आज का चिंतन -01/08/2013

  • 2013-08-01 11:21:08.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

मूर्दों से कम नहीं हैं


टाईमपास करने वाले


- डॉ. दीपक आचार्य


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हर तरफ ऎसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो पूछने पर अक्सर यह कहते सुने जाते हैं - कुछ नहीं यार,  जैसे-तैसे टाईमपास कर रहे हैं। टाईम पास ही नहीं होता, बोर होते हैं। कैसे टाईमपास करें, कहाँ जाएं.... यहाँ कुछ ऎसा है ही नहीं कि टाईमपास हो सके। दिन निकाल रहे हैं, क्या करें।

यानि की ऎसे लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके लिए समय गुजारना भारी पड़ रहा है और एक-एक क्षण के लिए भी पूरी जिंदगी बोझ की तरह महसूस होने लगी है।  फिर ऎसे लोग ताश खेलने, मोबाइल पर गाने सुनने और गैम्स खेलने, मजमा जमाकर कहीं बैठकर घण्टों बतियाने, गप्पे हाँकने, किसी न किसी के वहाँ जाकर समय बिताने से लेकर फालतू के निरर्थक और उपलब्धिहीन कर्मों में जुट जाते हैं, और कुछ नहीं तो दूसरों के बारे में सोचने और निंदा करने में ही दिन-रात गँवाते रहते हैं।

इन लोगों को लगता है कि जैसे समय पहाड़ की तरह सामने है और उनके लिए संसार या अपने जीवन का कोई कर्म शेष है ही नहीं रह गया है, व्यक्तित्व और परिवेशीय कत्र्तव्य कर्मों को पूरी तरह निभा लिया है और अब बस कुछ करने की जरूरत है ही नहीं।

ऎसे लोगों को अपनी ही किस्म के टाईमपास लोग हर स्थान पर बिना ढूँढ़े मिल भी जाते हैं। यही कारण है कि यदि सर्वे किया जाए तो हर इलाके में बीस से तीस फीसदी ऎसे लोग निश्चित तौर पर होते ही हैं जो टाईम गुजारने के लिए सदैव आतुर रहते हैं और समय को कैसे गँवाया जाए, इसके सारे हुनरों में माहिर होते हैं।

आम तौर पर मनुष्य की औसत आयु एक सौ वर्ष हुआ करती थी लेकिन हाल के वर्षों में कलियुग के तमाम प्रभावों से मानवीय ऊर्जाओं और सामथ्र्य का इतना क्षरण हो चला है कि अब साठ-सत्तर पार जाना भी मुश्किल हो गया है और इतनी आयु तक पहुंचते-पहुचंते लोग अपने धाम सिधार जाते हैं। इतनी छोटी सी आयु में ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम के फर्ज पूरे निभ ही नहीं पाते।

कुछ बिरलों को छोड़ दिया जाए तो सारे के सारे लोग ऎसे हैं जिनके लिए अब गृहस्थाश्रम ही एकमेव जीवन लक्ष्य होकर रह गया है, बाकी सारे आश्रमों का न उन्हें पता है, न पड़ी है। यहाँ तक कि विद्यार्थियों के लिए ब्रह्मचर्याश्रम के कायदों और अनुशासन को पालना जरूरी है लेकिन इस आयु वर्ग के लोग भी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान नहीं देकर गृहस्थाश्रम के भोग-विलासी संसाधनों की ओर आकर्षित होकर अपनी आयु और समय जाया करने लगे हैं।

टाईमपास का भूत हर आयु वर्ग के लोगों को लील रहा है। विद्यार्थियों में भी टाईमपास की ऎसी घातक प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि उन्हें न घर में आनंद आता है, न स्कूल में। ऎसे में दोस्तों के साथ बाहर घूमने, बेवजह कहीं भी स्थान निर्धारित कर गलियों, चौराहों, उद्यानो, सर्कलों आदि पर जमा होकर घण्टों गपियाने, फेसबुक चलाने या कि गाने सुनने और गैम्स खेलने की आदतें घेर चुकी हैं।

शैशव और किशोरावस्था में इन गंदी आदतों का शिकार हो जाने वाले बच्चे जिन्दगी के किसी भी लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाते हैं और माता-पिता तथा स्वयं की जिन्दगी के लिए बोझ ही बने रहते हैं। लक्ष्यहीनता से घिरी ऎसी पीढ़ी समाज और देश को निराश करती है।

जहाँ कहीं जो लोग टाईमपास की बात कहने और टाईमपास करने वाले मिलें, इन्हें देख कर यकीन मान लीजिये कि ये  सारे के सारे समाज और देश पर भार हैं तथा ये न होते तो देश व समुदाय की कई सारी समस्याओं का समाधान हो जाता क्योंकि इनके न होने पर जो लोग हमारे सामने होते, कम से कम वे तो समाज और देश के लिए उपयोगी जरूर होते।

जो टाईमपास करने में रमे हुए लोग हैं, जिनके लिए टाईम पास नहीं होने की समस्या हमेशा बनी रहती है, जिन्हें टाईमपास करने के लिए फिजूल के कामों की आवश्यकता होती है वे सारे के सारे लोग मूर्दों से कम नहीं हैं जिनकी समाज और देश के लिए कोई उपयोगिता नहीं है।

धरती पर जन्म लेने के बाद सेवा, परोपकार, जन कल्याण तथा कर्मयोग की अपार अनंत संभावनाओं के बीच यदि कोई टाईमपास नहीं हो पाने की बात करता है, तो यह साफ माना जाना चाहिए कि ऎसे लोगों ने यह अंतिम सत्य स्वीकार कर ही लिया है कि अब धरती पर उनकी आवश्यकता नहीं है तथा जितने दिनों तक प्राण बचे हैं उन्हें जैसे-तैसे पूरे कर वापस लौटने के लिए बेचैन हैं।  इन टाईमपासर लोगों की वजह से समाज और राष्ट्र कमजोर हो रहा है। ईश्वर करे ऎसे लोगों का निर्णायक टाईम पास जल्दी हो जाए और नए अच्छे लोग भेजे जो देश के काम आ सकें।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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