आज का चिंतन (04/12/2013)

  • 2013-12-04 02:21:01.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

                                                           अपना मूल्यांकन खुद करे

                                                          दूसरों के मूल्यांकन पर न चलें

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आजकल हमारा अपने आप पर से विश्वास या तो उठ गया है, या फिर डगमगा गया है। तभी हम अपने व्यक्तित्व और कर्मयोग को दूसरों की आँखों से देखने लगे हैं, दूसरों की कल्पनाओं से अपने लिए सब कुछ तय करने लगे हैं। हमारी जिन्दगी के सारे काम-काज अब पराया की दिशा और दृष्टि के अनुसार चलने लगे हैं जैसे कि हम इंसान न होकर कोई मशीन ही हों।

कोई हमें जब अच्छा कह देता है, तब खुश हो लेते हैं, कोई थोड़ा सा बुरा कह डाले तो हम मायूस और अधमरे होकर कोने में बैठ जाते हैं। हर आदमी की जिन्दगी में यह स्थिति रोजाना आती-जाती रहती है। जब कोई हमें खुश कर देता है या खुशी देने जैसी बात ही कर लेता है तब हम जी लेते हैं, कोई हमारे लिए बुरी बात कह डालता है तब हम मरे जैसे हो जाते हैं।

यानि की हमारी प्रसन्नता और अप्रसन्नता, जीवन और मरण का यह दौर हमें उस स्थिति में ले आया है जहाँ हमारा अपने खुद पर नियंत्रण नहीं है बल्कि हमारा आत्मनियंत्रण समाप्त हो चुका है और हमारी डोर या अंकुश दूसरों के हाथों में आ चुकी है। आजकल मूल्यांकन का क्षेत्र बड़ी ही अजीब स्थितियों से गुजर रहा है जहाँ मूल्यांकन से मूल्य गायब हो गए हैं और सिर्फ स्थूल और गंधहीन अंकन ही रह गया है।

हालात ये हैं कि आजकल हर कोई आदमी दूसरे का मूल्यांकन करना चाहता है और अपने आपको हमेशा सर्वश्रेष्ठ निर्णायक की भूमिका में देखना चाहता है। दुर्भाग्य और शर्म की बात यह है कि आजकल वे लोग मूल्यांकन का माद्दा रखने लगे हैं जिनके भीतर मूल्यहीनता चरम पर है और ऎसे में ये लोग जिनका मूल्यांकन करते हैं उसमें मूल्यों की बजाय उन्हीं कारकों का अंकन होता है जो इन तथाकथित मूल्यांकनकत्र्ताओं को प्रसन्न रख सके।

आजकल दूसरों पर टिप्पणी करने और अनचाहे मूल्यांकन कर प्रकटीकरण की महामारी हर तरफ फैली हुई है। खुद के न कोई पते-ठिकाने हैं और दूसरों का मूल्यांकन करने चले हैं, ऎसे लोगों की बहुतायत हमारे यहाँ भी है। आजकल सभी तरफ ऎसे निर्णायक लोगों और मूल्यांकन करने वालों की रेवड़ें नज़र आने लगी हैं।

इन विडम्बनाजनक परिस्थितियों में मूल्यांकन का प्रभाव ही समाप्त हो गया है। जो लोग कर्मयोगी हैं उन्हें चाहिए कि मूल्यांकन के लिए दूसरों के भरोसे न रहें। न दूसरों से प्रशंसा पाने के लिए प्रयास करें क्योंकि अब वे भारी लोग रहे ही नहीं जो हमारा मूल्यांकन करने का सामथ्र्य रखा करते थे।

तरक्की और व्यक्तित्व के निरन्तर विकास के लक्ष्यों को पाने के जो लोग आकांक्षी हैं उन्हें आत्म मूल्यांकन का मार्ग अपनाना चाहिए। अपनी आत्मा सर्वश्रेष्ठ मूल्यांकन करने वाली होती है जो न कभी झूठ पसंद करती है, न चापलुसी या भ्रष्टाचार।  दूसरों के भरोसे का मूल्यांकन डुबो देने वाला है जबकि आत्म मूल्यांकन तारने वाला।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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