आज का चिंतन-26/07/2013

  • 2013-07-26 01:02:11.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

jalan वालों से पाएं
जीवन निर्माण की रोशनी

- डॉ. दीपक आचार्य
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इस दुनिया में सभी प्रकार के लोगों का वजूद बना हुआ है। इनमें जलने वालों और जलाने वालों की सं या खूब ज्यादा है। जलने और जलाने वालों की तादाद सभी इलाकों की ही तरह हमारे क्षेत्रों में भी खूब है।
जलने वालों लोग हर आयु वर्ग के और हर बौद्धिक स्तर हो सकते हैं। पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवियों से लेकर अनपढ़ लोगों तक में जलने और जलाने के मौलिक गुण न्यूनाधिक रूप में विद्यमान हैं।
दुनिया में बिरले लोग ऐसे होंगे जो न जलते हैं, न जलाते हैं। ऐसे लोग या तो ईश्वर के करीब हैं या फिर उस किसम के हैं जिनमें सोचने-समझने और कुछ करने की क्षमता या जन्मजात प्रतिभा नहीं हुआ करती है।
जलने वाले लोग सभी स्थानों पर विद्यमान हैं और इन लोगों को बिना जले या जले पर नमक छिड़के बिना न अच्छा लगता है और न ही आनंद की अनुभूति। ये लोग जीवन में जहां कहीं मौका मिलता है वहाँ जलना आरंभ कर देते हैं।
जो जलने वाले लोग हैं उनके बारे में यह स्पष्ट माना जाना चाहिए कि ये लोग अपने परंपरागत हुनर और सहजात प्रतिभाओं का इस्तेमाल किए बगैर चुप नहीं रह सकते हैं और इनका हुनर समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में गाहे-बगाहे झरता ही रहता है।
अपने जीवन में ऐसे खूब लोग सामने आते रहते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये लोग औरों पर जलते ही रहते हैं। कुछ लोग इनकी वजह से जले भुने रहते हैं और कुछ इनकी हरकतों से अपने आपको इतना जला हुआ महससू करने लग जाते हैं कि उनकी शक्ल पर कोयले सी मलीनता छा जाया करती है।
इन सभी प्रकार के जलाऊ-भुनाऊ और जलने-जलाने वालों की भीड़ में खुद को इनसे बचाये रखने का सबसे कारगर तरीका यही है कि जलने और जलाने वालों की ऊर्जा को सौर या पवन ऊर्जा के स्रोत की तरह लें और इनका पूरा-पूरा उपयोग अपने जीवन के लिए ऊर्जा संग्रहण में करें ताकि इनकी ऊर्जाओं से हमारे जीवन को उष्मा का अहसास प्राप्त हो सके।
यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार इन लोगों की मूर्खताओं और हमारे प्रति जलने-भुनने की भावनाओं को भुना पाते हैं। जो लोग हमसे जलने वाले होते हैं उनके प्रति हम सकारात्मक सोच के साथ काम करने लग जाएं तो हमें अच्छी तरह पता लग जाएगा कि ये लोग हमारे कितने काम के हैं और हमारी जरा सी चतुराई हमारे लिए बहुत बढ़िया प्रचारकों की फौज तैयार कर सकती है।
हमें न विज्ञापनों का सहारा लेना होगा, न मीडिया का। ऐसे जलने वाले लोगों का अपना तगड़ा प्रचार तंत्र होता है जो अफवाहों से भी बढ़कर है और इन लोगों का नेटवर्क तेजी से बढ़ता और फैलता हुआ दोनों हैं।
हमारे आस-पास तथा चारों तरफ चाट-पकौड़ी वाली मानसिकता के लोगों का खूब बोलबाला है और इन लोगों को हमेशा चरपरी खबरों और अफवाहों की ही जरूरत होती है। फिर तिस पर ये लोग जलने वाले और जलाने वाली किस्म के हों तबकि बात ही कुछ और है।जो हमसे जलते हैं या जलने वालों की जमात में शामिल हैं उन लोगों की गतिविधियों को हमारे लिए जीवन-उष्मा के रूप में लें और यह मानें कि ये ही वे लोग हैं जिनके जलने की वजह से हमारा फायदा हो रहा है।
जल ये रहे हैं और प्रकाशित हम हो रहे हैं। हमारे व्यक्तित्व के दीपक को प्रकाशित करने के लिए इन बातियों और ईंधन का होना जरूरी है। इसलिए जो जल रहे हैं उन्हें जलने दें ताकि हम आलोकित होते रहें।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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