निजी सुरक्षा के नाम पर अर्थशक्ति का अपव्यय

  • 2013-04-03 03:26:53.0
  • राकेश कुमार आर्य

www.facebook.comugtabharatभारत के आधुनिक राजनेता जो किसी नरेश से कम नही है जब राजमहलों से बाहर निकलते हैं तो उनके मिजाज, नाज और साज सब अलग प्रकार के होते हैं।
गाडिय़ों का लंबा चौड़ा काफिला, पुलिस की व्यवस्था, सरकारी मशीनरी का भारी दुरूपयोग, निजी सुरक्षाकर्मी, कुछ गाडिय़ों में भरा हुआ मंत्रिमंडल (नित्य साथ रहने वाले चापलूसों की मंडली) आदि सब कुछ हमारे गणमान्यों को किसी राजा से कम नही रहने देते। उन्हें लगता है कि तुम तो ईश्वर के यहां से कुछ विशेष बनकर आये हों। यह 'कुछ विशेष' होने का भूत उन्हें सत्तामद के जाम पिलाने लगता है। इससे राजधर्म का विवेक लुप्त हो जाता है और एक विधायक सांसद या मंत्री का कब अपराधीकरण हो जाता है ये उसे भी ज्ञात नही हो पाता। अपराधीकरण के इस रूप में परिवर्तन के पश्चात इनका 'पाप बोध' इन्हें अपने सुरक्षाचक्र को और सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित करता है। आप देख सकते हैं हमारे उन जनप्रतिनिधियों को जो जनसेवा को आज भी व्रत के रूप में निभा रहे हैं। उन्हें किसी सुरक्षा की आवश्यकता नही होती। जो काले कारनामों से अपने परिवार और देश का नाम रोशन कर रहे हैं। उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता और इच्छा होती है। आज स्थिति यह हो गयी है कि जनता भी नेता उसी को मानने लगी है जिसके साथ कई गनर हों, सुरक्षाकर्मी हों, गाडिय़ों का पूरा काफिला हो। यह देखकर कभी कभी तो यह निर्णय करने में भी बुद्घि चकरा जाती है कि हम आज प्रजातंत्र में जी रहे हैं अथवा राजतंत्र के अधिनायकवादी काल में जी रहे हैं
?

उत्तर प्रदेश में अब शासकीय नियमों के अंतर्गत प्रत्येक विधायक और सांसद को दो सुरक्षाकर्मी उपलब्ध कराये जाते हैं। ये सुरक्षाकर्मी उत्तर प्रदेश में ही नही अपितु पूरे देश में ही हमारे विधायकों और सांसदों का 'स्टेटस सिम्बल' बन चुके हैं। नई सरकारें आती हैं और कई भूतपूर्व मंत्रियों, सांसदों अथवा विधायकों से उनके सुरक्षाकर्मी चाहकर भी वापस नही ले पातीं। इसका परिणाम यह हुआ है कि अकेले उत्तर प्रदेश में ही ऐसे सुरक्षाकर्मियों की संख्या 7500 से भी अधिक है, जिनका कार्य विशिष्ट जनों की प्राणरक्षा के अतिरिक्त और कुछ नही है। बताया जाता है कि इनमें से ढाई हजार से अधिक सुरक्षाकर्मी तो राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्री, सांसद या विधायकों को ही मिले हुए हैं। शेष अन्य लोगों को मिले हैं, जिनमें जिलों के जिलाधिकारी भी सम्मिलित हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में इन सुरक्षाकर्मियों के भत्ते के रूप में सरकार को हर वर्ष 40 करोड़ रूपये से अधिक का राजकोषीय व्यय वहन करना पड़ता है। वेतन इस व्यय से अलग है। सरकार एक सुरक्षाकर्मी को लगभग बीस हजार रूपये प्रदान कर रही है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कितना रूपया ऐसे सुरक्षाकर्मियों को वेतन देने पर व्यय हो जाता है? निश्चित रूप से यह संख्या एक वर्ष में लगभग डेढ़ दो अरब हो जाती है। फिर इसी प्रकार देश के अन्य प्रदेशों और केन्द्र सरकार के मंत्रियों सांसदों आदि पर इस राशि का अनुमान लगाएंगे तो जो आंकड़े सामने आएंगे वे आश्चर्य जनक होंगे। जिस देश में अरबों रूपया उस देश के गणमान्य जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर व्यय हो रहा हो और एक बहुत बड़ी जनसंख्या दो वक्त की रोटी के लिए तरस और तड़प रही हो उस देश का विकास कैसे संभव है? यह यक्ष प्रश्न है।
एक दो हजार की जनसंख्या वाले गांव के लिए एक योजना में एक अस्पताल एक प्राथमिक विद्यालय, एक पानी की टंकी, बिजली की व्यवस्था करने और अन्य विकास कार्य करने पर यदि एक करोड़ रूपया भी व्यय हो तो अकेले उत्तर प्रदेश में एक वर्ष के अंदर दो सौ गांवों का उद्घार तो मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के लिए मिले इस सुरक्षातंत्र को हटाने से ही उपलब्ध हो सकता है। पूरे पांच वर्ष में इनकी संख्या एक हजार गांव की होगी। जिस प्रदेश में एक योजना में एक हजार गांवों का कायाकल्प हो जाए, उसका विकास देश के लिए ही नही विश्व के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है। साथ ही इस विकास से कितने ही डॉक्टरों को, अध्यापकों को बिजलीकर्मियों को, उनके अधीनस्थ कर्मचारियों को तथा अन्य विभागों के कर्मियों को रोजगार के नये अवसर उपलब्ध होंगे। यह संख्या निश्चित रूप से हजारों में होगी। इस प्रकार सारी बातों पर यदि विचार किया जाए तो हमारे गणमान्य जनप्रतिनिधि हमारे विकास और रोजगार के अवसरों को छीनने वाले लोग ही बनकर रह गये हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारा और क्या होगा? इसी को रक्षक का भक्षक हो जाना कहा जाता है।
अब थोड़ा सा इन गणमान्य जनप्रतिनिधियों के सुरक्षा तंत्र के विषय में भी विचार कर लिया जाए। हमारे जनप्रतिनिधिों को कई प्रकार से वर्गीकृत किया गया है। जितना ऊंचा पद या हैसियत है उस व्यक्ति को उतनी ही ऊंची सुरक्षा उपलब्ध करायी जाती है। इस वर्गीकरण के आधार पर नेताओं को जो सुरक्षा उपलब्ध है उसमें पांच प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था सम्मिलित है। जो इस प्रकार है एक्स श्रेणी, वाई श्रेणी, जैड श्रेणी, जैड स्पेशल श्रेणी और व्यक्तिगत सुरक्षा।
एक्स श्रेण-इसमें दो सुरक्षाकर्मी (स्वचालित हथियारों से लैस) होते हैं।
वाई श्रेणी इसमें दो अत्याधुनिक हथियार बंद सुरक्षाकर्मियों के साथ साथ एक हैड कांस्टेबल और आधा दर्जन सिपाही प्रदान किये जाते हैं।
जैड श्रेणी-इस श्रेणी के लोगों को आधा दर्जन सशस्त्र सुरक्षाकर्मी मिलते हैं, साथ ही दो हैड कांस्टेबल तथा आठ सिपाहियों का दल मिलता है। जबकि सरकार की ओर से कार और पेट्रोल की व्यवस्था पूरे दस्ते के लिए अलग से उपलब्ध होती है।
जैड स्पेशल श्रेणी-इसमें हमारे गणमान्यों के लिए हर समय आधा दर्जन कमांडो सुरक्षाकर्मी होते हैं, जिनकी ड्यूटी में हर आठ घंटे में परिवर्तन हो जाता है। कई दरोगा और एक इंसपेक्टर, कई सिपाही व एक उपाधीक्षक स्तर का अधिकारी भी उपलब्ध होता है। व्यक्तिगत सुरक्षा-कुछ हल्के स्तर की होती है। यह सुरक्षा सामान्यत: किसी दल विशेष के पहुंच वाले भूमाफिया घोटालेबाज या पार्टी पदाधिकारी तक को भी उपलब्ध हो जाती है। जिला स्तर पर जिलाधिकारी एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के द्वारा भी यह सुरक्षा मिल जाती है।
सुरक्षा की आवश्यकता कब होती है? एक रिक्शा चालक को आप देखिए या किसी कृषक को आप देखिए। दोनों अपने अपने कार्य में जब थक जाते हैं तो एक अपने रिक्शे को ही किसी पेड़ की छाया में खड़ा करके नींद ले लेता है। जबकि कृषक अपने खेत में ही खड़े किसी वृक्ष की शीतल छाया में लेटकर नींद की आगोश में इस प्रकार छिप जाता है जैसे कोई बच्चा हार थककर मां की गोद में आकर सो गया है। इन दोनों को खुले में सोने पर भी अपनी सुरक्षा की चिंता नही है क्योंकि दोनों के कर्म अच्छे हैं। इसलिए भीतर से किसी प्रकार का भय नही है। भय और कर्म का चोली दामन का साथ है। निष्पक्ष हृदय में भय अथवा तनाव नही होता।
एक संत इसीलिए बियाबान जंगल में झोंपड़ी बनाकर रह लेता है, जबकि एक पापी हृदय व्यक्ति ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं के मध्य भी स्वयं को असुरक्षित अनुभव करता है। हम यह मानते हैं कि शासक वर्ग के लिए सुरक्षा की आवश्यकता होती है। उसे उत्तरदायित्वों के अनुसार समाज में उसके शत्रु भी होते हैं। राजकीय कार्यों में विघ्न डालने वाले भी होते हैं इसलिए शासन को उसकी सुरक्षा का पूर्ण दायित्व लेना अपेक्षित है। किंतु ऐसा कहना अद्र्घसत्य ही है पूर्ण सत्य नही। इस अद्र्घसत्य को आप वह मौलिक सत्य भी कह सकते हैं। जिसकी आड में हमारे राजनीतिक पापपूर्ण कार्य करते हैं और सुरक्षातंत्र प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। आप देखें यहां राजनीतिक हत्याएं होती हैं। राजनीतिक अबलाओं को तंदूर में भून देते हैं। राजनीतिक प्रतिस्पद्र्घी को समाप्त कर दिया जाता है। राजनीतिज्ञ प्रॉपर्टी डीलिंग कर रहे हैं। भू माफियाओं को शरण दे रहे हैं। कमीशन खाकर अपनी आवंटित निधि से पैसा दे रहे हैं। अपराधियों को पालते हैं। हर दुष्टतापूर्ण कार्य तथा दंगा, फंसाद, अपराध, हत्या आदि के पीछे किसी न किसी राजनीतिज्ञ का वरदहस्त अवश्य छिपा हुआ होता है।
तब ऐसी परिस्थितियों में जो उसे सुरक्षा उपलब्ध होती है समझो कि वह उसका पात्र नही है। क्योंकि यदि ऐसे दुष्कर्म करते हुए उसके प्राणों को संकट है तो यह उसके पापकर्म हैं जिनसे जूझने के लिए उसे अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। हां राजनीतिक निर्णयों के लेने और उन्हें क्रियान्वित करने से जो प्राण संकट उत्पन्न होता है वह सुरक्षा प्राप्त करने का पर्याप्त कारण हो सकता है। यथा जो लोग यहां छदम धर्मनिरपेक्षता के विरूद्घ राष्ट्रभक्तिपूर्ण कार्य कर रहे हैं। वह भी कई लोगों की हिटलिस्ट में होते हैं, उनकी हैसियत और पद की गरिमा के अनुकूल उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराया जाना नितांत आवश्यक है। ऐसे ही अन्य ठोस आधार ढूंढ़कर सुरक्षा उपलब्ध कराने की कार्यनीति यहां तैयार की जा सकती है।
हमारे देश का पुलिस विभाग जन सेवा के लिए है। उसे केवल उसी के लिए रखा जाए। नेताओं को मिलने वाले गनर और सुरक्षाकर्मियों के लिए अलग से विभाग गठित किया जाए। उसका वार्षिक बजट प्रस्तुत किया जाए। उसकी सारी व्यवस्था पर होने वाले सारे व्यय का विवरण राष्ट्र की संसद और प्रदेशों की विधानसभाओं में सार्वजनिक किया जाए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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