगों ने वाहनों को सब्जी मण्डी से भी बुरी हालत में ला दिया है। कुछ लोग तासे इतने विचित्र हैं कि सफर के दौरान एक क्षण भी चुप नहीं बैठ सकते।

इन लोगों को यह भी भान नहीं होता कि और भी यात्री हैं जो उनकी बातों को सुन रहे हैं तथा ऎसे में उनके घर-परिवार के बारे में उनकी क्या धारणा बनेगी। इन सारी बातों से बेफिकर होकर खूब सारे लोग अपने मन-मस्तिष्क को खुला रखकर उन सारी बातों को भी कह डालते हैं जो सभी के सामने नहीं कहनी चाहिएं।

इसी तरह रोजाना अप-डाउन करने वाले लोग भी सफर के दौरान ही जाने-अनजाने अपनी नौकरियों और काम-धंधों से जुड़े उन तमाम रहस्यों को अनावरित कर दिया करते हैं जो छिपा कर रखने चाहिएं।  अपने घर-परिवार, गृहस्थी, नौकरी-धंधों और जीवन के तमाम पक्षों से जुड़ी सूचनाओं का इस प्रकार सार्वजनीकरण करना कई बार हमारी परेशानियों का सबब भी बन सकता है। क्योंकि जिन लोगों के सामने हम खुल कर सब कुछ परोसते हैं उनके पास हमारी किसी समस्या का हल नहीं है बल्कि ये लोग हमारे मजे लेने और रहस्यों की परतों को उघाड़ने के लिए ही हमारी हाँ में हाँ मिलाते हुए सब कुछ ऎसे सुनते रहते हैं जैसे कि सारी दुनिया की समस्याओं का अचूक ब्रह्मास्त्र इनके पास ही है।  ये लोग राय भी ऎसी देते हैं जैसे कि दुनिया भर में इनसे बड़ा बुद्धिमान और कोई हो ही नहीं। समय और स्थान को देखकर अभिव्यक्ति करें, सार्वजनिक स्थलों पर उन बातों को कहने से बचें जिनका हमारी निजी जिन्दगी से संबंध है।

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