आज का चिंतन-25/07/2013

  • 2013-07-25 00:41:53.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

सोशल साइट्स का इस्तेमाल करें


समय का मोल पहचानते हुए


- डॉ. दीपक आचार्यsocial
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संचार क्रांति में उफान के चलते पिछले कुछ समय से सोशल नेटवर्किंग साइट्स का प्रचलन तेजी से अपने घरों से लेकर मन के कोनों तक में जगह बनाता जा रहा है। पहले मोबाइल आ गए और अब इंटरनेट के जरिये ये साइट्स।मनुष्य और मनुष्य तथा मनुष्य एवं क्षेत्रों के बीच की भौगोलिक दूरियाँ समाप्त हो चली हैं और लोग भले ही मन और आत्मा से एक-दूसरे के करीब हों या न हों, सोशल नेटवर्किंग साईटों के माध्यम से करीब होने का अहसास जरूर कर रहे हैं। कहीं यह भ्रम है, कहीं छलावा और कहीं-कहीं यथार्थ हो सकता है। पर इतना जरूर है कि ज्ञान के महासागर का जबरदस्त विस्फोट हुआ है, जाने  कितनी जरूरी सामग्री और ज्ञान की ज्वालामुखियां अभिनव कल्पनाओं से लेकर मानसिक तरंगों का लावा उगलने लगी हैं।

चाहे-अनचाहे हमारे जीवन से लेकर जगत तक की सारी बातों से भारी-भरकम होते जा रहे बादल फट रहे हैं और लगता है जैसे सूचनाओं का यह दरिया हमें निहाल कर देने ही वाला है। फिर असंख्य वैब साइट्स, सोशल नेटवर्किंग साइट्स और जाने कितनी प्रकार की वैब हलचलों ने जनजीवन के साथ ही हमारी निजी जिन्दगी को भी हिला कर रख दिया है।बहुत बड़ी संख्या इनका इस्तेमाल टाईमपास के लिए कर रही है, काफी सारे लोग ज्ञानार्जन और उपदेशों की बरसात के लिए, तो हजारों-लाखों लोग मनोरंजन के लिए इनका प्रयोग करने लगे है। इसके साथ ही मौका परस्त और आपराधिक प्रजातियां भी अब मुँह निकालने लगी हैं।खूब सारे लोग ऎसे हैं जो सोशल साईट्स का प्रयोग कर रहे हैं, और उसी अनुपात में अनसोशल भी होते जा रहे हैं। एक छोटे या बड़े डिब्बे के आगे बैठकर घर-परिवार और समाज तथा देश के दायित्वों को उपेक्षित करने या कि भूल जाने वाले लोग भी अब खूब होते जा रहे हैं।

सोशल नेटवर्किंग का उपयोग ज्ञानार्जन और उपयोगी सूचनाओं की प्राप्ति अथवा अपने व्यक्तित्व निर्माण के साथ ही खुद को सदैव अपडेट रहने के लिए हो तो अच्छी बात है लेकिन आजकल इन साईटों का उपयोग टाईमपास और ऎसी गतिविधियों के लिए हो रहा है जो हमारे सुन्दर, स्वस्थ और शुभ्र जीवन के लिए उपयुक्त नहीं कही जा सकती।अपने जीवन में फुरसत के क्षणों में इनका उपयोग हो, तभी तक ये ठीक है वरना जीवन के दूसरे कार्यों व लोक व्यवहार, सामाजिक एवं पारिवारिक दायित्वों की पूत्रि्त, अध्ययन-अध्यापन, व्यवसाय और नौकरी-धंधों के लिए निर्धारित समय में इनका प्रयोग सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए आत्मघाती है और इनसे बचने की जरूरत है।

जो सामग्री या दृश्य भड़काऊ, आकर्षक तथा क्षणिक मनोरंजनप्रधान होते हैं उनकी आयु भी ज्यादा नहीं हुआ करती लेकिन ये दूसरे कामों और अपने जीवन की मूल्यवान आयु का हरण कर लेते हैं जिसका पछतावा हमें जीवन के उत्तराद्र्ध में उन क्षणों में होता है जब हम कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं होते हैं। इस समय हमारी भूमिका कुछ करने की बजाय मूक-बधिर और विवश होकर सिर्फ सोचने और देखने भर की ही होती है।मनोरंजन प्रधान जो भी कर्म या व्यक्ति हमारी दैनिक जीवनचर्या में बाधक बनते हैं अथवा हमारा समय चुराते हैं उन्हें बिना देरी किए त्यागने में ही भला है और ऎसा करने पर ही हम सामान्य जिन्दगी का आनंद प्राप्त कर सकते हैं वरना जीवन असामान्य होने लगता है और इसका सीधा असर हमारी मानसिकता और शारीरिक संरचना पर प्रकट हो ही जाता है।इन साईट्स पर किसम-किसम के लोग हैं। एक प्रजाति ऎसी है जो कि दूसरों की पोस्ट को चुरा कर खुद के नाम से पोस्ट कर स्वयं को महाबुद्धिमान और ज्ञानी मान बैठती है।  ऎसे चतुर चोरों की निजी जिन्दगी भी पराये माल उड़ाने वाली मनःस्थिति वाली ही होती है।बहुत बड़ी संख्या में लोग लाईट, कमेंट और शेयर में ही रमे रहते हैं। ये लोग अपनी ओर से कुछ नहीं लिखते। इसी प्रकार की एक प्रजाति ऎसी है जो सोशल साइट्स पर अपनी ओर से कुछ नहीं करती बल्कि दूसरों की पोस्ट सिर्फ पढ़ती और दूसरों पर निगाह रखती है।

कुछ लोग इन पर हमेशा उपदेशकों की भूमिका में होते हैं। एक ऎसी प्रजाति भी अब फेसबुक तथा अन्य साईट्स पर है जो खुद कुछ नहीं करती लेकिन धर्म और चमत्कारों के नाम पर लोगों को भ्रमित करते हुए लाईक, कमेंट और शेयर करने के दुराग्रह से बाज नहीं आती।  इन मूर्खों को कौन समझाए कि किसी देवी-देवता, संत-साईं, स्थल या चमत्कारिक स्थल आदि की सामग्री को लाईक, शेयर या कमेंट करने से ही कोई महान चमत्कार हो जाता तो आज भारत का कोई भी आदमी समस्याग्रस्त नहीं होता क्योंकि अपने देश में सोशल साइट्स पर बने रहना स्टेटस सिंबोल हो गया है जहाँ लुच्चे-लफंगों, भिखारियों और आम आदमी से लेकर वे सारे लोग हैं जो महान, बुद्धिजीवी और प्रतिष्ठित कहे जाते हैं।  एक ऎसी प्रजाति वालों की तादाद भी खूब है जो गुडमॉर्निंग और गुड़ नाईट में ही रमी हुई है। हमारी तरह लाखों लोग हैं जो रोजाना फेसबुक और दूसरे वैब माध्यमों पर दिन-रात भिड़े रहते हैं। अपने जीवन में कुछ भी करें, पर ऎसा कुछ नहीं करें जिसमें बहुमूल्य समय जाया होता है। क्योंकि जो समय चला जाता है उसे न फेसबुक लौटा सकती है और न ही अपनी लाईफ बुक।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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