आज का चिंतन- 10/08/2013

  • 2013-08-10 03:32:23.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

सब कुछ है पर आनंद नहीं
यही है सभी का रोना


- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

आज न कहीं अभाव रहे हैं और न अवसरों की कमी। आदमी के पास पुश्तैनी कुछ नहीं है तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, और है तब तो कोई बात ही नहीं। हालांकि काफी सारे लोग ऐसे जरूर हैं जिनके पास उतना भी नहीं है कि जिन्दगी आसानी से गुजार सकें। लेकिन अब राज ने बहुत कुछ सहारा जरूर दिया है।हमारी निरन्तर बढ़ती जा रही अपार जनसंख्या के बीच ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है जिनके पास बहुत कुछ ऐसा है जो आम लोगों के पास नहीं हुआ करता। इन लोगों के पास जमीन-जायदाद, अफरात सोना-जवाहरात, रुपया-पैसा और भोग-विलास के सारे साधन-संसाधन उपलŽध हैं।

इतना सब कुछ जिनके पास नहीं है वे लोग खुश रह सकते हैं, लेकिन जिनके पास सब कुछ है वे आजकल खुश नहीं रह पा रहे हैं। भगवान का दिया और खुद के हाथों जमा की गई अनाप-शनाप धन-दौलत और साधनों के होते हुए भी बहुत बड़ी संख्या में लोग ऐसे हैं जो आनंद और सुकून के घोर अभाव में अभावग्रस्तों की ही तरह जिन्दगी जी रहे हैं। इनमें से कई सारे तो ऐसे हैं जिनसे भिखारी अ'छे कहे जा सकते हैं।इन लोगों को भगवान ने इतना सब दे दिया है कि जिसके लिए आम आदमी बरसों तक मिन्नतें करता रहता है फिर भी नसीब नहीं हो पाता। कुछ लोगों को भाग्य से मिल गया है तो कुछ को योगमाया से अथवा अपने मौलिक हुनरों का इस्तेमाल कर की गई मेहनत से।एकाधिक मकानों, भरी तिजोरियों या कि बैंक लॉकरों, आलीशान बंगलों, चलाचल संपत्ति, Žयाज की आवक और जाने किन-किन रास्तों से इनके पास मुद्राओं से लेकर भोग-विलास की सामग्री जमा होती रही है। इन सबके बावजूद ऐसे लोगों में से नŽबे फीसदी लोग सदैव असन्तुष्ट और उदास रहते हैं।कुछ को अपनी संपदा में अभिवृद्धि करने का भूत सवार होता है तो कइयों को इस बात कि चिन्ता है कि इतनी सारी माया को संभालकर कैसे रख पाएंगे और आगे क्या होगा। ऐसी ही चिन्ताओं की लहरों से घिरा इनका अशांति के भंवर में तिनकों की तरह उछाले मारते हुए निरन्तर उद्विग्न बना रहता है।

कई लोग सब कुछ होते हुए भी इनका उपयोग नहीं कर पाते हैं। इनके लिए सिर्फ देखना और देखकर खुश होना ही जीवन भर का क्रम बना रहता है। कइयों के भाग्य में यह संपदा और वैभव लिखा जरूर होता है लेकिन वे अपनी मलीन और संकीर्ण मन:स्थिति की वजह से न उपभोग कर पाते हैं, न आनंदित रह पाते हैं।

कुछ लोग दैवीय कृपा या पितरों के वरदान से सब कुछ पा जाते हैं लेकिन अपने मन की शंकाओं, आशंकाओं और भ्रमों की वजह से आनंद में नहीं रह पाते हैं और जीवन भर इनका चिžा अशांत, उद्विग्न और नकारात्मक मानसिकता से भरा हुआ रहता है। यही बहुत बड़ी वजह होती है कि जाने किस पूर्वजन्म के क्रूर कर्म या किसी अज्ञात दुर्भाग्य के मारे ये अपने पास सब कुछ होते हुए भी आनंद से दूर रहते हैं और लाख कोशिशों के बावजूद आनंद की प्राप्ति इनकी जिन्दगी में कभी नहीं होती। ये हमेशा अशांत और अतृप्त बने रहते हैं।इन लोगों के भाग्य में जाने कौनसे ऐसे क्रूर ग्रह-नक्षत्र होते हैं कि लाख समझाए जाने, यथार्थ से रूबरू कराने और नग्न सत्य के उद्घाटन के बावजूद इनकी समझ में कुछ नहीं आ पाता है। शहंशाह की तरह माल-असबाब होते हुए भी मरते दम तक अतृप्त, असन्तुष्ट और अशांत बने रहते हैं।जिन लोगों को सब कुछ होते हुए भी आनंद प्राप्त नहीं हो, उन्हें अपने मन के उद्वेगों, अशांति और आशंकाओं के कारणों को जानना चाहिए तथा यथार्थ एवं सत्य को सामने रखकर निर्णय लेने चाहिएं तभी वे मौज मस्ती का आनंद ले पाएंगे।

वैभव सम्पन्न एवं सम सामयिक समस्याओं तथा बाधाओं से मुक्त होते हुए भी जिन्दगी भर पागलों की तरह रोते-कलपते रहें तो इसके लिए न भाग्य को दोषी ठहराया जा सकता है, न भगवान को। इसके कारणों की तलाश हमें अपने भीतर ही करनी होगी। आनंद के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के लिए हमें ही पहल करनी होगी।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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