आज का चिंतन-05/07/2013

  • 2013-07-05 01:11:14.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

बेवजह बकवास न करें


औरों के समय का ख्याल रखें


डॉ. दीपक आचार्य
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हमारे आस-पास मनुष्यों की कई सारी प्रजातियाँ हैं जिनकी कार्यशैली, व्यवहार और जीवनचर्या अलग ही रंग-ढंग लिये हुए होती है। इन सभी के जीने के अपने अलग-अलग अंदाज हैं और इन अंदाजों के साथ ही जुड़ी हुई हैं इनकी कई सारी अच्छी-बुरी आदतें और सनक।आदमियों की सभी प्रकार की किस्मों में एक किस्म उन आदमियों की है जो जहाँ कहीं मौका मिलता है वहाँ बेवजह बोलना शुरू कर देते हैं और नॉन स्टा्प बोलते चले जाते हैं। इन लोगों को सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि वे अपने महकमे और क्षेत्र से लेकर दुनिया भर में एकमात्र एवं अन्यतम विद्वान हैं और उनकी विद्वत्ता के आगे दूसरे सारे लोग बौने हैं।ऎसे लोगों के लिए अपने अहंकार पूर्ण तथा तथाकथित विद्वत्तापूर्ण व्यक्तित्व का भ्रम आवरण और आभामण्डल इतना ज्यादा पसरा हुआ होता है कि वे स्वयंभू की तरह व्यवहार करने लगते हैं। ऎसे लोगों की हर तरफ भरमार है, कहीं कोई कमी नहीं है।हमारे इलाके में भी ऎसे खूब लोग हैं जो बेवजह बोलने और बकवास करने के आदी हैं और इन लोगों की वजह से सज्जनों और समय का महत्त्व पहचानने वाले लोगों को काफी दिक्कतें आती हैं तथा इन्हीं की वजह से लोगों का अमूल्य समय बिना किसी ठोस वजह से नष्ट होता है।

ऎसे लोग साठ साला बाड़ों से लेकर पांच साला बाड़ों और सभी प्रकार के काम-धंधों में सभी स्थानों पर पसरे हुए हैं। कुछ लोग सिर्फ संभागी के रूप में बुलाये जाते हैं या संभागी के तौर पर ही विभिन्न प्रकार की बैठकों और आयोजनों में हिस्सा लेते हैं लेकिन अपनी मर्यादाओं को भूलकर वे बात-बात में हस्तक्षेप करने लगते हैं और अपनी विद्वत्ता झाड़ने लगते हैं।ऎसे में मुख्य वक्ताओं या विशिष्टजनों को भले ही अपनी उपनी उपेक्षा का अहसास न हो मगर दूसरे संभागियों को इसका बुरा जरूर लगता है क्योंकि ऎसे बकवानी और बातूनी लोगों की वजह से ही बैठकों और समारोहों का समय लम्बा खींचने लगता है और लोग बोर होते रहते हैं।

दूसरे श्रोता संभागी इन बातुनियों की बातों को सुनते रहने के लिए विवश हो जाते हैं लेकिन इनके पदों, अहंकार और मर्यादाओं की वजह से कुछ कह नहीं पाते। सिर्फ मन ही मन गालियां बकते रहते हैं और कुढ़ते रहते हैं।यह जरूरी नहीं कि बकवास करने वाले और बेवजह बोलते रहकर लोगों का समय चुराने वाले, आयोजनों का वक्त लम्बा खींचने वाले लोग सामान्य ही हों। ऎसे लोग बड़े और प्रभावशाली पदों पर भी हो सकते हैं और कितने ही बड़े व्यवसायी भी, अपराधी भी हो सकते हैं और किसी भी किस्म के।

आजकल ऎसे लोगों की सभी स्थानों पर बहार आयी हुई है जो ढपोड़शंखों सा बर्ताव करने में सिद्ध हो गए हैं और जहाँ इन्हें मौका मिलता है वे अपने शब्दों की बौछार शुरू कर दिया करते हैं। हमारे यहाँ भी ऎसे कई महारथी हैं जो चाहे जो कार्यक्रम हो, बैठकें हों या मुलाकातें हों, फालतू की बकवास करते रहते हैं जिसका कोई अर्थ नहीं हुआ करता।जो लोग बिना किसी बात के बोलते हैं और बेवजह बोल कर लोगों का समय जाया करते हैं, बैैठकों और आयोजनों को बिना किसी कारण से लम्बा खींचते हैं उन लोगों का समाज व देश का शत्रु माना जाना चाहिए क्योंकि ये लोग समाज की उस शक्ति को बिना किसी कारण के बाँधे रखते हैं जो समाज के लिए उपयोग हो सकती है।

बिना किसी कारण से सिर्फ और सिर्फ अपनी शेखी बघारने के लिए लोगों का समय खराब करने वाले लोग समाज के उत्थान और कर्मयोग में काम आने वाली रचनात्मक ऊर्जाओं का प्रवाह रोक लेते हैं और इस प्रकार की छोटी-छोटी समय की बर्बादी को जोड़ कर देखा जाए तो यह समाज और देश के लिए कितनी नुकसानप्रद होती है इसका अनुमान लगाने के प्रति हम भले ही गंभीर न रहें लेकिन यह अपने आपमें राष्ट्रीय ऊर्जा की बर्बादी से कम नहीं है।जो लोग जिस किसी क्षेत्र में हैं उन्हें चाहिए कि अपने व्यक्तित्व में गंभीरता लाएं और बिना किसी वजह से बोलने की आदत से बाज आएं और लोगों के समय की रक्षा करें। समझदारों को इशारा ही काफी है बस ....।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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