दीपावली का संदेश और आज का प्रदूषित परिवेश

  • 2013-11-03 02:20:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

प्रकाश पर्व दीपावली हमें अपने भीतर झांक कर देखने अर्थात अंतरावलोकन  कर अपने भीतर व्याप्त सभी बुराईयों को समूल नष्ट कर उनके स्थान पर अच्छाईयों को रोपित करने और उन्हें पल्लवित व पुष्पित करने का सुअवसर प्रदान करता है। इस प्रकार यह पर्व आत्म निरीक्षण का पर्व है। जीवन को उत्थानवाद की ओर धकेलकर उसे श्रेय मार्ग पर आरूढ़ करने का प्रतीक है।

परंपरा और रूढ़ि से हम प्रकाश पर्व दीपावली पर जो प्रकाश पुंज दीपों की पंक्ति अथवा माला सजाते और प्रज्ज्वलित करते हैं उसका निहित अर्थ यही है, जो हमने ऊपर उल्लिखित किया है। इसी अर्थ का विस्तार आज के संदर्भों में किया जा सकता है। हम आजकल सारे मानव समाज में एक दूसरे के प्रति मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या और द्वेष की अग्नि दहकते देखते हैं। मानव हृदय में भयंकर अग्निकांड हो रहा है। सभी इस अग्निकांड में सुलग और झुलस रहे हैं। इस अग्निकांड से उपजी व्याधि का नाम तनाव है। भागदौड़ के जीवन में हर व्यक्ति इस व्याधि से पीड़ित है। दीपावली पर्व इस अग्निकांड को भस्म कर हमारे हृदय में सभी के लिए प्रेम का दीपक जलाने के संदेश के साथ आता है, इसके इस संदेश को सुनकर उसे हृदयंगम करना हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। हमें हृदय में प्रकाश करना है, प्रेम के दीपक से। हृदय अरण्य को अग्निकांड से झुलसाना नही है। दीपक का विस्तार रूप अग्निकांड में हो सकता है किंतु यह हमारे प्रमाद, आलस्य और असावधानी का भी सूचक है।

दीपक के पास ईर्ष्या और द्वेष, काम और क्रोध जैसे सूखे ईंधन को रखकर हम भोग में लिप्त होकर सो गये। दीपक की आग इस सूखे ईंधन ने पकड़ ली और इस प्रकार हमारा सदप्रयास आत्मघात में परिवर्तित हो गया। दीपावली हर वर्ष इसी प्रेम को पुन: प्रज्ज्वलित करने के मौन संदेश को लेकर मानवतावाद को ऊंचा उठाने के लिए हमारे मध्य उपस्थित होती है। कार्तिक मास में अमावस्या के दिन गहन अंधकार की उस रात्रि में हम ऐसा संकल्प लेकर परिवार में व्याप्त कुण्ठा, तनाव और अलगाव के वातावरण को समाप्त कर वहां प्यार प्रेम की फसल को पुन: हरी भरी कर सकते हैं। दीपावली पर अपने घरों की साफ सफाई करना बाहरी स्वच्छता का सूचक हो सकता है। वास्तविक सफाई तो भीतर से की गयी सफाई के पश्चात ही संभव है।

दीपावली पर्व पर पारिवारिक परिवेश नितांत हर्षोल्लास का होता है। इस पर्व के निकट किसान की फसल घर में आती है और नई फसल की बुआई होती है। इसलिए  इस पर्व को नवशस्योष्टि अर्थात नई फसल का यज्ञ भी कहा जाता है। किसान वर्ग अर्थात वैश्य वर्ग (प्राचीन काल में वैश्य वर्ग में किसान भी आता था) बहुत ही प्रसन्न होता है। घर की समृद्घि लक्ष्मी पर निर्भर करती है, इसलिए लक्ष्मी पूजन का महात्म्य इस पर्व के साथ जोड़ दिया गया। आर्थिक समृद्घि के लिए ईश्वरोपासना, यज्ञादि की प्राचीन परंपरा पौराणिक काल में लक्ष्मी पूजन के रूप में विकसित हो गयी जो कि आज एक रूढ़ि बनकर समाज में व्याप्त है। अच्छा हो वैश्य वर्ग सच्चाई को समझे और उसे वास्तविक रूप में स्वीकार करे।

इस पर्व पर लोग मिष्ठान्न, पकवान आदि घर में बनवाते हैं और गरीबों को वस्त्रादि तथा मिष्ठान्न, का दान करते हैं यह एक अच्छी परंपरा है जिसका विस्तार और प्रचार प्रसार होना चाहिए। यह हमारी सामाजिक समरसता की सूचक है। बताशे, खील आदि इस त्यौहार पर विशेष रूप से प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। चहुंओर प्रसन्नता पुष्पों की भांति बिखरी हुई दीखती है। बच्चे शाम को दीपमाला सजाने के पश्चात पटाखे आदि चलाकर अपनी खुशी को प्रकट करते हैं।

यह पटाखे आदि चलाने की प्रवृत्ति अच्छी नही है। इससे प्रदूषण बहुत फेेलता है। देश में करोड़ों रूपया व्यर्थ में नष्ट हो जाता है। यही पैसा यदि राष्ट्र रक्षा कोष में दिया जाए तो देश पर से बहुत सा विदेशी ऋण उतर सकता है अथवा अन्य विकास कार्यों पर यदि इसे व्यय किया जाए तो बहुत से गांवों के लिए सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, विद्यालय आदि दिये जा सकते हैं। जागरूक नागरिकों को समाज में आगे आकर इस प्रकार का सहयोग करना चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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