आज का चिंतन-02/09/2013

  • 2013-09-02 01:39:16.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

औरों की नकल न करें
खुद की पहचान बनाएं


- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077


दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति में यह सामर्थ्य मौलिक रूप से विद्यमान है कि वह चाहे तो अपनी अलग पहचान बना सकता है। इसके लिए ईश्वर की ओर से उसे पर्याप्त बुद्घि और हुनर से नवाजा जाकर धरा पर भेजा गया है। यह दिगर बात है कि हम लोग इस शाश्वत सत्य और ईश्वरीय सत्ता से प्राप्त कृपा को उपेक्षित एवं नगण्य मानने की भूल करते रहे हैं।इस वजह से अधिकांश लोग अपनी बुद्घि और मौलिक प्रतिभाओं का पूरा-पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं जबकि काफी संख्या में लोग ऐसे होते हैं जो ऐतिहासिक, पौराणिक कथानकों से जुड़े व्यक्तित्वों और घटनाओं तथा सम-सामयिक मशहूर लोगों के चरित्र से प्रेरणा प्राप्त कर उनके जैसा बनने का प्रयास करते हैं। ये लोग अपनी रुचि और जमाने की मांग के अनुरूप अपना कोई न कोई रोल मॉडल तय कर लेते हैं फिर उसकी नकल करना आरंभ कर देते हैं। यह नकल उसके रंग-रूप, चेहरे-मोहरे, वाणी अभिव्यक्ति से लेकर उसके जीवन की हर घटना की होने लगती है जिसे देखकर साफ कहा जा सकता है कि कोई व्यक्ति अमुक आदमी का €लोन, डुप्लीकेट या कॉपी है।

आजकल लोगों में नकलची बनकर जीने की परंपरा घर करती जा रही है। खूब सारे लोग हर कहीं विद्यमान हैं जो औरों की नकल करते हुए अपने आपको उन जैसा बनाने के लिए दिन-रात उतावले बने हुए हैं। हर व्यक्ति को भगवान ने सारी क्षमताओं के साथ धरती पर इसलिए पैदा किया है ताकि वह इतिहास, महापुरुषों और पुरानी परंपराओं के साथ ही सम सामयिक व्यक्तित्वों और घटनाओं आदि से सीख लेता हुआ इस प्रकार अपने व्यक्तित्व का विकास करे कि जमाने भर में उसकी अपनी एक अलग ही पहचान हो तथा अपने ज्ञानयोग, कर्मयोग के बूते धरती को कुछ ऐसा दे जाए कि उसे सदियों तक याद रखा जा सके।

इसके लिए हर आदमी को अपना अलग व्यक्तित्व तैयार करना होता है। पर आजकल ऐसा हो नहीं रहा है। पुरानी परंपराओं और लीक पर चलते हुए लोग बिना कुछ 'यादा मेहनत किए दूसरों की नकल करते हुए अपनी पहचान बनाने के आदी होते जा रहे हैं।

कोई किसी नेता-अभिनेता या साधु-संत, अपराधी-डॉन की नकल कर रहा है, कोई किसी मॉडल या गीतकार, कवि की, तो बहुत सारे लोग किसी न किसी की नकल को ही अपने जीवन का लक्ष्य मानकर नकलची पहचान की दिशाओं को अंगीकार कर चुके हैं। इस सारी कवायद में लोग अपने मौलिक हुनर और खुद की पहचान को भुलाते जा रहे हैं और समाज के सामने कुछ नया परोसे जाने की परंपरा खत्म सी होती जा रही है।

औरों की पहचान को अपनाकर, नकल करते हुए जो लोग खुद का अस्तित्व सुरक्षित करने और अपनी पहचान कायम करने में लगे रहते हैं वे 'यादा समय टिक नहीं पाते और जल्द ही लोकप्रियता की मुख्य धारा से कट जाते हैं।

आज हम जिन अधिकांश लोगों को किसी न किसी क्षेत्र में मशहूर मान रहे हैं उन सभी की स्थितियां ऐसी ही हैं। गिनती के कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे के सारे मौलिकताहीन छवि वाले हैं। दुर्भाग्य यह भी है कि हमें सिखाया जा रहा है कि उन जैसा बनो। कोई यह नहीं कहता कि कुछ नया करो और अपनी अन्यतम पहचान बनाओ।

जो लोग दूसरों के न€शेकदम पर चलने और उनके जैसा बनने की राय देते हैं वे असल में अपनी मौलिक पहचान कायम करने की यात्रा में सबसे बड़े शत्रु हैं। किसी की नकल हम €यों करें, जिन्दगी जीने का मजा तो तब है कि हम अपने आपमें इतना माद्दा पैदा करें कि खुद की पहचान बने।

हमारी पहचान किसी और के नाम या काम से होना हमारे मनुष्य होने को ही ल'िजत करता है। हम जो हैं वही बने रहें, दूसरों के नाम या काम की छाया से दूर रहकर अपनी ऐसी पहचान बनाने का प्रयत्न करें कि हम औरों की तरह न हों। न किसी की कॉपी, डुप्लीकेट और न €लोन।

अपनी अन्यतम मौलिक पहचान से ही ईश्वर प्रसन्न हो सकता है, नकलची होकर मर जाने के बाद ऊपर के लोक में भी हमें धि€कारा ही जाता है। और यहाँ तो लोग वैसे ही भूल जाने वाले हैं €योंकि अपनी ही परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कई नए डुप्लीकेट और नकलची पैदा होते रहते हैं जो हमारी ही तरह पुरानी लकीरों को आगे बढ़ाते रहते हैं।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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