आम आदमी की पहुंच से दूर होती सरकार

  • 2012-12-22 03:43:15.0
  • उगता भारत ब्यूरो

श्रीमति शीला दीक्षित साहिबा की बातों का बुरा मानने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अगर छह सौ रूपये में पांच लोगों के महीनेभर की दालरोटी का जुगाड़ खोज लिया है तो यह उनकी राजनीतिक मजबूरी है। पूरी कांग्रेस सरकार कैश कांड का प्रचार करने निकल पड़ी है ऐसे में शीला दीक्षित अगर दिल्ली प्रदेश में इसे जायज ठहरा रही हैं तो वे एक राजनीतिक काम को अंजाम दे रही हैं। लेकिन शीला दीक्षित की दिल्ली के अलावा एक देश भी है और उस देश में छोटे छोटे गांव भी हैं जहां जन वितरण प्रणाली के जरिए ही सरकारी धन रूपी सब्सिडी का लाभ पहुंचाया जाता है। छोटी-छोटी चोरियों के कारण गांवों में बरसों से गरीबों को राशन और केरोसिन उपलब्ध करा रही जन वितरण प्रणाली की छवि नकारात्मक हो गयी है और इस प्रणाली की ऐसी छवि के कारण सरकार ने इन्हें बंद करवा कर लोगों के खाते में उनकी सब्सिडी एकमुश्त डलवा देने का फैसला कर लिया है. पहली नजर में तो इस भारी भरकम रकम के बारे में जान कर लोगों को लगता है कि इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती, मगर जब वही लोग इस मसले पर गंभीरता से विचार करते हैं तो उन्हें लगता है कि लाख बुरा सही अपनी राशन दुकान ही बेहतर है, इसी व्यवस्था में सुधार लाया जाये तो उनके लिए बेहतर होगा। खाते में आने वाली रकम को लेकर उनके मन में कई आशंकाएं हैं। इन आशंकाओं ने मनरेगा के लिए काम करते हुए उनके मन में जगह बनायी है. यह सर्वविदित तथ्य है कि मनरेगा का पैसा कभी समय पर नहीं मिलता, राशन तो महीने के महीने मिल ही जाता है. अगर सब्सिडी का पैसा समय पर नहीं मिला तो भूखों मरने की नौबत आ जायेगी। इसके अलावा लोगों को यह भी लगता है कि सब्सिडी के पैसों का दुरुपयोग हो सकता है। लोग इस पैसे का इस्तेमाल उस काम में नहीं करेंगे जिसके लिए यह दिया जा रहा है. विशेष तौर पर महिलाएं मानती हैं कि पैसा मर्दो के नाम पर आयेगा और वे इसे दारू में या जुएं में फूंक डालेंगे. वहीं, बाजार की कीमतों ने हाल के वर्षो में इस कदर बेवफाई की है कि गरीब लोगों का खास तौर पर इस बात से भरोसा उठ गया है कि पैसों से जरूरत का हर सामान समय पर खरीदा जा सकता है। उन्हें लगता है कि जिस केरोसिन पर सब्सिडी उन्हें 30 रुपये की दर पर मिल रही है, वह किसी भी रोज 50 से 60 रुपये की दर पर उपलब्ध हो सकता है. ऐसे में उनका कैश बेकार साबित हो जायेगा. राशन दुकान की कीमतों का भरोसा है, मगर बाजार की कीमतों का कोई भरोसा नहीं है। इन्हीं वजहों से अधिकतर गरीब लोग चाहते हैं कि जन वितरण प्रणाली में ही अपेक्षित सुधार लाया जाये बनिस्पत कि सरकार सब्सिडी का पैसा उनके खाते में डाल दे। लोगों की राय जानने के लिए हाल ही में इससे संबंधित दो अध्ययन सामने आये, पहला जानेमाने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और रीतिका खेड़ा द्वारा किया गया अध्ययन है और दूसरा दिल्ली की संस्था रोजी रोजी अभियान का। इन सव्रेक्षणों से उपर बतायी गयी बातें पुख्ता तरीके से प्रमाणित होती हैं। इन दोनों अध्ययनों के मुताबिक गरीब लोग उनके अकाउंट में नकदी के हस्तांतरण के बदले अनाज पाना अधिक पसंद करते हैं. जबकि मुक्त बाजार के कई पैरोकार अर्थशास्त्री मानते हैं कि सरकार को भ्रष्ट जनवितरण प्रणाली से निजात पा लेना जरूरी है और इसका सबसे बेहतर उपाय नकदी हस्तांतरण की पद्धति को लागू करना है। हालांकि उनका यह नजरिया दूसरे मुल्कों के अनुभवों पर आधारित है, जबकि ये दोनों अध्ययन अपने देश के सबसे गरीब लोगों के बीच कराये गये हैं। देश के कई सामाजिक संगठनों और ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत संगठनों का मानना है कि छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की तर्ज पर अगर जनवितरण प्रणाली को विकसित किया जाये तो यह ज्यादा बेहतर साबित हो सकता है। द्रेज और खेड़ा ने आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, ओडि़शा, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश राज्य के दो जिलों के दो-दो प्रखंडों के बीच यह सव्रेक्षण कराया. यह सव्रेक्षण में हर चयनित प्रखंड के छह गांवों के 12 परिवारों के बीच कराया गया, इस तरह इस अध्ययन में कुल 1227 गरीब और अंत्योदय योजना का लाभ ले रहे परिवार शामिल हुए. इन 106 गांवों में फैले परिवारों में से महज 18 फीसदी परिवार ने ही नकदी हस्तांतरण की योजना को पसंद किया, जबकि 67 फीसदी लोगों ने अपने राशन की दुकान से अनाज हासिल करने के विकल्प को पसंद किया। नकदी हस्तांतरण के विकल्प को पसंद करने वाले लोग ज्यादातर उन इलाकों के थे जहां जनवितरण प्रणाली ठीक से काम नहीं करती है. ये राज्य हैं बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश। जबकि जिन इलाकों में हाल के वर्षों में जनवितरण प्रणाली की प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव आया है वहां के लोग अपनी राशन दुकानों से ही राशन लेना चाहते हैं. आंध्र प्रदेश में ऐसा चाहने वालों की संख्या 91 फीसदी है, छत्तीसगढ़ में 90 फीसदी और ओडि़शा में 88 फीसदी है.द्रेज और खेड़ा के अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जनवितरण प्रणाली उन राज्यों में काफी बेहतर काम कर रही है जहां बाजार में अनाज की कीमत अधिक है और राशन दुकानों में कीमतें कम और राशन दुकानदार के साथ-साथ सरकार की राजनीतिक इच्छा ऐसी है कि अधिक से अधिक लोग राशन दुकान से लाभान्वित हो सकें। कई राज्यों में राशन की गड़बडिय़ों को रोकने के लिए जीपीआरएस, जीपीएस, एसएमएस और बायोमीट्रिक प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है।

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