मानवाधिकारों का दर्शन

  • 2012-11-16 14:06:15.0
  • उगता भारत ब्यूरो

वी. एम. तारकुंडे
मानवाधिकारों की रक्षा और इन्हें आगे बढ़ाने की दृष्टि से राष्ट्र संघ ने बहुमूल्य कार्य किये। राष्ट्र संघ ने स्त्रियों का व्यापार रोकने, विवाह की उम्र बढ़ाने, विभिन्न देशों में बाल कल्याण को सुनिश्चित करने तथा हजारों शरणार्थियों के पुनर्वास के कदम उठाए। लेकिन मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने की दृष्टि से राष्ट्र संघ का मुख्य कार्य अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के जरिये हुआ। जो लोग दोनों विश्व युद्घों के बीच भारतीय मजदूर आंदोलन से जुड़े थे, वे काम के घंटे सीमित करने, कारखानों में सुरक्षा एवं स्वास्थ्य की स्थितियां सुनिश्चित करने, महिलाओं और बच्चों को काम करने की मानवीय स्थितियां मुहैया कराने तथा आम तौर पर मजदूरों के बारे में उदार सरकारी नीतियों को आगे बढ़ाने में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बहुमूल्य कार्यों को जानते हैं।
दोनों विश्व युद्घों के बीच के काल में इटली और जर्मनी में फांसीवाद के उभार से लोकतंत्र एवं निजी स्वतंत्रता का गंभीर खतरा पैदा हुआ। फासीवाद देशों के उग्र राष्ट्रवाद ने अपने देश में मानवाधिकारों को नष्टï कर दिया और विदेशों ने भी इन्हें नष्ट करने का खतरा पैदा कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप मित्र देशों एवं फासीवाद शक्तियों के बीच हुआ सशक्त संघर्ष अनिवार्य रूप से फासीवाद विरोधी युद्घ था। यह स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र की रक्षा के लिए युद्घ था। युद्घ में फासीवाद ताकतों की हार का परिणाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक क्रांति के रूप में होना अपरिहार्य था। दरअसल, 1945 में फासीवाद की हार से जो क्रांति आयी, वह विश्व क्रांति थी-इसका दायरा और महत्ता फ्रांसीसी तथा रूसी क्रांतियों से अधिक बड़ा था। युद्घ के बाद विश्व के अधिकांश भागों में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का खात्मा हो गया तथा एशिया एवं अफ्रीका के बहुत से अविकसित देशों को आजादी मिली। इस रूप में इतिहास ने फासीवाद विरोधी शक्तियों के युद्घ प्रयासों का समर्थन काने वाले लोगों को असली क्रांतिकारी तथा स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र का वास्तविक सेनानी साबित किया है।
युद्घ के फासीवाद विरोधी चरित्र को देखते हुए मानवाधिकारों की रक्षा तथा इन्हें आगे बढ़ाना मित्र शक्तियों का मुख्य उद्देश्य होना स्वाभाविक था। जनवरी 1941 में राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने घोषणा की कि दुनिया में हर जगह चार स्वतंत्रताओं-भाषण की स्वतंत्रता, उपासना की स्वतंत्रता, अभाव से स्वतंत्रता तथा भय से स्वतंत्रता का होना शांति की आवश्यक शर्त है। उसी साल बाद में रूजवेल्ट और चर्चिल ने अटलांटिक घोषणापत्र में इसी युद्घ उद्देश्य की घोषणा की। 1944 में चार बड़ी शक्तियों-अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, सोवियत संघ और चीन ने डुम्बार्टन ओक्स के प्रस्तावों से सहमति जतायी, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के गठन का एक उद्देश्य मानवाधिकारों के सम्मान तथा मौलिक स्वतंत्रताओं को बढ़ाना देना होगा।
युद्घ के बाद सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र को अंगीकार किया गया। इसमें मानवाधिकारों और स्वतंत्रताओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य को प्रमुखता दी गयी। इस घोषणा पत्र की प्रस्तावना में घोषित किया गया, हम बुनियादी मानवाधिकारों, व्यक्तियों की गरिमा एवं पुनर्पुष्टि के लिए कृतसंकल्प संयुक्त राष्ट्र में शामिल देशों के लोग इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिल कर प्रयास करने का संकल्प करते हैं। घोषणापत्र की पहली धारा में ही संयुक्त राष्ट्र के घोषित उद्देश्यों में एक मानवाधिकारों के लिए सम्मान बढ़ाने तथा प्रोत्साहित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तैयार करना बताया गया है। इसके अन्य उद्देश्य हैं, आंतरिक शांति कायम रखना और राष्ट्रों के बीच मित्रतापूर्ण रिश्तों का विकास। घोषणा पत्र की धारा 68 में कई आयोगों के गठन का प्रावधान है, जिनमें एक मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए भी है।
इसके अनुरूप 1946 में दिवंगत श्रीमति एलीनर रूजवेल्ट की अध्यक्षता में विधिवत मानवाधिकारों आयोग बना। पूर्व और पश्चिम में बढ़ते तानवा के बावजूद आयोग ने काम जारी रखा और मानवाधिकार घोषणापत्र का प्रारूप तैयार किया। इस प्रारूप को सितंबर 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा को सौंपा गया। प्रारूप में कुछ संशोधनों के बाद महासभा ने उसी वर्ष 10 दिसंबर को मानवाधिकारों के विश्व घोषणा पत्र को अंगीकार कर लिया। किसी ने इससे असहमति नही जतायी। हालांकि साम्यवादी खेमे के देशों, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका ने मतदान में भाग नही लिया।
मानवाधिकारों का विश्व घोषणा पत्र महासभा द्वारा एक ऐसे प्रतिमान के रूप में ग्रहण किया गया, जिसे सभी लोगों और सभी राष्ट्रो के बीच हासिल किया जाना था। आरंभ में इस घोषणा पत्र के व्यावहारिक महत्व को लेकर गंभीर शक जाहिर किये गये। शक जताने वालों में वे भी थे जो मानवाधिकारों के बुनियादी महत्व को स्वीकार करते थे। पिछले दशकों के अनुभवों से ये शक जरूर हो गये होंगे। महासभा और संयुक्त राष्ट्र के दूसरे अंगों ने बार बार घोषणा पत्र में निहित सिद्घांतों को लागू किया है और उसके अनुरूप कार्रवाई की है। प्रतिस्पर्धी घरेलू क्षेत्राधिकार का सिद्घांत महासभा को उन मामलों में हस्तक्षेप करने या हस्तक्षेप का प्रयास करने से रोक नही सका है, जहां मानवाधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन हुआ है। महासभा ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति के प्रति जो रूख अपनाया, वह इस बात की अच्छी मिसाल है। अब तक घोषणा पत्र को व्यावहारिक सत्ता प्राप्त हो चुकी है, जिससे कुछ लोग यह विश्वास करने लगे हैं कि यह लगभग अंतर्राष्ट्रीय कानून का हिस्सा बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषणा पत्र को अंगीकार करने पर टिप्पणी करते हुए प्रो. जोन पी.हम्फ्रे ने (इवान लुआर्ड संपादित द इंटरनेशनल प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स में) लिखा, हमारे समय के चिंतन पर संयुक्त राष्ट्र के किसी अन्य कानून का इतना प्रभाव नही पड़ा। इसमें सर्वोत्तम आकांक्षाएं, निहित एवं घोषित है। संभव है कि यह इतिहास में मुख्य रूप से महान नैतिक सिद्घांतों के वक्तव्य के रूप में जीवित रहे। किसी भी अन्य राजनीतिक दस्तावेज या कानूनी उपकरण की तुलना में इसका प्रभाव अधिक गहरा एवं स्थायी है।
घोषणा पत्र को जो भी राजनीतिक और कानूनी शक्ति प्राप्त हुई, वह इसकी नैतिक सत्ता से निकली है और इसकी नैतिक सत्ता अंतर्राष्ट्रीय जनमत के समर्थन से उपजी है। अंतिम विश्लेषण में कहा जा सकता है कि घोषणा पत्र में निहित मानवाधिकारों को प्रोत्साहित करने का रास्ता इसके समर्थन में अधिक से अधिक जनमत बनान ही है।
भारत में आवश्यक मानाधिकारों की संविधान के मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति निर्देशक सिद्घांतों वाले हिस्सों में शामिल कियाग या है। अधिकार आज चरम दक्षिण पंथियों के हमले का निशाना है। लोकतंत्र समर्थकों और मानवतावादियों के लिए आज भारत में मानवाधिकार दिवस मनाने का सर्वोत्तम तरीका यही है कि वे लोगों का मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों को समझायें और इन पर अमल के लिए समर्थन जुटायें। मानवतावादियों को अपने कार्य में खास रूचि लेनी चाहिए। उनका दर्शन इस उक्ति पर आधारित है कि मनुष्य ही सभी चीजों की कसौटी है। वे मानते हैं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और विकास सामाजिक प्रगति की कसौटी है। उनका आदर्श मनुष्य के संदर्भ में ही समझा जा सकता है, संस्थाओं के संदर्भ में नही चाहे ये संस्थाएं राजनीतिक हों या आर्थिक, सिर्फ उन मामलों को छोड़कर जहां संस्थाएं व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं प्रगति को सुनिश्चित करती हैं। अत: मानवाधिकारों का संरक्षण एवं प्रोत्साहन सभी मानवतावादियों का प्रमुख कार्य है।

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