गाय और हमारी कृषि व्यवस्था

  • 2014-02-06 10:07:51.0
  • राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

महान वैज्ञानिक डा. अलबर्ट आइन्स्टीन ने अपने जीवनकाल में एक बार भारत से अनुरोध किया था कि 'भारत टै्रक्टर रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और यंत्रीकृत खेती की पद्घति को न अपनाये क्योंकि इनसे 400 वर्षों की खेती में ही अमेरिका में जमीन की उपजाऊ शक्ति बहुत सीमा तक समाप्त हो चली है।'

आज भारत डा. आइंस्टीन के उक्त अनुरोधात्मक परामर्श की उपेक्षा करने का परिणाम झेल रहा है। हमने इतनी मूर्खताएं की हैं कि उनसे उबरना दलदल में से निकलने के समान हो रहा है। कृषि को बैल के स्थान पर टै्रक्टर आधारित करने का परीक्षण भी हमारे लिए एक ऐसी ही मूर्खता है। अब ''भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद'' द्वारा किये गये शोधों से सिद्घ हो रहा है कि रासायनिक खाद के प्रयोग करने से भूमि की उपजाऊ शक्ति 20-25 वर्ष में लगभग समाप्त हो जाती है। इस प्रकार की खादों के निरंतर प्रयोग से मिट्टी की आद्र्रता निरंतर घटती जाती है। कीटनाशकों को जब हम खेतों में अधिक प्रयोग करते हैं तो उसका प्रभाव हमारे द्वारा उत्पादित अन्न की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। वह अन्न हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्घ हो रहा है, और देश के कितने ही क्षेत्रों में प्राणलेवा रोगों को फेेलाने में सहायता कर रहा है। कृषि यंत्रों को, टै्रक्टर आदि को तथा महंगे कीटनाशक और रासायनिक खादों को खरीदने से किसान ऋण में डूब रहे हैं, और उनमें से लघु किसानों की स्थिति तो ये हो रही है कि वे मारे ऋण के बोझ के आत्महत्या तक कर रहे हैं।

अंग्रेजों के काल में या उससे पूर्व मुस्लिम काल में तो सेठ-साहूकारों के ऋण से किसान परिवार दु:खी ही रहते थे, पर अब तो इतने आतंकित हैं कि आत्महत्या की प्रवृत्ति उनमें निंरतर बढ़ती ही जा रही है। देश प्रदेश की तहसीलों में कार्यरत राजस्व कर्मी कभी भी किसी 'बड़े मगरमच्छ' पर हाथ नही डालते। उनकी गाडिय़ां सदा निर्धन किसानों के दरवाजे पर ही जाकर रूकती हैं, और ऐसे किसानों को अपमानित कर उन्हें उठाकर  ले आती हैं। बहुत से किसानों में तहसील के राजस्व कर्मियों की इन गाडिय़ों को देखने से ही व्याप्त रहता है। हमने इस समस्या पर और सरकारी आतंक पर कभी विचार नही किया कि अंतत: इस समस्या के मूल में कारण क्या है? यदि सूक्ष्मता से देखा, समझा, या परीक्षण किया जाए, तो डा. अलबर्ट आइंस्टीन की उपरोक्त चेतावनी की अवहेलना ही इसका मूल कारण है।

नवीन वैज्ञानिक अनुसंधानों से ज्ञात हो रहा है कि गाय के 1 किलो गोबर से 30 किलो सेन्द्रिय खाद तैयार हो सकता है। एक गाय, एक बैल दिन में औसतन 7 किलो गोबर देते हैं, जिससे 210 किलो खाद तैयार हो सकती है। इस एक दिन की गोबर से तैयार खाद का 365 गुणा करने पर 76650 किलो खाद हमें एक गाय से अथवा बैल के गोबर से एक वर्ष में प्राप्त हो सकती है।

वेणीशंकर वसु ने अपनी पुस्तक ष्ठह्वठ्ठद्द द्बह्य द्दशद्यस्र द्वद्बठ्ठद्ग में लिखा है-''गाय के गोबर से हमें सस्ता व श्रेष्ठ जैविक खाद प्राप्त होता है, और खाद से सस्ते स्वादिष्ट एवं पौष्टिक खाद्यान्न, सब्जियां व फल  प्राप्त होते हैं, एवं गोबर गैस से सस्ता ईंधन व प्रकाश मिलता है।''

यदि हम गाय के गोबर का अधिकाधिक उपयोग करें, तो देश में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी एवं बीमारी मिट सकती है। केन्द्रीय कृषि मंत्रालय की एक रपट के अनुसार देश में 12 करोड़ 15 लाख 80 हजार हेक्टेयर ऊसर व बंजर भूमि पड़ी हुई है। इसको उपजाऊ बनाने का एक मात्र उपाय गोबर है। जबकि रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग भारत की कृषि योग्य भूमि को ही बंजर और अनुपजाऊ बनाता जा  रहा है। इससे कृषि की स्थिति भयानक से भयानकतम होती जा रही है। देश में जनसंख्या की बढ़ती दर और कृषि योग्य भूमि का घटता जा रहा विस्तार देश के कृषि वैज्ञानिकों के लिए ंिचंता का विषय है।

उधर सरकार इस सबसे बेखबर है, या जानबूझकर बेखबर बने रहना चाहती है। वह गोवंश को डालरों में मांस के रूप में बेच रही है। देश में 1997 के आंकड़ों के अनुसार प्रतिदिन 3 लाख पशुओं को क्रूरतापूर्वक मारा जा रहा है। मांस का निर्यात जो कि 1976 में मात्र 70,000 टन था, वह भयावह रूप से बढ़कर 1997 में 1380000 टन हो गया। 1951 में 1000 की जनसंख्या पर 430 पशु हमारे देश में थे जो 1997 में घटकर 50 रह गये और अब 2014 में इनकी संख्या कठिनता से 30 ही होगी।

यदि एक टै्रक्टर कंपनी एक टै्रक्टर तैयार करती है और उसकी कीमत 5-6 लाख रूपया रखती है, तो मानो कि न्यून से न्यून 50 बैलों को वह अनुपयोगी बना देता है, जिन्हें कसाई बना मानव समाज सहजता से अपना भोजन बनाकर चट कर जाता है। उसे ये पता ही नही होता कि एक बैल की औसत आयु यदि 10 वर्ष भी मानी जाए तो वह 766500 किलो जैविक खाद हमें देकर कई एकड़ बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने की क्षमता रखता है। जहां एक टै्रक्टर से 50 बैल समाप्त हो रहे हों, वहां कितनी क्षति हमें उठानी पड़ रही है, इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

महर्षि दयानंद गोकरूणानिधि में लिखते हैं-''गाय की एक पीढ़ी में छह बछिया और सात बछड़े हुए। इनमें से एक की मृत्यु रोगादि से होना संभव है तो भी 12 रहे। उन छह बछियाओं के दूध मात्र से उक्त प्रकार 154440 अर्थात एक लाख  चौव्वन हजार चार सौ चालीस मनुष्यों का पालन हो सकता है। अब रहे छह बैल, उनमें एक जोड़ी से एक साल में 200 मन अनाज उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार तीन जोड़ी 600 मन अन्न उत्पन्न कर सकती हंै, और उनके कार्य का मध्य भाग 8 वर्ष है। इस हिसाब से 4800 चार हजार आठ सौ मन अनाज उत्पन्न करने की शक्ति एक जन्म में तीनों जोड़ी की है। 4800 मन, इतने अन्न से प्रत्येक मनुष्य का तीन पाव अन्न भोजन में गिनें तो 256000 दो लाख छप्पन हजार मनुष्यों का एक बार भोजन होता है।

आजकल आप 4800 मन गेंहूं का मूल्य निकालें तो इतने गेंहूं के मूल्य से ही टै्रक्टर का मूल्य (5-6 लाख रूपये) चुकता हो सकता है। इसके अतिरिक्त अन्न के साथ साथ भूसा आदि चारा जो खेत से उत्पन्न होगा उसका मूल्य अलग है। कहने की आवश्यकता नही कि एक टै्रक्टर नष्ट करता है 50 बैलों को, तो उस एक टै्रक्टर के मूल्य की पूर्ति तो एक बैल की जोड़ी से ही हो जाती है। यदि 50 बैलों से या 25 बैलों की जोड़ी से कुल आय निकाली जाए तो टै्रक्टर हमारे लिए हमारा मित्र सिद्घ न होकर शत्रु ही सिद्घ होगा। इसका एक कारण ये भी है कि टै्रक्टर से किसान को डीजल आदि डालने के लिए धन की भी आवश्यकता पड़ती है, और टै्रक्टर से डीजल का निकलने वाला धुंआं पर्यावरण को प्रदूषित करता है। जबकि गाय का गोबर, मूत्र, श्वांस आदि पर्यावरण को स्वच्छ बनाते हैं।

विश्वबैंक के दो अधिकारी कार्टर ब्रिटेन तथा क्रिस्टन होम्मन द्वारा किये गये भारत में पर्यावरण प्रदूषण के कारण हुई आर्थिक क्षति के मूल्यांकन के अनुसार भारत में सन 1992 में हुए पर्यावरणिक पतन के कारण रूपये 34000 करोड़ की हानि हुई। इसमें हवा तथा पानी के प्रदूषण से रूपये 24,550 करोड़ तथा भूमि प्रदूषण व जंगल कटाई के कारण रूपये 9450 करोड़ की हानि हुई। दोनों अधिकारियों ने यह भी कहा कि भारत में भूमि की गुणवत्ता का स्तर हर वर्ष 4 से 6.30 प्रतिशत नीचे आ रहा है। इसका मूल्य 4400 करोड़ रूपये होता है। पानी के प्रदूषण का स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ रहा है। उसके चलते स्वास्थ्य रक्षा आदि पर 19.950 का विशेष व्यय करना पड़ रहा है। पानी से उत्पन्न होने वाले रोगों में मात्र विकलांगता पर ही 350 करोड रूपये व्यय होते हैं। देश में हवा के प्रदूषण के कारण हर वर्ष 40000 मृत्यु होती हैं। वायु जनित रोगों की रोकथाम के लिए हर वर्ष 5500 करोड़ व्यय होते हैं। मिट्टी की गुणवत्ता घटने से हर वर्ष 7640 करोड रूपये की हानि हो रही है।

इस प्रकार गोवंश के विनाश से हमारी सरकारों को चाहे कितने ही डालर क्यों ना मिल रहे हों, सारा का सारा ही घाटे का सौदा है। कुछ चंद दलाल राजनीतिक गलियारों में पैठ  लगाये बैठेे हैं, और छदम धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े नेताओं की अंतरात्मा मर चुकी है। अन्यथा यदि अब भी ये लोग संभल जाएं तो स्थिति को सुधारा जा सकता है। गायों के वंश को बचाने के लिए आज हमें (धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ही सही) अकबर बादशाह के उस आदेश को यथावत लागू करने की आवश्यकता है जो कि सिंधिया राज्य के पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित रखा है, वह फरमान इस प्रकार उल्लेखित है-''सल्तनत के सभी हाकिम और मुलाजिमान अमीर उमराव, परगनों के हाकिम और शाही मुल्कों के कारोबार के जिम्मेदार जान लें, कि इंसाफ के जमाने में आज यह फरमान जारी किया जा रहा है, जिस पर अमल करना, सबके लिए निहायत जरूरी है। सबको मालुम रहे कि गाय की जाति चाहे वह नर हो या मादा हो, बहुत ज्यादा फायदा देने वाली है। सारी दुनिया के जानवरों और आदमियों की जिंदगी का सहारा गाय जाति ही है। इसलिए हमारी ऊंची हिम्मत और साफ नियत का तकाजा है कि हमारे निजाम में गोकशी की रस्म बिलकुल ना रहे। इसलिए इस शाही फरमान को देखते ही हुकूमत के सभी मुलाजिमों को इस बारे में खास रूप से कोशिश करनी चाहिए। जिससे शाही फरमान के मुताबिक अब से किसी गांव का शहर में गाय के कत्ल का नाम और निशान बाकी ना रहे। यदि कोई आदमी इस काम को करेगा और गाय का कत्ल करना नही छोड़ेगा तो वह अच्छी तरह समझ ले कि उसको सुल्तानी गजब में फंसना पड़ेगा और वह सजा का हकदार होगा।

आज की सरकारें अकबर को धर्मनिरपेक्षता का अलंबरदार मानती रही हैं। यदि ऐसा है तो आज हम धर्मनिरपेक्षता के काल में एक धर्मनिरपेक्ष सरकार को धर्मनिरपेक्ष बादशाह के शाही फरमान को देश में यथावत लागू कराके धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से गौ जैसे प्राणी की रक्षा करनी चाहिए।

जो लोग ये मानते हैं कि देश के मुसलमान इस समय ऐसी किसी राजाज्ञा को साम्प्रदायिक मानेंगे तो उन्हें अकबर को साम्प्रदायिक घोषित करना चाहिए। साथ ही ऐसे लोगों को ये भी बताना व समझना होगा कि इस्लाम में भी गोवध का पूर्णत: निषेध है। कुरान की 'शूर-ए-हज' में लिखा है कि-'हरगिज नही पहुंचेंगे, खुदा के पास उसके गोश्त और खून, हां पहुंचती है तुम्हारी परहेजगारी। काते-उल-शजर, वाय-उल-वशर, जावेद-उल-वकर, दायम-उल-खमर, अब्दन फी उस्कर अर्थात हरा पेड़ काटने वाले दूसरे की पत्नी से कुकर्म करने वाले, गाय को मारने वाले तथा शराब पीने वाले खुदा के यहां कभी माफ नही किये जाएंगे।

इतना स्पष्ट निषेधात्मक आदेश यदि कुरान गाय की हत्या के संबंध में दे रही है, तो गोवंश की हत्या रोकने में बाधा क्या है? लगता है सरकार की नीयत में दोष है, यदि सरकारी नीयत सही हो जाए तो जनता के आपसी कलह क्लेश तो स्वयंमेव समाप्त हो जाएंगे। गाय साम्प्रदायिक पशु नही है। साम्प्रदायिक तो उसे बनाया गया है, और कुछ लोग उसे साम्प्रदायिक ही बनाये रखना चाहते हैं देश और मानवता के हित में इस सोच को यथाशीघ्र बदलने की आवश्यकता है।

गाय हमारी कृषि और अर्थव्यवस्था का आधार है। उसकी उपयोगिता को इसलिए इस्लाम ने भी स्वीकार किया है। हम आज उसे जितनी शीघ्रता से अपनी कृषि व्यवस्था का पुन: आधार बना लेंगे उतना ही लाभप्रद होगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1596 )

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