आज का चिंतन-08/09/2013

  • 2013-09-08 03:43:42.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

सुकून चाहें तो अपनाएँ


स्थानीय परंपराओं को


- डॉ. दीपक आचार्य


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लोक जीवन और परिवेश में परिवर्तन का क्रम सदैव बना रहता है और उसी के अनुरूप दुनिया के सभी क्षेत्रों में जनजीवन को ऊर्जा से सिंचित करने तथा ताजगी बनाए रखने के साथ ही परंपराओं के निर्वाह के लिए उत्सव, पर्व और मेलों का प्रचलन आदिकाल से रहा है जब से मनुष्य ने सभ्यता को ओढ़ना आरंभ किया।

हर क्षेत्र विशेष के लिए अपने अलग-अलग रीति-रिवाज, रहन-सहन के ढंग और पर्व-उत्सव, मेले एवं अन्य आयोजन होते हैं। यह जरूरी नहीं कि एक स्थान पर होने वाले आयोजन किसी दूसरे स्थान पर सफल हो ही जाएं या एक जगह की गतिविधियां और परंपराएं दूसरे स्थानों में रहने वाले लोगों को भा ही जाएं।

हर क्षेत्र की भौगोलिक एवं पारिस्थितिकीय आबोहवा एवं लोकजीवन से जुड़ी रस्मों के अनुरूप वहाँ के पर्व-उत्सव एवं मेले तथा अन्य सार्वजनिक आयोजन होते हैं। ये ऋतुओं तथा मौसम के बदलाव, खेती-बाड़ी, फुर्सत आदि सभी प्रकार के कारकों से जुड़े हुए होते हैं।

इसलिए यह सच्चे अर्थों में स्वीकारा गया है कि सभी क्षेत्रों के लिए अपनी अलग-अलग परंपराओं के बावजूद इन सभी का मूल उद्देश्य मानव समुदाय और इससे जुड़े हुए तमाम कारकों को आनंदित और उल्लसित करना है।  यही कारण है कि  हमारे यहाँ एकरसता और जड़ता नहीं है बल्कि विभिन्नताएं हैं और उनका भी अपना अलग ही आकर्षण है। इन्हीं की बदौलत लोक जीवन की धाराएं और उपधाराएं संचालित होती हैं।

बात देश के किसी भी क्षेत्र की हो अथवा दुनिया के किसी कोने की। हर क्षेत्र में परंपराएं स्थानीय कारकों द्वारा संचालित और प्रभावी हैं और यही कारण है कि क्षेत्र विशेष की लोक लहरियों को देखने और अनुभव करने का आनंद सदियों से विद्यमान अपने क्षेत्रों में ही आता है, इनसे इतर इलाकों में वो आनंद अनुभव नहीं किया जा सकता।

इस यथार्थ के बावजूद आजकल अपने देश में देखादेखी फैशन और नकलची भक्ति की ऎसी बुराई घर कर गई है कि इसने धर्म का अभेद्य सुरक्षा कवच ओढ़ लिया है और इसकी आड़ में समाज की पुरातन परंपराओं की हत्या हो रही है।

इन्हीं आधुनिक नकलची परंपराओं में शुमार हो चला है गणेशोत्सव का मूत्रि्त कुंभ। यह आमतौर पर समुद्री क्षेत्र महाराष्ट्र तथा उन इलाकों में में प्रचलित था जो समंदर के किनारे हैं, लेकिन अब पूरे देश में फैल चुका है। जबकि देश भर में अलग-अलग स्थानों पर इन दिनों गणेश उपासना और उत्सव की कई अन्य विधियां और परंपराएं रहीं हैं लेकिन फैशनपरस्ती के दौर में सारी पुरानी परंपराओं और उपासना पद्धतियों पर अब गणेशोत्सव की मूत्रि्तयाँ हावी हैं। और इनमें भी प्रतिस्पर्धा यह कि कहां कितनी बड़ी मूत्रि्त है।

इससे समाज को किन दुष्प्रभावों से गुजरना पड़ रहा है उसकी चिंता किसी को नहीं है। इसी प्रकार कुछ वर्ष से दशामाता की मूत्रि्तयां बनाकर इनके विसर्जन का दौर शुरू हो चुका है जबकि अपने यहां इसकी कोई परंपरा कभी नहीं रही। धर्म के नाम पर धंधा करने वाले लोगों को अच्छी तरह पता है कि आम लोगों की जेब से पैसे निकलवाने के लिए धर्म सबसे बढ़िया और सुरक्षित धंधा है और इसके नाम पर लोगों से चाहे जो करवा लो। इसलिए इन लोगों ने गणेशमूर्तियों, दशामाता मूर्तियों का धंधा आरंभ कर दिया। यही स्थिति कावड़ यात्रा की है जिसका अपने इलाकों में कुछ वर्ष पूर्व नगण्य प्रभाव था लेकिन आज ये महोत्सव और मेले का रूप ले चुके हैं।

बाहरी परंपराओं को चाहे-अनचाहे स्वीकार कर लिए जाने से हालात ये हो गए हैं कि सदियों से चली आ रही शांतिपूर्ण व स्थानीय उपासना पद्धतियों का प्रभाव नष्ट हो गया है और अब धर्म के नाम पर फैशन का वो दौर चल पड़ा है जिसमें हमें भगवान या उनकी कृपा से कोई सरेाकार नहीं है, हमें चन्दे और उत्सवों से मतलब है जहाँ पराये पैसों से कुछ दिन मुफतिया आनंद पाने का जतन हावी है।

जबकि असल में हमारी मौलिक परंपराओं में न पैसे की जरूरत थी और न ही संसाधनों या मूत्रि्तयों की। एक गरीब से गरीब आदमी भी धार्मिक आयोजनों में बराबरी की भागीदारी निभाता था और श्रद्धा का साकार स्वरूप सामूहिक आनंद का ज्वार उमड़ाता था।

आज श्रद्धा और आस्था नहीं है, पराये पैसों से उत्सवी आनंद पाने का उतावलापन है और पैसों की माया से भगवान को रिझाने के जतन मुँह बोल रहे हैं। धर्म और परंपराओं का मौलिक स्वरूप बनाए रखें तथा नकल की फैशन छोड़ें, इसी में अपना, अपने इलाके का भला है। भगवान को शांत रहने दें और उपासना में शोरगुल और धंधेबाजी छोड़कर गंभीरता लाएं, वरना कहीं के नहीं रहेंगे हम।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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