आज का चिंतन-21/07/2013

  • 2013-07-21 01:11:21.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

नासमझों और शत्रुओं से पाएं


आगे बढ़ने की ऊर्जा


energyडॉ. दीपक आचार्य
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आम तौर पर सभी तरह के लोग नासमझों, मूर्खों, आधे या आंशिक मूर्खों और शत्रुओं से खौफ खाते हैं और अक्सर उन लोगों को बुरा-भला कहते हैं जो हमें अपना शत्रु मानते हैं या फिर आधे अथवा पूर्ण विक्षिप्त हैं या आंशिक तौर पर।आज के युग में ऎसे लोगों की तादाद खूब बढ़ती जा रही है जिन्हें अपने जीवन या व्यक्तित्व की तो सुध नहीं  है और दूसरे लोगों के भाग्य को बाँचने और सँवारने का दम भरते हैं। मूर्ख और अज्ञानियों की परंपरा में इस किस्म के आधुनिक भाग्य विधाताओं का आजकल खूब बोलबाला है।ये लोग अपने आपको विधाता की तरह मानने लगे हैं और इन्हें लगता है कि विधाता ने छठी के लेख लिखने के लिए उन्हें ही अधिकृत किया हुआ है। ऎसे स्वयंभू भाग्यविधाताओं की कई सारी किस्में आजकल हमारे अपने क्षेत्र की ही तरह कई स्थानों पर पसरी हुई कमा खा रही हैं और जाने कितने और कैसे-कैसे जतन करते हुए अपना वजूद बनाए हुए हैं।दुनिया में शायद ही कोई ऎसा होगा जिसका कोई शत्रु न हो अथवा जिसे कोई और शत्रु नहीं मानते हों। बात फिर चाहे पशु-पक्षियों और इंसानों की हो या फिर इंसानों से अपने आपको ऊपर मानने वाले आदमियों की। हर कोई शत्रुओं से घिरा हुआ है। कोई भले ही किसी और को शत्रु न मानें तब भी क्या, उसे अपना शत्रु मान लेने और बना लेने वालों की रेवड़ें कोई कम थोड़े ही हैं।इनमें कई सारे लोगों का किसी से कोई संबंध हो या न हो मगर उनके शत्रु बन ही जाते हैं। कुछ लोग सामने होकर शत्रुता करते हैं जबकि काफी सारे शिखण्डियों की तरह व्यवहार करते हुए, और कई सारे अपने तात्कालिक स्वार्थों को पूरा करने भर को।आदमियों की बहुत बड़ी संख्या आजकल ऎसी भी है जिनका जन्म ही लोगों को शत्रु मानने और शत्रुता पूरी करने के लिए हुआ है और ये लोग मरते दम तक अपने शत्रुता भरे हुनरों का इस्तेमाल करते रहते हैं। यह हुनर उनकी समाप्ति के साथ ही खाक हो पाता है।कुछ लोग बिना किसी बात के भ्रमों व अहंकारों से भरे होकर शत्रुता का व्यवहार करना आरंभ कर देते हैं, ढेरों ऎसे होते हैं जो स्वार्थ के मारे पशुता से भी नीचे गिर जाते हैं और आसुरी जीवन में रम जाते हैं, कुछ लोग प्रतिस्पर्धा अपना कर, तो कई सारे ऎसे भी हुआ करते हैं जो औरों के कहने पर कठपुतलियों और रोबोट की तरह चलकर शत्रुता को आकार एवं अंजाम देते चलते हैं।बहरहाल चाहे किसी भी किस्म के शत्रु हों, इनकी ऊर्जाओं और क्षमताओं का इस्तेमाल हम अपने हक़ में करना सीख जाएं तो हमारे व्यक्तित्व को चार चाँद लग सकते हैं। इसमें हमें कुछ भी परिश्रम नहीं करना है बल्कि तथाकथित शत्रुओं की हरकतों से सीख लेते हुए अपने आपको शुचितापूर्ण बनाये रखते हुए व्यक्तित्व निर्माण की सारी कसौटियों पर खरा उतरने के लिए सतर्क रहने भर की जरूरत है।
ये शत्रु हमें लगातार हमारे बारे में टिप्पणियां करते हुए हमारे प्रचार तंत्र का वह हिस्सा होते हैं जिनमें हमें अपनी पब्लिसिटी के लिए ढेला भर भी खर्च नहीं करना पड़ता है और इन नासमझों और मूर्खों की ही ऊर्जाओं और क्षमताओं का पूरा-पूरा लाभ हमें बिना परिश्रम के मिलता रहता है।कोई हमारे लिए बेगार करे और उसका फायदा हमें मिलने लगे तो इसमें बुराई क्या है। फिर ये लोग हमारी हर गतिविधि का पग-पग पर ध्यान रखते हैं जिनसे हमें हर गलती को तत्काल सुधारने का मौका मिलता रहता है और इस प्रकार इस प्रजाति के इसी निंदकीय एवं आलोचनात्मक हुनर का हमें लाभ तत्काल मिलना भी शुरू हो जाता है।इस किस्म के पालतू य फालतू लोग न होते तो शायद हम कई सारे अपने कामों को पूरी गुणवत्ता और पारदर्शिता नहीं दे पाते  और ऎसे में हमारे कर्मयोग में कहीं न कहीं कोई कमी रह जाती, जिसका हमें जिन्दगी भर मलाल रह सकता है।इन लोगों के इस बुरे और नकारात्मक व्यवहार में भी सकारात्मक मधुकणों का चयन करें और लाभ लें। इस पूरे कचरे के प्रति चिंतित कभी न हों, बल्कि कचरे में जो काम की बातें हैं उन्हें खुद चुन लें अथवा किसी से चुनवा लें। इस सडांध भरे कचरे का जो हश्र होना है वह तो होगा ही। आज नहीं तो कल।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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