आज का चिंतन-01/09/2013

  • 2013-09-01 03:05:54.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

झूठन चाटने वाले ही करते हैं
झूठी और सुनी-सुनायी बातें


- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077


हर इंसान की हर प्रकार की अभिव्यक्ति और जीवन व्यवहार का सीधा संबंध खान-पान से है। अन्नमय शरीर का निर्माण खान-पान से ही होता है और ऐसे में मन-मस्तिष्क और शरीर के तमाम अवयवों, कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों से लेकर जीवन की तमाम क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं और व्यवहार में उस खान-पान का सीधा असर प्रतिबिम्बित होता है जिस प्रकार का खान-पान वह करता है।

वस्तुत: मनुष्य निर्माण का मूलाधार ही खान-पान है जिसकी बुनियाद पर यह मरणधर्मा शरीर टिका हुआ है। इसलिए कहा गया है - जैसा खाए अन्न, वैसा हो मन, जैसा पाणी वैसी वाणी। संसार में सभी प्रकार के शुभाशुभ कर्मों का प्रभाव अन्न और पानी पर होता है और ऐसे में ये जिस परिमाण में शुद्घ होंगे, उस परिमाण में अ'छा प्रभाव दिखाएंगे। जिस अनुपात में ये अशुद्घ होंगे, उतने परिमाण में बुरा असर दिखाएंगे।

खान-पान के अ'छे या शुद्घ होने का सिर्फ यह अर्थ ही नहीं है कि इसे परोसने अथवा बनाने में कितनी शुद्घता का ख्याल रखा गया है। बल्कि इससे भी आगे बढ़कर इसकी शुद्घता की कसौटी का पैमाना यह है कि यह कितने अनुपात में खुद का है, पराया है और इसकी उपलŽधता या प्राप्ति के पीछे कितना पुरुषार्थ और पवित्रता जुड़ी हुई है। दस बार गंगाजल से नहा धोकर तथा जाने कितने ही साबुनों और शैंपुओं का प्रयोग कर नहाने के बाद, कितने ही नए और स्व'छ वस्त्र पहनकर कितने ही शुद्घ से विशुद्घ बरतनों में पानी भरा जाए, खाना पकाया जाए, लेकिन इसमें प्रयुक्त की गई सामग्री यदि शुद्घ भाव वाली नहीं है, किसी ऐसे व्यक्ति के सौजन्य से प्राप्त हुई है जिसका पैसा पुरुषार्थ से कमाया न होकर हराम का है, छीना-झपटी कर चुराया हुआ है, औरों का हड़पा हुआ है अथवा ऐसे स्रोतों से आया है जिन्हें मनुष्य के लिए वर्जित कहा गया है, तब ऐसी स्थिति में जो भी अन्न-पानी इन लोगों का होगा, वह पूरी तरह मलीनता लिए हुए होता है तथा अशुद्घ रहता है।

इसी प्रकार किसी दुष्ट स्वभाव वाले, बेईमान, भ्रष्ट, चोर-उच€कों, रिश्वतखोरों, कमीशनखोरों, मुनाफाखोरों और व्यभिचारी किस्म के लोगों का बनाया और दिया हुआ अन्न तथा जल अशुद्घ और घातक होता है।

ऊपर से देखने में अन्न और जल में भले ही कोई अशुद्घि दिखाई न दे मगर व्यक्ति के पापकर्म और पाप की कमायी से आए अन्न और जल दोनों में ही पाप रहता है। व्यक्ति के पापकर्म का सीधा प्रभाव एक तो पापी या अनीति से ग्रस्त व्यक्ति के मन-मस्तिष्क और व्यवहार पर पड़ता है, दूसरा इस व्यक्ति के घर में रखा हो या इसके द्वारा दिया गया हो। इसके पानी और अन्न में स्वत: पाप होता है और जो कोई इसका उपयोग करता है वह अनजाने ही सामने वाले के पापों को अपने शरीर में उतार लेता है।

एक बार किसी भी पापकर्म वाले व्यक्ति के वहाँ का खाना-पानी हो जाता है तब उसके अन्न और पानी का पाचन होने पर उस पाप के अंश हमारे र€त से लेकर वीर्य या रज में प्रवेश कर जाते हैं और अपने शरीर के भीतर विद्यमान दिव्य चक्रों पर काले आवरण की तरह छाकर हमारी पवित्रता को भंग कर देते हैं। एक बार ऐसा हो जाने पर हमारा मन-मस्तिष्क सजातीय आकर्षण सिद्घांत के अनुसार बाहरी खान-पान के प्रति 'यादा आकर्षित होने लगता है।

इस प्रकार हम लोग पापमय अन्न और पानी के प्रयोग से इतने मलीन हो जाते हैं फिर हमारी दिव्यता और पवित्रता, आदर्श तथा संस्कार धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। एक समय ऐसा आता है जब हमारा शरीर और मन-मस्तिष्क पूरी तरह मलीनता ओढ़ लेता है और हम भी उन सभी प्रकार के पाप कर्मों और अनैतिकताओं वाले आचरण में सहज भाव से लिप्त होने लगते हैं जहाँ हमें वे सारी बातें, हथकण्डे, षड़यंत्र और करतूतें जायज लगने लगती हैं और हम भी पापकर्म की मुख्य धारा में हाथ धोने लगते हैं।

यही कारण है कि बहुत सारे लोगों के बारे में कहा जाता है कि वे पहले जैसे नहीं रहे, बदल गए हैं। आजकल हर तरफ हराम का खान-पान करने वाले लोगों का बाहुल्य है जिनके लिए बाहरी खान-पान रोजमर्रा की जिन्दगी का अहम् हिस्सा हो गया है जिसके बगैर उन्हें दिन बेकार लगता है। हमें हर कहीं ऐसे लोग खूब संख्या में मिल ही जाते हैं जो अपने गोलगप्पी चटखारों का मजा लेने के लिए सुनी-सुनायी और झूठी बातें करते रहते हैं जिनका न कोई आधार होता है, न औचित्य। इन लोगों के बारे में थोड़ी गहराई में जाएं तो पता चलता है कि ये वे लोग हैं जो झूठन चाटने के आदी हैं। ऐसे लोग मरते समय तक झूठ, फरेब और म€कारी में आकंठ डूबे रहते हैं।समझदार लोगों को चाहिए कि उन लोगों के प्रति बेपरवाह रहें जो झूठन चाटने, परायी चाशनी में अंगुलियाँ डूबो कर चूसने और बाहरी मसालों की गंध पाने अपने थूथन इस्तेमाल करने के आदी हैं।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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