आज का चिंतन (07/11/2013)

  • 2013-11-07 02:43:44.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

आपराधिक मानसिकताग्रस्त होते हैं


नकाब और काले शीशों के कद्रदान


- डॉ. दीपक आचार्य


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अंधेरों को वे लोग ही हमसफर बनाते हैं जिन्हें अँधेरा पसंद होता है। इन लोगों की ऊर्जाएं और बुद्धि तभी काम करती है जब अँधेरों का साथ हो।  अंधेरा पसंद लोगों की मानसिकता का थोड़ी गंभीरता से अध्ययन एवं शोध करने पर अपने आप पता चल जाता है कि इन लोगों की मनोवृत्ति क्या है और अंधेरों के प्रति इनका मौलिक एवं शाश्वत प्रेम क्यों झलकता रहता है।

आजकल ऎसे अँधेरा पसंद लोगों की हर तरफ बाढ़ आयी हुई है। फिर अब अंधेरों को मिल गया है फैशन का साथ। ये लोग अपने आप को सूरज की रोशनी से बचाने के लिए जाने कैसे-कैसे नकाब ओढ़ कर चलने के आदी होते जा रहे हैं। इसी प्रकार अपने वाहनों में काले शीशों का प्रयोग करने वाले लोगों की भी कोई कमी नहीं है। आदमियों की एक प्रजाति वह भी है जो धूप न होने पर भी अपनी आँखों पर काले ग्लास वाले चश्मे चढ़ाये रखने की आदी है।

किसम-किसम के लोगों की फसलें अपने यहाँ खूब फलने-फूलने लगी हैं।  काले चश्मों, पहचान छुपाने वाले नकाबों और काले शीशों में रहने वाले लोगों में से कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो काफी कुछ ऎसे होते हैं जो किसी न किसी तरह के मनोमालिन्य से ग्रस्त रहते हैं और जमाने की आँखों से नज़रें मिलाने में शर्म आती है अथवा साहस नहीं होता।

व्यक्ति के मस्तिष्क और हृदय में अंधेरों की मौजूदगी होने पर आदमी के व्यवहार और रंग-ढंग में इस प्रकार की मानसिकता स्वाभाविक हो जाती है। यह बीमारी उन लोगों में नहीं हुआ करती जो प्रकृति के बीच रहकर सभी पांच तत्वों का भरपूर उपयोग करते हैं और अपने हाल में मस्त रहते हैं। यह महामारी उन लोगों में तरह पसरती जा रही है जो अभिजात्य वर्ग के हैं और बुद्धिजीवियों की श्रेणी में आते हैं। ये लोग परिश्रम करने से कतराते हैं, इनकी पूरी जिंदगी बौद्धिक चातुर्य और बुद्धि के भरोसे ही चलती है।

जिन लोगों की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं में शरीर को पूरा ढंक कर रहने की अनिवार्यता है उनकी बात अलग है। लेकिन आजकल ऎसे-ऎसे लोग अपने आपको ढंकने लगे हैं जिनके लिए न तो अनिवार्यता का कोई बंधन है, न उनकी पुरानी पीढ़ियों ने कभी ऎसा किया होता है।

कई लोग अपने गौरेपन को बरकरार रखने या बढ़ाने भर के लिए नकाब ओढ़ कर काम-धंधों पर आते-जाते हैं, कई लोग इसलिए पूरे शरीर को ढंक कर चलते हैं ताकि इन्हें कोई पहचान न सके। हद तो यह है कि ऎसे लोग दिन ढलने के बाद भी अथवा सूरज के न रहने पर भी चेहरा और शरीर ऎसे ढंके हुए रहते हैं जैसे इनकी ममी की तैयारी की जा रही हो। रात में मुँह बाँधे और चेहरा ढक कर रहने का अर्थ या तो भगवान समझ सकता है या ये मुँह ढंके हुए लोग ही। ख़़ासकर सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों और काम-धंधों, बिजनैस में रमे हुए लोगों में यह किस्म बहुतायत में देखी जा रही है।

इन लोगों को शायद यह पता नहीं है कि सूरज से जितना दूर रहेंगे उतने विटामिन-डी के लिए तरस जाएंगे। हम कितने ही गौरे और आकर्षक चेहरे वाले क्यों न हों, हमारा शरीर सूरज की किरणों से बगैर सैकड़ों प्रकार की बीमारियों और बैक्टीरियाओं का घर बनता जा रहा है , जिसका असर हमारे यौवन के ढलते ही दिखने वाला है। फिर न ये नकाब काम आएंगे, न चेहरे का गौरापन या छरहरी काया।

इसी प्रकार गाड़ियों के शीशों पर काली फिल्म चढ़ाये रखने वाले लोगों के काम-धंधों के रहस्योें और इनकी मनोवृत्तियों को खंगाला जाए तो काफी रहस्यों का उद्घाटन या तो अपने आप होने लगता है, या लोग कर देते हैं।  एक और किस्म के आदमी होते हैं जो हमेशा अपनी आँखों पर काला चश्मा चढ़ाये रखते हैं। धूप न हो, घर-दुकान या दफ्तर में हों तब भी, इन लोगों को देख कर लगता यों है जैसे कि अभी-अभी मोतियाबिन्द का ऑपरेशन करा कर लौटे हैं। इनमें से अधिकांश लोगों में खुली आँखों के साथ जमाने से रूबरू होने का साहस नहीं होता अथवा अपने आप पर लज्जा आती है।

यह रहस्य इन्हें भी पता नहीं होता कि आखिर क्या मजबूरी है कि बिना धूप या सूरज के काले चश्मे पहने रहे। लेकिन आदमी वही काम करता है जो उसकी मानसिकता और चित्त में जमा संस्कारों से जुड़े होते हैं। इन संस्कारों में मलीनता होने पर आदमी सभी तरफ अंधेरा ही अंधेरा देखने और अंधेरा फैलाने का आदी हो जाता है, उसे सूरज या रोशनी से चिढ़ छूटती है और ज्यादा समय तक रोशनी को बर्दाश्त नहीं कर पाता। जो लोग इस प्रकार की मनोवृत्तियों के होते हैं उन लोगों की जिन्दगी में भी अंधेरों का किसी न किसी प्रकार वजूद हमेशा बना ही रहता है।