ताजा सोचें, मौलिकता लाएं, नया लिखें वरना बुद्घि कुण्ठित, सेहत खराब होगी

  • 2013-05-29 01:54:56.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

- डॉ. दीपक आचार्य
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हमारी कुल जनसं या में उन लोगों की सं या भी काफी है जो स्थापित और प्रतिष्ठित लेखक हैं, स्थापित होने के सफर पर हैं, नवोदित हैं और आगे बढ़ने की जद्दोजहद में रमे हुए हैं। इनमें स्वान्त: सुखाय भी हैं और परोपकारी तथा जगतोद्घारक भी हैं।
सम सामयिक परिस्थितियों, सामाजिक हालातों, विषमताओं, दर्द, समस्याओं से लेकर दुनिया जहान तक की बातों पर गंभीर चिंतन करने वाले मनीषी लेखक भी हैं। बिना कुछ लिए-दिए लिखने वाले भी हैं और वैसे भी हैं जो तभी कुछ लिखते हैं जब कहीं से कुछ मिल जाए।
कई नाम और प्रसिद्घि पाने के लिए लिख रहे हैं, कई पैसा बनाने और कमाने के लिए, तो कई समाज में वैचारिक क्रांति लाने के लिए लिख रहे हैं। कई तो वाकई लेखक हैं जिनका लिखा हुआ हर शब्द ब्रह्म वाक्य माना जाता है पढ़ने और सुनने वालों को भी आनंद आता है और विचारोत्तेजक अभिव्यक्ति का प्रवाह आम से लेकर खास आदमी तक को प्रभावित भी करता है।
जो अपने आप लिख रहे हैं, मौलिकता का ध्यान दे रहे हैं और अपेक्षा या निरपेक्षता के साथ लिख रहे हैं उनके सिवा लेखकों का एक बहुत बड़ा तबका हमारे सामने ऐसा आ रहा है जो मौलिक चिंतन और गहरी पैठ नहीं होने के बावजूद अपने आपको लेखक के रूप में स्थापित करने के लिए ऐसे सारे धंधों को अंजाम दे रहा है जिसमें न मौलिकता है, न सच्चाई और न ही किसी प्रकार की वास्तविकता।
फिर रही सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी है जहाँ नेट पर खूब सारी सामग्री का ऐसा अखूट भण्डार है जिसका जब चाहे उपयोग कर लो। न लेखक का नाम पता है, न सम सामयिकता और विषय सामग्री का याल। एक बार नेट पर आ गया तो फिर सालों साल यों ही चलता रहेगा। कई बार तो असामयिक लेख प्रकाशित हो जाते हैं और कई बार संदर्भ से कोई लेना-देना नहीं होता।
कई सारे माध्यमों में एक ही प्रकार की सामग्री स्वरूप बदल-बदल कर आने लगी है। कुछ स्वनामधन्य लेखक तो ऐसे हैं जो कि कतरनों पर ही जिन्दा हैं। अपने इलाके की कोई सामग्री हो या अपनी रुचि की कोई सामग्री। दिन-रात इनका एक ही काम रह गया है कतरनें काट-काट कर जमा करते रहना और समय की प्रतीक्षा करते रहना।
इस काम को इंटरनेट, वैब पोर्टल्स तथा ई-पेपर्स ने और अधिक आसान कर दिया है। कहीं कोई मूल लेखक या कॉपीराइट की झंझट नहीं। वो हर आदमी लेखक हो गया है जो इस सामग्री को अपना नाम दे डालता है। हाल के दो दशकों में ऐसे करामाती लेखकों की बहार आयी हुई है जिनमें न कोई लेखकीय मर्यादा है न कोई अनुशासन। सिर्फ एक ही लक्ष्य, एक ही ध्येय यही कि उनके नाम से छपे, चाहे वो सामग्री कहीं से चुरायी हुई या संकलित हो।
ऐसे लेखकों में बहुसं य समाचार माध्यमों से जुड़े हुए हैं। आम तौर पर देखा जाता है कि कई-कई प्रकार की सामग्री, कितने ही विषयों पर लेख आदि समय और नाम बदल-बदल कर आते रहते हैं। जो लोग दूसरों के लेखों या किसी भी प्रकार की सामग्री का संदर्भ नहीं देकर अपने नाम से उपयोग करते हैं अथवा कतरनों के भण्डार को खंगालते हुए चालाकियों के साथ लेखन को अपना लेते हैं ऐसे लोगों का लेखन निष्प्रभावी रहता है भले ही इनके आलेख और प्रकाशन क्षेत्र का विस्तार कितना ही क्यों न हों।
घिसी-पिटी सामग्री और विषयों पर उसी तर्ज पर लेखन, संप्रेषण और प्रकाशन करने वाले लेखकों का व्यक्तित्व कई मानसिक और शारीरिक हीनताओं से घिर जाता है। मौलिक, नवीन व ताजे चिंतन के अभाव में पुरानी ही पुरानी सामग्री को अपने नाम से परोसने वाले ये 'राईटर कैटरर्स' कुछ खास उपलब्धियां हासिल नहीं कर पाते। ऐसे लोगों की बुद्घि कुण्ठित हो जाती है और मानसिक तौर पर कचरा संग्रहण या चुरायी सामग्री के संकलन का मोह होने से इनके दिमाग में ताजे विचार और नए विषयों की सोच समाप्त हो जाया करती है।
इसलिए ये लोग चाहते हुए भी कभी कुछ नया नहीं लिख पाते हैं। नया लिखने की कोशिश भी करेंगे तो नवीनता नहीं ला पाते हैं। ऐसे ही लोगों में मीडिया से जुड़े लेखकों व संपादकों की एक और किस्म है जो किसी भी बढ़िया आलेख को उस समय प्रकाशित नहीं कर अपने यहां संग्रहित करते रहते हैं और उस समय की प्रतीक्षा करते हैं जब इसका लेखक या तो दिवंगत हो जाए अथवा कहीं दूर चला जाए। इसके बाद ये इन लेखों का उपयोग अपने नाम से करेंगे या बिना नाम से।
ऐसे अनुदार लोग आजकल हर कहीं पाए जाने लगे हैं। किसी के मौलिक सृजन के प्रति इस प्रकार की मानसिकता पाले हुए लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं क्योंकि लगातार इस सोच से संग्रहित की जाने वाली सामग्री इनके मस्तिष्क में शॉर्टकट के रूप में जगह घेरती जाती है और इस वजह से इनका मानसिक व शारीरिक संतुलन बिगड़ जाता है और वे परायी सामग्री के अनुपयोगी रह जाने की पीड़ा के साथ ही स्वर्ग सिधार जाते हैं।
जिन लोगों को अपना लेखन प्रभावी, धारदार एवं विचारोत्तेजक बनाने की इच्छा हो, उन्हें चाहिए कि वे ताजे विषयों पर चिंतन करें, मौलिक लेखन करें और दूसरों के विचार या लेख चुराने की मानसिकता को तिलांजलि दें तभी उनका लेखन तथा लेखक के रूप में व्यक्तित्व प्रतिष्ठा, आदर और स मान प्राप्त कर सकता है।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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