आज का चिंतन-07/01/2014

  • 2014-01-07 16:16:22.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

खूब हैं कहने वाले
'आपकी कृपा है'


- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

जो सामने मिलता है, खैरियत पूछने पर यही कहता है - आपकी कृपा है। दिन में सौ लोग मिलेंगे तो उन सभी से आदमी यही कहेगा - आपकी कृपा है। आजकल औरों की कृपा पर जिन्दा रहने वाले लोगों की भरमार सभी जगह है। हर तरफ लोग जिन्दा हैं तो बस इस एक ही प्राणाधार की वजह से। और वह है औरों की कृपा। ज्यादा विनय उमड़ आए तो कह डालेंगे - आपकी दया। आजकल आदमी को जाने क्या हो गया है कि वह खुद पर भरोसा तोड़ कर दूसरों के सहारे जीता हुआ कृपा और दया की ऑक्सीजन पर पल रहा है। कहीं यह जुमला या तकिया कलाम हो चला है और अधिकांश मामलोंं में इंसान की जिन्दगी का अहम सच। हर कोई किसी न किसी की कृपा या दया पर जिंदा है। यह कृपा और दया शब्द ही ऐसे हैं कि अच्छे-अच्छों को पिघला देते हैं। हमारे आस-पास ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है जिनकी कृपा या दया इन शब्दों को सुनने के बाद ही जागृत होती है। कोई उनकी पूछ न करे तो ये अधमरी या मरी हुई पड़ी रहती है। जैसे कि किसी ने हाथ जोड़ लिए, सर झुका लिया, घुटने या चरणों का स्पर्श कर लिया और कान में यह शब्द पड़ गए - आपकी कृपा है, आपकी दया है, उनके भीतर दबे पड़े स्नेह और आत्मीयता का दरिया उफनना शुरू हो जाता है। जो दया और कृपा पाने वाले हैं वे भी इन शब्दों का कमाल देखकर निहाल हो जाते हैं, और वे भी अपने आपको महान सौभाग्यशाली समझकर धन्य हो जाते हैं जो दया या कृपा की वृष्टि करने वाले माने जाते हैं। ईश्वर की अनमोल कृति खुद ईश्वर को झुठला दे और इंसानों की दया, करुणा या कृपा पर जिन्दा रहने और उन्हीं के जयगान को विवश हो जाए, यह सृष्टि का निर्माण करने वाले विधाता का घोर अपमान ही कहा जा सकता है। आजकल खूब सारे लोग उन्हीं लोगों पर मेहरबानी करने को आतुर रहते हैं जो उनकी हाँ में हाँ करते रहें, उनकी हर बात को ब्रह्मवाक्य मानते रहें, सभी प्रकार की बुद्घि और विवेक को कहीं गिरवी रखकर उनकी परिक्रमा करते हुए जयगान करते रहें और अधीनता स्वीकार कर दासत्व को गौरवान्वित करें। फिर उन लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो अपने जायज-नाजायज स्वार्थों की पूर्ति के लिए गधे को भी बाप कह डालें और उस स्थिति में आ जाएं जहाँ कैसा भी काम हो, अपना शरीर उनके लिए समर्पित होकर पसर जाए। औरों की सेवा के लिए ही तो हैं हम सब, फिर सेवा और परोपकार के कामों मे काहे की लाज-शरम। आजकल लोग दूसरों को भरमाने, प्रशस्तिगान करने में इतने माहिर हो गए हैं कि उनके मुँह से किसी के लिए कुछ भी बुलवा दो, हमेशा तैयार रहते हैं।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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