आज का चिंतन-07/09/2013

  • 2013-09-07 02:55:25.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

सौभाग्य का आनंद चाहें तो
भ्रमों-शंकाओं से दूर रहें


- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077


जीवन में सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं और ऐश्वर्य, सुदृढ़ पारिवारिक एवं सामाजिक स्थिति और लोक प्रतिष्ठ होने के बावजूद कई लोग ऐसे होते हैं जो जीवन में कभी मुक्ति और प्रसन्नता का अनुभव नहीं कर पाते हैं। ऐसे लोग न खुद खुश रह पाते हैं, न औरों को खुश रख पाने का सोच सकते हैं। फिर खाली दिमाग हो तब तो शैतान का घर बनेगा ही।
मन-मस्तिष्क और शरीर के धर्म अपने आप होते रहते हैं लेकिन ग्रह-नक्षत्रों से लेकर परिवेशीय हलचलों का सीधा असर मनुष्य पर इतना पड़ता है कि वह कभी उमंगों की तरंगों में उछाले मारता है, कभी विचलित हो जाता है, कभी उद्विग्न, कभी न्यूनाधिक रूप से मानसिक विक्षिप्त। इसी से जन्म होता है क्रोध और तनाव का, जो बाद में मस्तिष्क के कोनों से निकल कर पूरे शरीर में फैल जाते हैं और कमजोर अवयवों पर सीधा हमला आरंभ कर देते हैं।
वस्तुत: मनुष्य के सभी प्रकार के व्यवहारों का सीधा संबंध उन सूक्ष्म तत्वों से है जो व्यक्ति को कभी प्रसन्नता, कभी नाराजगी और कभी उदासीनता की ओर धकेलते रहते हैं। सामान्य आदमी तिनके की तरह प्रवाह के साथ बहने का आदी हो जाता है। कभी वह तेज धाराओं के साथ उछाले मारता हुआ तटों को चिढ़ाता हुआ आगे बढ़ता रहता है और कभी कोई भँवर आ जाने पर यकायक उसमें फँस जाता है।
जिन लोगों की वृत्तियां और सोच बहिर्मुखी होती है, वे लोग बाहरी वातावरण के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को ढालते रहते हैं और अनुकूलताओं को प्राप्त करने की अभीप्सा इन लोगों का प्राथमिक कर्त्तव्य हो जाता है। दूसरी ओर जो लोग अन्तर्मुखी होते हैं वे अपने हिसाब से परिवेश को ढालने के लिए शक्ति लगाते रहते हैं। इनमें भी दो किस्में हैं। एक तरह के लोग अपने भीतर ही आनंद और ईश्वरीय दिव्यताओं का पता पा जाते हैं और सदैव अपनी मौज-मस्ती में ही रहा करते हैं। दूसरी तरह के लोग अनुकूलताओं के प्राप्त नहीं हो पाने के लिए ईश्वर और जमाने भर को दोष देते रहते हैं और इनकी पूरी जिन्दगी परायों की शिकायत तथा समस्याओं का रोना रोने में ही निकल जाती है।
इन तमाम किस्मों के लोगों के बीच यह बात स्पष्ट रूप से उभरी होती है कि सभी प्रकार की अनुकूलताएं पाने के बावजूद जो लोग खुश नहीं हो पाते हैं उनके बारे में कहा जा सकता है कि या तो उनके भाग्य में सुख और आनंद लिखा ही नहीं है या फिर उनके ग्रह-नक्षत्रों या बीज तत्वों का कोई आनुवंशिक दोष व्याप्त है। आखिर सब कुछ होते हुए भी जीवन में प्रेम और आनंद के भावों का अभाव रहता है?
ईश्वरीय साधनाओं और सेवा-परोपकार से जुड़े हुए कुछेक श्रेष्ठ कर्मों के पुण्य या महापुरुषों के सान्निध्य की बदौलत ऐसे लोगों को कहीं से आनंद का स्रोत मिल भी जाए, तब भी ये उसके प्रति हमेशा बेकद्री दिखाते हुए दु:खों और तनावों के साये में जीते हैं।
इस किस्म के लोग अपने वैचारिक केन्द्र के चारों तरफ शंकाओं, आशंकाओं, भ्रमों और अज्ञात भयों का ऐसा मकड़जाल बुन लिया करते हैं कि इन्हें दिन-रात ये काली रस्सियों के जाल जैसे मकड़जाल ही न$जर आते रहते हैं, इनसे बाहर निकलने की इन्हें कभी फुर्सत ही नहीं होती है।
हमारे आस-पास भी ऐसे खूब सारे लोगों का जमावड़ा है जो झूठ, अफवाह और निराधार बातों का ही सदैव चिंतन करते रहते हैं और जिन्दगी के लक्ष्य एवं आनंद से बेखबर होकर नकारात्मक सोच-विचार से घिरे रहते हैंं। ऐसे लोग जहाँ रहते हैं या जिनके साथ रहते हैं वहाँ से भी जीवन का आनंद गायब होने लगता है और बेवजह मनहूसियत फैलने लगती है। ऐसे दुर्भाग्यशाली लोग अपने संपर्कितों के लिए भी दुर्भाग्य लाने वाले हो सकते हैं, इसलिए इस मनोवृत्ति के लोगों से अपने आपको दूर रखें, इसी में अपना भला है।
हमें चाहिए कि भ्रमों और शंकाओं-आशंकाओं को दिल और दिमाग दोनों से निकाल दें। यह तय मानकर चलें कि जो हमारा है वह अपना ही रहने वाला है, और जो दूसरों के भाग्य में है वह लाख कोशिशों के बाद भी अपना नहीं रहने वाला है। फिर बात चाहे चल-अचल सम्पत्ति की हो या संबंधों की।
भ्रमों और शंकाओं का सीधा सा अर्थ है हमारे दुर्भाग्य का उदय। यह सारी बातें काल्पनिक ही होती हैं जिन्हें कल्पनाओं से भी बाहर फेंक देने में ही जीवन का असली आनंद छिपा हुआ है।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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