आज का चिंतन-11/01/2014

  • 2014-01-11 06:39:02.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

कोई काम थोंपें नहीं


स्वेच्छा का ख्याल रखें


- डॉ. दीपक आचार्य


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कर्मयोग और मन-मस्तिष्क का सीधा संबंध मनुष्य की इच्छा से होता है। इच्छा होने पर उसे जो काम सौंपा जाता है अथवा जो काम वह करता है उसमें पूरी निष्ठा लगाता हुआ मन से पूरा करता है और उसकी उत्पादकता एवं गुणात्मकता दोनों ही उल्लेखनीय होती है। जबकि इच्छा न होते हुए जो भी काम किसी को सौंपा जाता है उसकी उत्पादकता, संख्यात्मकता एवं गुणात्मकता हमेशा संदेहास्पद ही होती है और इसका कोई प्रभाव नहीं होता।

आधुनिक जमाने को देखते हुए कहा जा सकता है कि आदमी का हर काम मूड़ पर निर्भर करता है।  मूड़ अच्छा हो तो आदमी अच्छा काम करता है, सभी से अच्छा व्यवहार रखता है और मूड़ खराब होने या किसी कारण से बिगड़ जाने पर वह किसी काम का नहीं होता। आजकल अपनी गांव-ढांणियों से लेकर कस्बों, शहरों और महानगरों, दुनिया के कोने-कोने तक यह मूड़ की बीमारी इतनी फैल चुकी है कि  सारे के सारे लोग मूड़ के गुलाम बने हुए हैं।

यह मूड़ अच्छा हो तो गुड़ और वेरीगुड़, फील गुड़, और मूड़ अच्छा न हो तो सब कुछ गड्ड-मड्ड, खुद भी मायूस और अधमरों की तरह पड़े रहते हैं और दूसरे भी इनके मूड़ की वजह से परेशान। आजकल सभी जगह मूड़ की महामारी इतनी फैली हुई है कि कोई बचा नहीं है इससे।

जीवट वाले आदमियों की वो नस्ल अब करीब-करीब खत्म ही हो चुकी है जिसमें व्यक्ति के संकल्प का जागरण होने पर मन-मस्तिष्क और शरीर उस दिशा में सोचने-समझने और गति पाने लगते थे और कर्मयोग अपने आप पूर्णता की ओर बढ़ने लगता था। आज व्यक्ति का संकल्प क्षीण हो गया है और भ्रमों, शंकाओं, आशंकाओं, पूर्वाग्रहों, दुराग्रहों की कई परतों ने संकल्प की आभा को खत्म कर डाला है।

यही कारण है कि मन के घोड़ों और परिस्थितियों के दुष्प्रभावों ने उस पर अपना अधिकार जमा लिया है। संकल्पहीनता या संकल्पक्षीणता की इस विचित्र स्थिति का ही परिणाम है कि आज इंसान मूड़ का गुलाम हो चुका है और वह भी इतना कि मूड़ की दशाओं और दिशाओं पर ही आदमी का जीवन चलने लगा है।

मूड़ का खराब होना कई स्थितियों पर निर्भर करता है लेकिन सर्वाधिक कारक है वे काम, जो उसे दिए गए हैं या जो उसे अनचाहे करने पड़ते हैं। अनमने भाव से काम करने या बिना इच्छा के कोई सा काम थोंपे जाने की स्थिति में आदमी व्यथित हो उठता है। इसके साथ ही हर आदमी चाहता है कि जो कुछ हो वह मनचाहा हो, अनचाहा हो जाने पर उसका मानसिक संतुलन स्वाभाविक रूप से डाँवाडोल हो उठता है। यही स्थिति उसके मूड़ को बिगाड़ कर रख देती है। कोई भी यह अंदाज लगा पाने की स्थिति में नहीं होता कि आखिर आदमी की पटरी अब कब लाईन पर आएगी।

यह मूड़ अपने आपमें विचित्र है जिसके कारण से काफी सारे लोग मूढ़ होते जा रहे हैं। आज हमारे आस-पास से लेकर दुनिया भर तक यही हालत है। काफी संख्या में लोग ऎसे हैं जिन्हें अपनी पसंद का काम नहीं मिला हुआ है या ऎसे काम करने को विवश होना पड़ रहा है जो उन्हें नापसंद हैं।

इसी प्रकार कई सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें औरों के मनोविज्ञान की समझ नहीं है और इस कारण उन्हें ऎसे-ऎसे काम सौंप देते हैं कि बाद में पछताना पड़ता है। दोनों ही तटों की हालत ऎसी है। जब मूड़ खराब होता है सारे के सारे तट अपने आप अस्त और पस्त हो जाते हैं। इन हालातों में यदि लोगों को अपनी इच्छा का पसंदीदा कर्मयोग मिल जाए या दे दिया जाए तो उनका जीवन निहाल हो जाए और जहां ये काम करते हैं या रहते हैं वहाँ स्वर्गीय आनंद पसर जाए।

हम सभी लोगों का जीवन कर्मयोग की सुगंध के साथ जुड़़ा हुआ है। हमें चाहिए कि हम उन्हीं किस्म के कामों को हाथ में लेने का अभ्यास डालें जिनमें हमारी रुचि हो। जो लोग लीडरशिप से जुड़े हैं उन्हें भी चाहिए कि वे कोई सा काम हो, आँखें बंद कर औरों पर थोंपें नहीं बल्कि पात्रता देखें और लोगों को उनकी पसंद या रुचि के काम सौंपें ताकि कर्मयोग को पूर्णता प्राप्त हो सके।

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डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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