आज का चिंतन-14/06/2013

  • 2013-06-14 01:29:58.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

प्रेमपूर्वक उपेक्षित ही रखें
मूर्खों और नासमझों को
डॉ. दीपक आचार्य
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हमारी दैनंदिन जिन्दगी में कई सारे मौके ऎसे आते हैं जब नासमझों और मूर्खों से पाला पड़ता है। हमारे संपर्क में आने वाले लोगों में यदि समझदार हों तो उनसे चर्चा करना और उन्हें समझाना ज्यादा आसान होता है लेकिन खूब सारे लोग ऎसे होते हैं जो होते तो मूर्ख और नासमझ हैं, मगर अपने आपको सबसे बड़ा समझदार दिखाते हैं और अहंकार में फूलकर कुप्पा इतने हो जाते हैं कि ये इस सत्य को स्वीकार ही नहीं कर पाते कि वे अपने को जैसा दिखा रहे हैं, समझ रहे हैं, असल में वे वैसे हैं नहीं बल्कि उन्हें नासमझ और मूर्ख की श्रेणी में रखा जाना ज्यादा अच्छा होगा।यह जरूरी नहीं कि एक समझदार आदमी पढ़ा-लिखा हो ही, आमतौर पर कम पढ़ा-लिखा आदमी ज्यादा समझदार, विनम्र और व्यवहारकुशल होता है तथा उसे हर अच्छी बात सहजतापूर्वक समझ में आ जाती है।दूसरी ओर कई पढ़े-लिखे और अपने आपको समझदार मानने वाले सामान्य लोगों जितनी समझदारी भी नहीं रखते। कई पढ़े-लिखे ऎसे होते हैं जो कितनी ही शिक्षा पा लें मगर व्यवहार में उनकी शिक्षा-दीक्षा का विनय और समझदारी से कोई संबंध नहीं होता।अपराध करने वालों और कानून तोड़ने वालों से लेकर बेईमानी, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार तक करने वाले, शोषण करने वाले सारे के सारे वे ही हैं जो खूब शिक्षित कहे जाते हैं। शिक्षा में संस्कारों और मौलिक गुणधर्म का समावेश होने पर व्यक्ति की शिक्षा-दीक्षा समाज के लिए उपयोगी होती है और वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है लेकिन संस्कारहीनता से भरी शिक्षा मर्यादाओं के व्यतिक्रम का रास्ता खोल देती है और ऎसे में व्यक्ति का कर्म और व्यवहार समाज के लिए न उपयोगी रह पाता है न अनुकरणीय।ऎसी शिक्षा सिर्फ भौतिक विलासिता और अंग्रेजियत के साथ लाट साहबी का वरदान ही दे सकती है, जीवन निर्माण का सुनहरा पक्ष नहीं। इसी प्रकार उन लोगों का कर्म और व्यवहार भी स्वच्छन्दतावादी हो जाता है जो लोग प्रतिभाहीनता और योग्यताशून्यता के बावजूद ऎसे कामों में जुड़ जाते हैं जो समाज के लिए प्रभावी भूमिका में हुआ करते हैं।ऎसे लोगों से अनुशासन, मर्यादाओं और विनयी व्यवहार की उम्मीद करना व्यर्थ है बल्कि इनकी चाल और चलन से लेकर हर हाव-भाव तक में अहंकार का पुट इतना जबर्दस्त भरा होता है कि इन्हें देख हर कोई इनके नकारात्मक एवं अंधेरा पसंद परिवर्तन को महसूस करने लगता है।ऎसे लोग हर गलियारों में रहते और घूमते नज़र आते हैं। इन दिनों
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ऎसे लोगों की भीड़ हर कहीं छायी रहने लगी है जिनके बारे में लोग कहते हैं कि ऎसे-ऎसे लोगों की खेप सामने आ रही है कि ये क्या समाज का भला कर पाएंगे? हमारे संपर्क में भी ऎसे खूब लोग आते हैं।इस किस्म के लोगों की हरकतों पर टोका-टोकी या किसी भी प्रकार की टिप्पणी की बजाय इनकी प्रेमपूर्वक उपेक्षा का बर्ताव ही श्रेयस्कर होता है क्योंकि जरा सा भी प्रतिरोध करने पर इस किस्म के लोगों की भीड़ छा जाती है जो किसी भी सीमा तक हिंसक हो सकती है या कुछ भी कर गुजरते हैं क्योंकि नंगों और भूखों के लिए न कर्म की मर्यादा है, न व्यवहार का अनुशासन।

ऎसे लोगों से किसी भी प्रकार की मानवता की उम्मीद करना पूरी तरह बेमानी होगा। ऎसे मूर्खों और नासमझों को मनोरंजन से आगे न लें बल्कि यह मानकर चलें कि कोई जंगली या पालतु पशु हमारी गलियों या हमारे पास से गुजरा है।ऎसे लोगों से दुश्मनी मोल लेने का अर्थ हमारा समय और श्रम नष्ट करना है क्योंकि ऎसे लोगों का ध्येय ही यह होता है कि इनकी करतूतों पर कहीं न कहीं कोई प्रतिक्रिया जरूर हो। जहां प्रतिक्रिया हो जाती है वहाँ ये अपनी सफलता का झण्डा गाड़ देते हैं।ये ही वे लोग हैं जो समाज की सकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करते हैं, सामाजिक नवरचना में जुटे लोगों के लिए स्पीड़ब्रेकरों का काम करते हैं और मौके-बेमौके ऎसी कमीनी हरकत कर ही देते हैं जो समाज के लिए पिछड़ेपन के रास्ते खोल देती है। असल में ये ही लोग हैं जो समाज के वास्तविक शत्रु हैं।इस किस्म के लोगों से मित्रता का तो कोई सवाल ही नहीं उठता, बल्कि ऎसे लोगों से बेवजह दुश्मनी की बजाय दूर से ही नमो-नमो कर लें। इस किस्म के लोगों को यह भनक भी नहीं पड़नी चाहिए कि हम मन ही मन इन्हें दुर्जन या पशु मानकर चल रहे हैं और इस कारण ही ‘...प्रथमं वंदे’  कर रहे हैं। समझदारों से दुश्मनी भी भली, लेकिन नासमझों, कमीनों और विघ्नसंतोषियों का संपर्क तक बुरा है। इसलिए उन सभी लोगों को दूर से ही नमस्कार करते रहें जो आदमी तो हैं, मगर आदमियत से हीन हैं।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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