हमें अपने रणबांकुरों पर गर्व है

  • 2013-07-04 16:04:44.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

उत्तराखण्ड के केदारनाथ तीर्थधाम पर आयी जल प्रलय सचमुच कई सवाल छोड़ गयी है-जैसे कि क्या यह आपदा मानवीय थी या प्राकृतिक थी? और इस आपदा से निपटने में धर्मस्थलों पर धर्म कितना काम आया? या किसने अपना कितना धर्म निभाया, इत्यादि। मानव प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करता-करता अहंकारी और दम्भी हो गया है। इसने चांद पर पैर रखते ही ये मान लिया कि तू तो अब बहुत बड़ा हो गया है ये हिमालय जैसी पर्वत श्रंखलाएं तेरे सामने क्या मूल्य रखती हैं? इसलिए बड़ी बेफिक्री से पूरे उत्तराखण्ड और हिमालयी क्षेेत्रों में छोटे बड़े तीन सौ बांध इस मानव ने बनाए हैं, और इन बांधों को न बांधने संबंधी विशेषज्ञों की सारी रिपोर्ट्स को बुरी तरह सरकार ने नजरअंदाज कर दिया। पेड़ों को काटने के लिए सरकारी और गैर सरकारी आरी चलती ही रही हालांकि लोगों ने 'चिपको आंदोलन' तक चला लिया, पर बात वही आयी कि----
आह भरने से नही सय्याद पर होता असर।flodd
टूटता पाषाण है पाषाण के आघात से।।
हिमालय और हिमालयी क्षेत्रों के विषय में हमारे देश के विशेषज्ञों का मानना रहा है कि हिमालय पर्वत अन्य पर्वतों की अपेक्षा अभी युवा है और अभी भी इसका विकास हो रहा है। हमारे भारतीय उपमहाद्वीप की धरती प्रतिवर्ष 5 सैंटीमीटर उत्तर की ओर खिसक रही है, इससे हिमालय की भौगोलिक संरचना में कुछ न कुछ हलचल होना स्वाभाविक है। तभी इस सारे विशाल क्षेत्र को भूकंपों के दृष्टिकोण से अति संवेदनशील माना जाता है। यदि कभी 8 रिएक्टर स्केल का भूकंप आ गया तो टिहरी बांध ही टूटकर पूरे उत्तर भारत में करोड़ों लोगों के लिए प्राण लेवा बन जाएगा। ऐसी चेतावनियां पूर्व में पहाड़ों पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव और घनत्व से चिंतित होकर विशेषज्ञों ने दी हैं, लेकिन हमारी सरकारों के लिए इन विशेषज्ञों की राय फाइलों के गट्ठरों में बांधकर दीमक के काम आने के लिए छोड़ दी जाती हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि इस देश में विशेषज्ञ तैयार करना या विशेषज्ञ तैयार होना दोनों ही मूर्खता हैं, क्योंकि जब 5वीं फेल मंत्री बने बैठे हों तो उनके सामने कोई विशेषज्ञ क्या बेचता है? प्रशासन ने केदारनाथ में स्थित संबंधित नदी के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण होने दिया। मंदाकिनी नदी यहां स्थित शिवमंदिर के पास आकर दो भागों में बंट जाती है। मंदिर दोनों ओर के बहाव के बीचोंबीच स्थित एक मजबूत चट्टान की ओट में है, इसीलिए इस बार आने वाली पानी की तेज बाढ़ भी इस चट्टान को हिला नही पायी, इसीलिए मंदिर बच गया। विशेषज्ञों का मत है कि पिछले 100 वर्षों में एक बार भी जिस क्षेत्र में किसी नदी की बाढ़ आयी हो तो उसे उस नदी का 'फ्लड-वे' कहा जाता है, यानि ऐसे 'फ्लड-वे' में भविष्य में भी बाढ़ आने का खतरा बना रहता है। इसलिए विशेषज्ञों ने सरकार को चेतावनी दी कि पिछले सौ वर्षों में एक बार भी किसी नदी में यदि बाढ़ आयी है तो जिन क्षेत्रों में ऐसी बाढ़ आयी है उसे 'फ्लड-वे' मानकर चिन्हित कर लिया जाए, तथा उस 'फ्लड-वे' में किसी प्रकार का अतिक्रमण न किया जाए। पर हमने चेतावनी भरी इस रिपोर्ट को दीमक के सामने उसका भोजन बनाकर डाल दिया और नदियों पर धड़ाधड़ अतिक्रमण होने लगा। हर नदी को तंग रास्ते से गुजरने के लिए बाध्य किया गया। मंदाकिनी भी इससे अछूती नही रही है। इसकी दो शाखाओं में एक ओर की सूखी धारा की शाखा को धर्मशालाओं, दुकानों व ऐसे ही अन्य प्रतिष्ठानों ने बुरी तरह अतिक्रमण का शिकार बना दिया। फलस्वरूप अब जब पानी आया तो वह दोनों शाखाओं में समान वेग से घुसा और अतिक्रमित धारा की ओर जब घुसा तो उस पर बने प्रतिष्ठान नदी की धारा के वेग को झेल नही पाए। क्योंकि वो अपेक्षाकृत कमजोर धरातल पर बने थे। इसलिए धड़ाधड़ गिर गये यानि प्रकृति ने अतिक्रमण को हटाने में मनुष्य की सहायता की, हालांकि हम एक भयावह दुर्घटना के साक्षी बने। यह भयावह त्रासदी हमें बहुत कुछ बता कर गयी है कि सावधान रहो, प्रकृति अपना हिसाब किताब अपने आप करने में सक्षम है, उसकी ओर मित्रता का हाथ ही बढ़ाना, अन्यथा अनर्थ हो जाएगा।
मनुष्य ने बहुत से ऐसे स्थानों पर हिमालय के साथ छेड़छाड़ की है और सड़कें आदि बनायी हैं, जहां इसकी चोटियां मिट्टी और पत्थर के मिश्रण से बनी हैं। ऐसे स्थल सचमुच बड़े ही कमजोर हैं और ये समय आने पर भारी भूकंप के झटकों को झेल नही पाएंगे। इसलिए सरकार के लिए विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार काम किया जाना आवश्यक है। इस सारे दुखद घटनाक्रम में मनुष्य की दानवता भी देखने को मिली। देश के विभिन्न स्थलों से यहां पहुंचे तीर्थयात्रियों को इस आपदा से ही दो चार होना नही पड़ा अपितु संकट से जूझते लोगों को साधुओं तक ने लूटना और महिलाओं के साथ अशोभनीय व्यवहार करना आरंभ कर दिया। यह निरी पाशविकता थी जो मनुष्य समाज के सिरमौर साधु वर्ग के सिर चढ़कर बोल रही थी। इससे गिरा हुआ मानवता का कोई स्वरूप नही हो सकता था कि मरे हुए लोगों की जेबों को साधु तलाशें और हाथ की अंगुली से, अंगूठी न निकलने पर मृतक की उस अंगुली को ही काट दें जिसमें अंगूठी पहन रखी थी। केदार नाथ के धर्मस्थल को अधर्म स्थल बना दिया गया जब महिलाओं की अस्मत लूटी गयी। निश्चित ही ऐसे कार्यों में लगे हुए लोग यमदूत थे। इन यमदूतों से थोड़ा छोटा काम उन स्थानीय लोगों ने किया जिन्होंने फंसे हुए यात्रियों को एक रूपये की चीज 20 रूपये में देनी या बेचनी आरंभ की और चांदी काटने के चक्कर में हिमालयी लोगों के पवित्र धर्म को ही भूल गये। जबकि राजनीति ने भी हर बार की तरह अपना घिनौना स्वरूप दिखाया और मृतकों की लाशों को गिनते गिनते ये उन्हें वोटों में कैसे परिवर्तित किया जाए, इसी गुणाभाग को लगती देखी गयी। एक पार्टी की अम्मा और देश को रिमोट से चला रही एक शक्तिशाली महिला इस अवसर पर भी सहायता सामग्री के ट्रकों को हरी झण्डी दिखाकर रवाना कर रही थी तो प्रदेश सरकार का मुखिया यह नही बता पाया कि हादसे में कितने लोग मर गये हैं? केन्द्रीय मंत्री तथा प्रांतीय मंत्री हवाई जहाजों को और हैलीकाप्टरों को अपनी मौज मस्ती के लिए प्रयोग करते देखे गये और उन्होंने अपनी करतूतों से बता दिया कि उनके और राजनीति के भीतर आम आदमी के प्रति कितनी सहानुभूति या संवेदनशीलता है? कुल मिलाकर निराशा का ही माहौल हाथ आता है। इस सारे दुखद घटनाकाण्ड में आर. एस.एस. जैसे स्वयं सेवी संगठनों के कार्यकर्ताओं का योगदान सराहनीय रहा है। लेकिन उनसे भी अधिक गौरवशाली, योगदान हमारे जांबाज सैनिकों का रहा है। जिन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर तथा अपने लगभग डेढ़ दर्जन साथियों का बलिनदान देकर भी अपने मिशन को जारी रखा और देश को बड़ी ही गौरवशाली भाषा में बता दिया कि जब तक हम जिंदा हैं तब तक देश का प्रत्येक नागरिक सुरक्षित है। हमें नाज है अपने ऐसे जांबाज रणबांकुरों पर जिन्होंने अत्यंत विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए अत्यंत दुर्गम स्थानों पर जाकर आपदा ग्रस्त लोगों की रक्षा की और उनके प्राण बचाए। सचमुच हमारे सैनिक इस देवभूमि उत्तराखण्ड पर देवदूत बनकर आए और 'यमदूतों' के पापों को अपने 'देवदूतपन' से काफी हद तक हल्का करने में सफल रहे। हर मां ने, हर बेटी ने और हर महिला ने अपने सैनिक भाईयों के हाथों से कहीं अपना लाल लिया तो कहीं आने वाले राखी के त्यौहार के लिए एक बहन ने अपना भाई लिया तो कहीं अपने सुहाग की रक्षा होते किसी महिला ने देखी। सबकी आंखों में रह रहकर खुशी के आंसू छलकते रहे और सारा देश उन आंसुओं को देख देखकर गर्व के आंसू बहाता रहा। सचमुच बड़े मार्मिक क्षण थे वे जब ये देवदूत सागर मंथन कर रहे थे और बार बार नीचे गोते लगा, लगाकर एक से बढ़िया एक मोती कभी किसी मां को, कभी किसी बहन को और कभी किसी पत्नी को लाकर दे रहे थे। हमें गर्व है अपने ऐसे रणबांकुरे वीर सैनिकों पर। अपने शहीद सैनिकों को विनम्र श्रद्घांजलि, भावांजलि और पुष्पांजलि देते हुए भी हमें गर्व हो रहा है, प्रभु उन सभी दिवंगत देवदूतों को सदगति और शांति दे।

देवेंद्र सिंह आर्य ( 262 )

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